आईबीईटी एक्सपो 2026: गोबर से ऊर्जा और जैविक उर्वरक बनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल सकती है नई दिशा!
ग्रेटर नोएडा, 13 अगस्त। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के अध्यक्ष डॉ. मीनेश सी. शाह ने कहा है कि भारत में बायोएनर्जी क्षेत्र अब केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों की आय बढ़ाने, जैविक खेती को प्रोत्साहन देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का एक प्रभावी माध्यम बनता जा रहा है। उन्होंने यह बात ग्रेटर नोएडा में आयोजित तृतीय अंतरराष्ट्रीय बायोएनर्जी एवं टेक्नोलॉजी सम्मेलन (IBET Expo 2026) को संबोधित करते हुए कही।
सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही, ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा, ऊर्जा विभाग के राज्यमंत्री कैलाश सिंह राजपूत, गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता, इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एनर्जी के महानिदेशक संजय गंजू, ग्रीन ट्रांसपोर्ट मोबिलिटी समिति के अध्यक्ष संजय बंदोपाध्याय, प्राज इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष (बायोएनर्जी) अतुल मुलाय, एमएम एक्टिव साइ-टेक कम्युनिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक रविंद्र बोरतकर तथा उत्तर प्रदेश के ऊर्जा एवं अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत विभाग के अपर मुख्य सचिव आशीष कुमार गोयल सहित अनेक विशेषज्ञ और उद्योग प्रतिनिधि मौजूद रहे।
वाराणसी में स्थापित हुआ देश का पहला केंद्रीकृत गोबर आधारित बायोगैस संयंत्र
डॉ. शाह ने अपने संबोधन में एनडीडीबी द्वारा विकसित विभिन्न बायोगैस मॉडलों की जानकारी देते हुए बताया कि वाराणसी दुग्ध संघ परिसर में देश का पहला केंद्रीकृत गोबर आधारित बायोगैस संयंत्र स्थापित किया गया है। यह संयंत्र प्रतिदिन लगभग 4,000 घनमीटर बायोगैस का उत्पादन करता है।
उन्होंने बताया कि करीब 100 मीट्रिक टन गोबर से उत्पादित बायोगैस का उपयोग डेयरी की तापीय एवं विद्युत ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में किया जा रहा है। इससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम हुई है, प्रसंस्करण लागत में कमी आई है और पशुपालकों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिला है।
गांवों तक पहुंच रही पाइपलाइन से बायोगैस
डॉ. शाह ने वाराणसी के अकौनी गांव का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां सामुदायिक मॉडल के तहत लगभग 200 घनमीटर प्रतिदिन क्षमता वाला बायोगैस संयंत्र संचालित किया जा रहा है। इस संयंत्र से पाइपलाइन के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को रसोई गैस उपलब्ध कराई जा रही है, जिसकी लागत एलपीजी की तुलना में आधे से भी कम है।
उन्होंने कहा कि यह मॉडल ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराने के साथ-साथ महिलाओं के घरेलू खर्च को कम करने में भी मददगार साबित हो रहा है।
गोबर से बन रही सीबीजी, वाहनों में हो रहा उपयोग
एनडीडीबी अध्यक्ष ने बताया कि बनास डेयरी और सुजुकी के सहयोग से गुजरात के बनासकांठा में एक अभिनव परियोजना संचालित की जा रही है, जहां गोबर से कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) तैयार कर उसे वाहन ईंधन के रूप में उपयोग किया जा रहा है। वहीं संयंत्र से निकलने वाली स्लरी का उपयोग जैविक उर्वरक बनाने में किया जा रहा है।
उन्होंने यह भी बताया कि 2 घनमीटर क्षमता वाले घरेलू बायोगैस संयंत्रों को महिला किसान अपने घरों में स्थापित कर रही हैं, जिससे उन्हें स्वच्छ ईंधन के साथ-साथ ऊर्जा पर होने वाले खर्च में भी बचत हो रही है।
बायोएनर्जी को ‘न्यूट्रिएंट रिकवरी सिस्टम’ के रूप में देखने की जरूरत
डॉ. शाह ने कहा कि बायोएनर्जी को केवल ऊर्जा सुरक्षा के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक व्यापक “न्यूट्रिएंट रिकवरी सिस्टम” है, क्योंकि बायोगैस संयंत्रों से निकलने वाली स्लरी का उपयोग फार्म ऑर्गेनिक मैन्योर (FOM), फॉस्फो-रिच ऑर्गेनिक मैन्योर (PROM) और लिक्विड फार्म ऑर्गेनिक मैन्योर (LFOM) जैसे जैविक उर्वरकों के निर्माण में किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी, मिट्टी की उर्वरता सुधरेगी और टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा मिलेगा।
उत्तर प्रदेश में बायोइकोनॉमी की अपार संभावनाएं
उत्तर प्रदेश का उल्लेख करते हुए डॉ. शाह ने कहा कि राज्य में विशाल गोवंश आधार और लगभग 500 वृहद गौ संरक्षण केंद्र मौजूद हैं। यदि इन केंद्रों को ऊर्जा एवं जैविक उर्वरक उत्पादन इकाइयों के रूप में विकसित किया जाए तो यह ग्रामीण विकास का बड़ा मॉडल बन सकता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि अलग-अलग संयंत्रों के बजाय एकीकृत ग्रामीण जैव-अर्थव्यवस्था (Integrated Rural Bioeconomy System) की दिशा में कार्य किया जाना चाहिए, जहां डेयरी क्लस्टर गोबर संग्रहण, ऊर्जा उत्पादन और जैविक उर्वरक निर्माण के साझा केंद्र बनें।
‘वेस्ट टू वेल्थ’ बनेगा विकसित भारत का आधार
कार्यक्रम के समापन पर डॉ. शाह ने कहा कि भारत की बायोएनर्जी यात्रा अब एक नए चरण में प्रवेश कर रही है। कृषि और डेयरी क्षेत्र को अधिक टिकाऊ बनाना तथा अपशिष्ट को संपदा में बदलना देश की प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि “वेस्ट टू वेल्थ” की अवधारणा किसानों की आय बढ़ाने, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को एक साथ हासिल करने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
बायोएनर्जी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गोबर आधारित ऊर्जा एवं जैविक उर्वरक मॉडल को बड़े स्तर पर अपनाया जाता है तो यह किसानों की लागत घटाने, ग्रामीण रोजगार सृजन और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
चित्र: सौजन्य सोशल मीडिया


























