पराली जलाई तो होगा नुकसान ही नुकसान!

पराली जलाने पर सख्ती: किसानों से अपील, “फसल अवशेष न जलाएं, पर्यावरण बचाएं”

लखनऊ – प्रदेश में बढ़ते वायु प्रदूषण और मिट्टी की गिरती गुणवत्ता को देखते हुए राज्य सरकार ने किसानों के लिए फसल अवशेष (पराली) प्रबंधन को लेकर बड़ा अभियान शुरू किया है। कृषि विभाग की ओर से जारी अपील में साफ कहा गया है कि किसान भाई फसल अवशेष कदापि न जलाएं, बल्कि वैज्ञानिक तरीकों से उसका प्रबंधन करें। सरकार का मानना है कि पराली जलाने की परंपरा न सिर्फ पर्यावरण के लिए खतरनाक है, बल्कि यह खेती की दीर्घकालिक उत्पादकता को भी प्रभावित करती है।

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पोस्टर और जागरूकता सामग्री में प्रदेश के किसानों से आग्रह किया गया है कि वे खेतों में आग लगाने के बजाय वैकल्पिक तकनीकों का इस्तेमाल करें। इसमें यह भी बताया गया है कि फसल अवशेष जलाने से वातावरण प्रदूषित होता है और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

मिट्टी की सेहत पर गंभीर असर

विशेषज्ञों के अनुसार जब किसान खेतों में पराली जलाते हैं, तो मिट्टी की ऊपरी सतह का तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है। इससे मिट्टी में मौजूद लाभकारी जीवाणु और सूक्ष्म तत्व नष्ट हो जाते हैं। यही तत्व फसल की उर्वरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। परिणामस्वरूप, आने वाली फसलों की पैदावार पर नकारात्मक असर पड़ता है और किसानों की लागत बढ़ जाती है।

स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खतरा

पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसों को बढ़ाता है। इससे—

  • सांस संबंधी बीमारियां बढ़ती हैं
  • आंखों में जलन और एलर्जी की समस्या होती है
  • हृदय रोगियों के लिए खतरा बढ़ जाता है

इसके अलावा, यह धुआं आसपास के शहरों और गांवों में स्मॉग की स्थिति पैदा कर देता है, जिससे आम जनजीवन प्रभावित होता है।

पशुधन और जैव विविधता पर प्रभाव

खेतों में आग लगाने से न केवल फसल अवशेष जलते हैं, बल्कि मिट्टी में रहने वाले मित्र कीट और जीव-जंतु भी नष्ट हो जाते हैं। इससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है। पशुओं के चारे के रूप में उपयोग होने वाले अवशेष भी नष्ट हो जाते हैं, जिससे पशुपालकों को नुकसान होता है।

सरकार के वैकल्पिक उपाय

कृषि विभाग ने किसानों को कई आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल विकल्प सुझाए हैं—

  • हैप्पी सीडर, सुपर एसएमएस, रोटावेटर जैसी मशीनों का उपयोग
  • फसल अवशेष से कम्पोस्ट खाद तैयार करना
  • बायो-डीकंपोजर का प्रयोग कर तेजी से अवशेषों को सड़ाना
  • पशुओं के लिए चारे के रूप में इस्तेमाल

इन मशीनों पर सरकार सब्सिडी भी दे रही है, जिससे किसान कम लागत में इनका लाभ उठा सकें।

निगरानी और दंड का प्रावधान

सरकार ने इस बार पराली जलाने पर सख्त रुख अपनाया है। सैटेलाइट और अन्य तकनीकों के माध्यम से खेतों की निगरानी की जा रही है। यदि कोई किसान नियमों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो—

  • आर्थिक जुर्माना लगाया जाएगा
  • दोहराने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी
  • प्रशासनिक रिकॉर्ड में भी प्रविष्टि की जा सकती है

कृषि विभाग की अपील

कृषि विभाग और विशेषज्ञों ने किसानों से अपील की है कि वे “पराली न जलाएं, बल्कि उसे संसाधन में बदलें।” इससे न केवल पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी और किसानों की आय में भी सुधार होगा।

सारांश

फसल अवशेष जलाने की समस्या आज केवल खेती तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक बड़ा पर्यावरणीय संकट बन चुकी है। ऐसे में जरूरी है कि किसान जागरूकता और तकनीक का सहारा लेकर इस समस्या का समाधान करें। सरकार के प्रयासों और किसानों के सहयोग से ही स्वच्छ पर्यावरण और टिकाऊ खेती का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।