Sustainable Fisheries में भारत बना लीडर

ग्लोबल मंच पर लघु मत्स्य पालन में भारत की दमदार पैरवी!

नई दिल्ली/ हुआ हिन (थाईलैंड), 27 अप्रैल 2026। समुद्री संसाधनों के टिकाऊ उपयोग और मछुआरा समुदायों के सशक्तिकरण को लेकर आयोजित 5वें विश्व लघु मत्स्य पालन सम्मेलन में भारत ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी के नेतृत्व में उच्चस्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल इस सम्मेलन में भाग ले रहा है। 27 से 30 अप्रैल तक चल रहे इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया के लगभग 50 देशों से 300 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए हैं, जहां 45 तकनीकी सत्रों के माध्यम से लघु मत्स्य पालन के विभिन्न आयामों पर गहन चर्चा हो रही है।

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सम्मेलन का मुख्य विषय—न्यायपूर्ण सद्भाव, युवा भविष्य और पुनर्योजी ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए लघु मत्स्य पालन—इस क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संतुलन को केंद्र में रखता है। इसमें खासतौर पर तटीय क्षेत्रों में संघर्ष समाधान, युवाओं की भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान आधारित जलवायु-अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।

भारत ने रखा विकास और स्थिरता का मॉडल

उद्घाटन सत्र में अपने संबोधन के दौरान डॉ. अभिलक्ष लिखी ने वैश्विक समुदाय के सामने भारत की उपलब्धियों और नीतिगत पहलों को विस्तार से रखा। उन्होंने बताया कि भारत आज 19.7 मिलियन टन के रिकॉर्ड उत्पादन के साथ विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश बन चुका है। यह उपलब्धि देश में तकनीकी नवाचार, अवसंरचना विकास और सरकारी निवेश के कारण संभव हुई है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत में समुद्री खाद्य निर्यात लगातार बढ़ रहा है और इसका बड़ा श्रेय गुणवत्ता सुधार, ट्रेसबिलिटी सिस्टम और आधुनिक आपूर्ति श्रृंखला को जाता है। भारत अब केवल उत्पादन बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि सतत और जिम्मेदार मत्स्य पालन पर भी विशेष ध्यान दे रहा है।

डॉ. लिखी ने कहा कि भारत डिजिटल तकनीकों, डेटा-आधारित प्रबंधन और समुदाय-आधारित दृष्टिकोण को अपनाकर मत्स्य क्षेत्र को अधिक पारदर्शी और टिकाऊ बना रहा है। उन्होंने बंगाल की खाड़ी कार्यक्रम (BOBP-IGO) के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका का भी उल्लेख किया।

लघु मत्स्य पालन: अर्थव्यवस्था की मजबूत कड़ी

सम्मेलन के दौरान आयोजित एक महत्वपूर्ण पैनल सत्र में डॉ. लिखी ने लघु मत्स्य पालन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजनाओं (NPOA-SSF) की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लघु मत्स्य पालन केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, पोषण, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान का आधार है।

उन्होंने बताया कि विशेष रूप से बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में लघु मत्स्य पालन लाखों लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत है। इस क्षेत्र की विविधता और स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए एक समान नीति लागू करने के बजाय क्षेत्र-विशिष्ट और समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।

नीति सुधार और संस्थागत मजबूती पर जोर

पैनल चर्चा में यह स्पष्ट हुआ कि लघु मत्स्य पालन क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए—

  • मछुआरा संगठनों की क्षमता बढ़ाना, वित्त और बाजार तक पहुंच आसान करना, बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाना, विकेंद्रीकृत और समावेशी नीति निर्माण जैसे कदम बेहद जरूरी हैं।

प्रतिभागियों ने यह भी सुझाव दिया कि राष्ट्रीय कार्य योजनाओं को मौजूदा नीतियों के साथ बेहतर तरीके से जोड़ा जाए और विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय को मजबूत किया जाए।

ग्लोबल स्तर पर लघु मत्स्य पालन की अहमियत

दुनिया भर में लघु मत्स्य पालन क्षेत्र को मत्स्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। यह लगभग 90% मछुआरों को रोजगार देता है और कुल मत्स्य उत्पादन में करीब 40% का योगदान करता है।

इस क्षेत्र की एक खास विशेषता यह भी है कि इसमें महिलाओं की भागीदारी बड़ी संख्या में होती है, खासकर प्रसंस्करण और विपणन गतिविधियों में। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका मजबूत होती है और लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलता है।

हालांकि, यह क्षेत्र कई चुनौतियों से भी जूझ रहा है, जिनमें जलवायु परिवर्तन, समुद्री संसाधनों का क्षरण, तटीय क्षेत्रों में बढ़ता दबाव और औद्योगिक मत्स्य पालन के साथ प्रतिस्पर्धा शामिल है।

भारत में लघु मत्स्य पालन की स्थिति

भारत में करीब 40 लाख मछुआरे लघु मत्स्य पालन से जुड़े हैं, जो मुख्य रूप से 12 समुद्री मील तक के तटीय क्षेत्रों में काम करते हैं। यह क्षेत्र राज्य सरकारों के समुद्री मत्स्य पालन विनियमन अधिनियमों (MFRA) के तहत संचालित होता है।

सरकार ने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जैसे—

  • मत्स्य सहकारी समितियों को बढ़ावा
  • मछली किसान उत्पादक संगठनों (FFPO) का गठन
  • आधुनिक अवसंरचना और कोल्ड चेन का विकास

सरकार की प्रमुख योजनाएं और निवेश

मत्स्य क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र सरकार ने बड़े स्तर पर निवेश किया है। प्रमुख योजनाओं में शामिल हैं—

  • प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY)
  • ब्लू रिवोल्यूशन
  • मत्स्य पालन अवसंरचना विकास कोष (FIDF)
  • प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना

इन योजनाओं के तहत अब तक कुल 39,272 करोड़ रुपये का निवेश स्वीकृत या घोषित किया जा चुका है, जिससे उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मछुआरों की आय में वृद्धि और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिला है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की रणनीति

भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मंच पर भी लघु मछुआरों के हितों की रक्षा की पैरवी की है। देश ने यह स्पष्ट किया है कि विकासशील देशों के मछुआरों को विशेष संरक्षण मिलना चाहिए।

इसके साथ ही, भारत अवैध, अनियमित और अनियंत्रित (IUU) मत्स्य पालन पर नियंत्रण के लिए कड़े नियमों का समर्थन कर रहा है।

घरेलू स्तर पर नए EEZ नियम 2025 के तहत पारंपरिक मछुआरों को कई राहत दी गई हैं, जिसमें छोटे नाविकों के लिए अनुमति प्रक्रिया को सरल बनाना और विनाशकारी मछली पकड़ने की तकनीकों पर रोक लगाना शामिल है।

सारांश

हुआ हिन में आयोजित यह वैश्विक सम्मेलन लघु मत्स्य पालन के भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। भारत ने इस मंच पर न केवल अपनी उपलब्धियों को साझा किया, बल्कि एक समावेशी, टिकाऊ और समुदाय-केंद्रित मत्स्य प्रबंधन मॉडल भी प्रस्तुत किया।

स्पष्ट है कि यदि लघु मत्स्य पालन को सही नीतियों और निवेश के साथ समर्थन मिला, तो यह क्षेत्र आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा, रोजगार और आर्थिक विकास का मजबूत आधार बन सकता है।