ग्रीष्मकालीन फसलों का रकबा बढ़ा, दालें और मोटे अनाज बने किसानों की पहली पसंद !!
नई दिल्ली। देश में ग्रीष्मकालीन फसलों की बुवाई ने इस वर्ष नई रफ्तार पकड़ी है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार 22 मई 2026 तक कुल 86.02 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन फसलों की बुवाई हो चुकी है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 2.52 लाख हेक्टेयर अधिक है। यह वृद्धि विशेष रूप से दालों, मोटे अनाज और तिलहनों में दर्ज की गई है, जिससे कृषि क्षेत्र में फसल विविधीकरण और पोषण सुरक्षा को मजबूती मिलने के संकेत मिल रहे हैं।
दालों की खेती में बढ़ी किसानों की रुचि !!
इस वर्ष दालों का कुल रकबा 27.91 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से 0.65 लाख हेक्टेयर अधिक है। उड़द की खेती में सबसे अधिक उछाल देखने को मिला है। उड़द का क्षेत्रफल बढ़कर 4.60 लाख हेक्टेयर हो गया, जबकि पिछले वर्ष यह 3.58 लाख हेक्टेयर था। हालांकि मूंग का क्षेत्रफल मामूली घटकर 23.01 लाख हेक्टेयर रहा, लेकिन कुल मिलाकर दलहनी फसलों का प्रदर्शन सकारात्मक माना जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि दालों की बेहतर कीमत, कम सिंचाई आवश्यकता और सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं के कारण किसान दलहनी खेती की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
मोटे अनाज और मक्का की खेती में बड़ा विस्तार !!
श्रीअन्न एवं मोटे अनाजों का कुल रकबा 16.01 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जो पिछले वर्ष से 1.77 लाख हेक्टेयर अधिक है। इसमें मक्का सबसे आगे रहा। मक्का का क्षेत्रफल 10 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.50 लाख हेक्टेयर अधिक है। बाजरा और रागी जैसी फसलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पोषणयुक्त अनाजों को लेकर बढ़ती जागरूकता और सरकार की “श्रीअन्न” नीति का असर अब खेतों में साफ दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में कम पानी में तैयार होने वाले मोटे अनाज किसानों के लिए सुरक्षित विकल्प बनते जा रहे हैं।
तिलहन उत्पादन को भी मिला बढ़ावा !!
तिलहनों की बुवाई में भी इस बार उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है। कुल तिलहन क्षेत्र 11.04 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.47 लाख हेक्टेयर अधिक है। मूंगफली की खेती में सबसे अधिक बढ़ोतरी हुई है। इसका रकबा बढ़कर 5.51 लाख हेक्टेयर हो गया, जबकि पिछले वर्ष यह 4.20 लाख हेक्टेयर था। सूरजमुखी और तिल की खेती में भी हल्की बढ़त दर्ज की गई है। खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार लगातार तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है।
चावल का रकबा घटा !!
दूसरी ओर, चावल के क्षेत्रफल में गिरावट दर्ज की गई है। इस वर्ष अब तक 31.05 लाख हेक्टेयर में धान की बुवाई हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 32.42 लाख हेक्टेयर था। यानी 1.36 लाख हेक्टेयर की कमी आई है।
विशेषज्ञों के अनुसार कई राज्यों में पानी की उपलब्धता और मौसमीय परिस्थितियों को देखते हुए किसानों ने धान के बजाय दालों और मोटे अनाजों की खेती को प्राथमिकता दी है।
फसल विविधीकरण की ओर बढ़ रहा कृषि क्षेत्र !!
कृषि क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि मौजूदा आंकड़े भारतीय खेती में बदलाव की नई तस्वीर पेश कर रहे हैं। किसान अब केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि बाजार मांग, पोषण मूल्य और जलवायु अनुकूलता को ध्यान में रखते हुए नई फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। सरकार द्वारा दाल, मोटा अनाज और तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए चलाए जा रहे अभियानों का असर भी अब जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगा है। यदि मानसून सामान्य रहता है, तो इस वर्ष उत्पादन के नए रिकॉर्ड बनने की संभावना जताई जा रही है।






























