जिस केले के थंब को किसान फेंकते थे, वही अब बनेगा कमाई का साधन!
बिहार में केले के अवशेष से वर्मी कम्पोस्ट, रेशा और अन्य उत्पाद बनाने की बढ़ी संभावनाएं, किसानों को मिल सकता है अतिरिक्त आय का नया स्रोत!
पूसा/हाजीपुर, बिहार। बिहार में केले की खेती अब केवल फल उत्पादन तक सीमित नहीं रह गई है। जिस केले के थंब (आभासी तने) को किसान वर्षों से बेकार समझकर खेतों में छोड़ देते थे या जला देते थे, वही अब आय का नया साधन बनता दिखाई दे रहा है। कृषि वैज्ञानिक का मानना है कि केले की कटाई के बाद बचने वाला यह जैविक अवशेष वर्मी कम्पोस्ट, जैविक खाद, रेशा, सैप और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्माण में उपयोग किया जा सकता है। इससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा मिलेगा।
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केला अनुसंधान संस्थान, गोरौल (हाजीपुर) के प्रधान (अतिरिक्त प्रभार) एवं डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा के पूर्व सह निदेशक अनुसंधान प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह ने बताया कि केले के पौधे का आभासी तना लंबे समय तक कृषि अपशिष्ट माना जाता रहा, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण जैविक संसाधन है। यदि इसका सही प्रबंधन किया जाए तो यह किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
बिहार में बड़े पैमाने पर होता है केले का पैदावार
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बिहार देश के प्रमुख केला उत्पादक राज्यों में शामिल है। वर्ष 2023-24 में राज्य में लगभग 42.67 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में केले की खेती हुई और करीब 19.20 लाख टन पैदावार दर्ज किया गया। उत्पादकता लगभग 45 टन प्रति हेक्टेयर रही। 2024-25 के द्वितीय अग्रिम अनुमान भी लगभग इसी स्तर के उत्पादन का संकेत देते हैं।
राज्य के मधुबनी, वैशाली और मुजफ्फरपुर जिले प्रमुख केला उत्पादक क्षेत्र हैं। इन जिलों से होने वाला बड़े पैमाने का उत्पादन कटाई के बाद भारी मात्रा में जैविक अवशेष भी पैदा करता है, जिसके वैज्ञानिक उपयोग की दिशा में अब गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं।
फल के बाद भी खत्म नहीं होती कमाई
प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह के अनुसार विभिन्न अनुसंधानों में पाया गया है कि केले के पौधे के कुल जैवभार में आभासी तने की हिस्सेदारी लगभग 30 से 34 प्रतिशत तक होती है। फल की कटाई के बाद प्रति हेक्टेयर 60 से 80 टन तक थंब खेतों में बच जाता है।
उन्होंने कहा कि यही जैविक अवशेष अब “कचरे से कमाई” और “वेस्ट टू वेल्थ” की अवधारणा को मजबूत कर रहा है। पहले जिस सामग्री को बेकार समझा जाता था, वही अब किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकती है।
किसानों को दी जा रही है प्रशिक्षण की सुविधा
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा द्वारा केले के थंब के वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। किसानों को थंब से वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने की तकनीक सिखाई जा रही है तथा इसके लिए आवश्यक प्रसंस्करण व्यवस्था भी विकसित की गई है।
प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह ने बताया कि अब तक 250 से अधिक किसानों को इस तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। परियोजना के अंतर्गत 50 टन से अधिक वर्मी कम्पोस्ट तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य किसानों को केवल खाद उत्पादन तक सीमित रखना नहीं, बल्कि इसे ग्रामीण कृषि उद्यम के रूप में विकसित करना है।
मिट्टी की सेहत सुधारने में मददगार
केले के थंब में पर्याप्त मात्रा में जैविक पदार्थ और पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। वर्मी कम्पोस्टिंग के बाद यह सामग्री मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने, जलधारण क्षमता सुधारने तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ाने में सहायक होती है।
इसका उपयोग कर किसान जैविक खाद की खरीद पर होने वाला खर्च कम कर सकते हैं। वहीं अतिरिक्त वर्मी कम्पोस्ट को स्थानीय बाजार, नर्सरी संचालकों, बागवानों और जैविक खेती करने वाले किसानों को बेचकर अतिरिक्त आय भी प्राप्त की जा सकती है।
केले का रेशा भी बनेगा रोजगार का माध्यम
केले के थंब का उपयोग केवल खाद तक सीमित नहीं है। इससे प्राप्त रेशे का उपयोग रस्सी, मैट, बैग, टोकरियां, हस्तशिल्प उत्पाद, कार्पेट, कुशन और अन्य सजावटी सामग्री बनाने में किया जा सकता है।
प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह ने बताया कि विभिन्न अनुसंधान संस्थानों द्वारा केले के रेशे के प्रसंस्करण की तकनीक विकसित की गई है। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में इसके लिए छोटे स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित की जाएं तो स्थानीय युवाओं और महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
सैप और अन्य उत्पादों में भी संभावनाएं
केले के थंब से निकलने वाला सैप भी एक उपयोगी संसाधन है। अनुसंधान अध्ययनों में थंब आधारित सैप, रेशा और वर्मी कम्पोस्ट के आर्थिक महत्व को रेखांकित किया गया है। भविष्य में किसान एकीकृत प्रसंस्करण मॉडल अपनाकर एक ही कच्चे माल से कई प्रकार के उत्पाद तैयार कर सकते हैं।
इससे खेती की लाभप्रदता बढ़ेगी और कृषि अवशेषों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होगा।
गांवों में विकसित हो सकता है नया मॉडल
केला उपज क्षेत्रों में किसान समूह, किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), स्वयं सहायता समूह और ग्रामीण उद्यमी मिलकर थंब संग्रहण, श्रेडिंग, वर्मी कम्पोस्ट निर्माण, रेशा निष्कर्षण और मूल्यवर्धित उत्पाद निर्माण का स्थानीय मॉडल विकसित कर सकते हैं।
इससे परिवहन लागत कम होगी, ग्रामीण रोजगार बढ़ेगा और केले की खेती को चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था से जोड़ने में मदद मिलेगी।
किसानों के लिए खुल सकता है आय का नया अध्याय
प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह का कहना है कि केले की खेती का वास्तविक मूल्य केवल फल तक सीमित नहीं है। फल की कटाई के बाद बचने वाले थंब, रेशा और सैप का वैज्ञानिक उपयोग किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने कहा कि यदि प्रशिक्षण, प्रसंस्करण मशीनरी, बाजार संपर्क और गुणवत्ता मानकों को मजबूत किया जाए तो बिहार जैसे बड़े केला उत्पादक राज्यों में यह मॉडल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। ऐसे में केले का थंब अब कृषि अपशिष्ट नहीं, बल्कि किसानों के लिए “कृषि संपदा” के रूप में उभर रहा है और भविष्य में यह फल के बाद भी कमाई का नया अध्याय लिख सकता है।
(लेख में व्यक्त विचार प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह के हैं।
विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर विभाग, पादप रोग विज्ञान एवं नेमेटोलॉजी, प्रधान (अतिरिक्त प्रभार), केला अनुसंधान संस्थान, गोरौल, हाजीपुर; पूर्व सह निदेशक अनुसंधान एवं पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर (बिहार
