भारत अब उर्वरकों में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

उर्वरकों में आत्मनिर्भर भारत की ओर बड़ा कदम: नीति, तकनीक और मृदा स्वास्थ्य पर जोर!

नई दिल्ली: राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी (एनएएएस) ने देश को उर्वरकों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार करने की दिशा में अहम कदम उठाते हुए उच्चस्तरीय विचार-मंथन सत्र आयोजित किया। इस सत्र में केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों, वैज्ञानिक समुदाय, उर्वरक उद्योग, कृषि विशेषज्ञों और किसानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और सर्वसम्मति से यह माना कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है।

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2047 के लक्ष्य में कृषि की केंद्रीय भूमिका

सत्र के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि भारत ने वर्ष 2047 तक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने का जो लक्ष्य निर्धारित किया है, उसमें कृषि क्षेत्र की भूमिका सबसे अहम होगी। उन्होंने कहा कि जहां हरित क्रांति के दौरान उर्वरकों ने खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में क्रांतिकारी योगदान दिया, वहीं अब समय की मांग है कि उनके संतुलित, दक्ष और वैज्ञानिक उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया जाए।

उर्वरक आयात और बढ़ता आर्थिक दबाव

भारत वर्तमान में उर्वरकों की जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। देश में सालाना लगभग 33 मिलियन टन उर्वरकों की खपत होती है, जिसमें फास्फोरस और पोटाश जैसे प्रमुख पोषक तत्वों के लिए आयात पर भारी निर्भरता बनी हुई है।

  • 2024–25 में उर्वरक सब्सिडी का बोझ करीब ₹1.71 लाख करोड़ तक पहुंच गया
  • यूरिया उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली लगभग 80% प्राकृतिक गैस आयातित है

विशेषज्ञों ने चेताया कि वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया जैसे क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव भारत की आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ सकता है।

मृदा स्वास्थ्य और उर्वरक दक्षता: सबसे बड़ी चुनौती

डॉ. जाट ने कहा कि देश में उर्वरकों का उपयोग केवल मात्रा के हिसाब से नहीं, बल्कि दक्षता के आधार पर भी चुनौतीपूर्ण है।

  • नाइट्रोजन का उपयोग केवल 30–50% तक ही प्रभावी
  • फास्फोरस का 15–25%
  • पोटाश का 50–60% ही फसलें उपयोग कर पाती हैं

शेष पोषक तत्व लीचिंग, बहाव और वाष्पीकरण के कारण नष्ट हो जाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और जल स्रोत प्रदूषित होते हैं। इस स्थिति को सुधारने के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, संतुलित उर्वरक उपयोग और किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

तकनीकी समाधान: एआई और प्रिसिजन फार्मिंग

बैठक में यह भी रेखांकित किया गया कि आधुनिक तकनीकें उर्वरक प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती हैं।

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित पोषक तत्व प्रबंधन
  • सेंसर और ड्रोन आधारित निगरानी
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे “भारत VISTAAR”

इन तकनीकों के माध्यम से खेतों में सटीक मात्रा में उर्वरक उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा, जिससे लागत घटेगी और उत्पादन बढ़ेगा।

जैविक विकल्प और फसल विविधीकरण पर जोर

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया जाए:

  • दालों और तिलहनों की खेती को बढ़ावा
  • “वेस्ट-टू-वेल्थ” के तहत जैविक कचरे का उपयोग
  • कंपोस्ट और बायो-फर्टिलाइजर का विस्तार
  • मिट्टी के माइक्रोबायोम की क्षमता का उपयोग

लक्ष्य यह रखा गया कि अगले तीन वर्षों में कम से कम 25% रासायनिक उर्वरकों को जैविक विकल्पों से प्रतिस्थापित किया जाए।

नीतिगत सुधार: सब्सिडी और संरचना में बदलाव

विचार-मंथन में उर्वरक नीति में बड़े बदलाव की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। प्रमुख सुझावों में शामिल हैं:

  • यूरिया को पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) के दायरे में लाना
  • उर्वरक सब्सिडी को अच्छी कृषि पद्धतियों (GAP) से जोड़ना
  • “मृदा स्वास्थ्य कार्ड” के आधार पर सब्सिडी का निर्धारण
  • किसानों को सीधे DBT (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से सहायता

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में सस्ते यूरिया की उपलब्धता असंतुलित उपयोग को बढ़ावा देती है, जिससे मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है।

अनुसंधान और स्वदेशी संसाधनों पर फोकस

बैठक में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए अनुसंधान एवं विकास (R&D) को प्राथमिकता देनी होगी।

  • ग्लूकोनाइट, फॉस्फेट चट्टान, अभ्रक और पॉलीहेलाइट जैसे स्वदेशी खनिजों का उपयोग
  • औद्योगिक उप-उत्पादों का पुनर्चक्रण
  • बेहतर पोषक तत्व उपयोग दक्षता (NUE) के लिए फसल सुधार

भविष्य की दिशा: सतत और स्मार्ट कृषि मॉडल

विशेषज्ञों के अनुसार, अब भारत को उत्पादन-केंद्रित कृषि मॉडल से आगे बढ़कर सतत, संसाधन-कुशल और तकनीक-आधारित कृषि प्रणाली अपनानी होगी।

यह विचार-मंथन सत्र स्पष्ट करता है कि यदि भारत को खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय में वृद्धि जैसे लक्ष्यों को एक साथ हासिल करना है, तो उर्वरक क्षेत्र में नीति, तकनीक और व्यवहार—तीनों स्तरों पर व्यापक बदलाव आवश्यक हैं।

सारांश..

एनएएएस की इस पहल को देश में कृषि सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुझाए गए उपायों को प्रभावी तरीके से लागू किया गया, तो भारत न केवल उर्वरकों में आत्मनिर्भर बन सकेगा, बल्कि टिकाऊ कृषि के वैश्विक मॉडल के रूप में भी उभर सकता है।