
मूंगफली की खेती को मिलेगी नई दिशा, 87 देशों की 2,320 किस्मों के जीनोम अध्ययन से खुलेंगे उन्नत प्रजातियों के रास्ते
ICRISAT और चीन-ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि, Nature Genetics में प्रकाशित शोध से सूखा सहनशील, अधिक उपज देने वाली और बेहतर गुणवत्ता वाली मूंगफली विकसित करने में मिलेगी मदद
पटानचेरु (भारत): मूंगफली की खेती को अधिक पैदावार, जलवायु अनुकूल और किसानों के लिए लाभकारी बनाने की दिशा में अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (ICRISAT) के वैज्ञानिकों ने चीन और ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख कृषि अनुसंधान संस्थानों के साथ मिलकर दुनिया की खेती की जाने वाली मूंगफली का अब तक का सबसे व्यापक जीनोमिक अध्ययन पूरा किया है।
इस शोध में 87 देशों से जुटाए गए मूंगफली के 2,320 आनुवंशिक नमूनों (एक्सेशन्स) का विश्लेषण किया गया है। शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल Nature Genetics में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अध्ययन से मूंगफली की ऐसी उन्नत किस्में विकसित करने का रास्ता खुलेगा, जिनमें अधिक उत्पादन क्षमता, बेहतर पोषण गुणवत्ता और प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता होगी।
ICRISAT के जीन बैंक से मिली शोध को मजबूती
इस अंतरराष्ट्रीय शोध का शीर्षक Pan-genome-based resequencing of 2,320 accessions reveals structural variations and accelerates breeding advances in cultivated peanut है। अध्ययन का सह-नेतृत्व ICRISAT के सेंटर फॉर प्री-ब्रीडिंग रिसर्च (CPBR) में जीन बैंक एवं गुण खोज कार्यक्रम के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मनीष के. पांडेय ने किया।
इस शोध में चीन की शानडोंग एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज, मुरडॉक यूनिवर्सिटी ऑस्ट्रेलिया के स्टेट एग्रीकल्चरल बायोटेक्नोलॉजी सेंटर और हेनान एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया।
अध्ययन में शामिल 2,320 आनुवंशिक नमूने ICRISAT के कोर कलेक्शन का 88.03 प्रतिशत और अमेरिका के कृषि विभाग (USDA) के मूंगफली संग्रह का 59.21 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे स्पष्ट है कि यह शोध दुनिया में मूंगफली की उपलब्ध आनुवंशिक विविधता को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संसाधन साबित हो सकता है।
क्या है पैन-जीनोम और खेती में इसका महत्व?
इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता पैन-जीनोम तकनीक का इस्तेमाल है। सामान्य जीनोम अध्ययन में किसी फसल की एक या कुछ किस्मों के आनुवंशिक ढांचे का विश्लेषण किया जाता है, जबकि पैन-जीनोम अध्ययन में किसी फसल की अनेक किस्मों और उनके बीच मौजूद आनुवंशिक अंतर को व्यापक रूप से समझा जाता है।
मूंगफली के मामले में यह तकनीक इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबे समय से इसकी उन्नत किस्मों के विकास में सीमित आनुवंशिक विविधता एक बड़ी चुनौती रही है। नए अध्ययन से ऐसे आनुवंशिक बदलावों की पहचान हुई है, जो पहले सामान्य विश्लेषण में सामने नहीं आ पाए थे।
वैज्ञानिकों ने मूंगफली के जीनोम में स्ट्रक्चरल वेरिएशंस (आनुवंशिक संरचनात्मक बदलाव) और होमियोलॉगस एक्सचेंज की पहचान की है। ये खोजें पौधे के विकास, उत्पादन क्षमता और कृषि संबंधी महत्वपूर्ण गुणों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेंगी।
फूल आने के समय और पौधे की ऊंचाई नियंत्रित करने वाले जीन की पहचान
शोध में कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण दो जीन विशेष रूप से सामने आए हैं। इनमें AhTFL1 जीन फूल आने के समय के नियमन से जुड़ा है, जबकि Ah12g032500 को मूंगफली में पौधे की कम ऊंचाई यानी बौनेपन से संबंधित जीन के रूप में पहचाना गया है।
इन जीनों की पहचान भविष्य में ऐसी किस्में विकसित करने में उपयोगी हो सकती है, जिनमें फूल आने का समय नियंत्रित हो और पौधों की संरचना खेती की जरूरतों के अनुरूप हो।
कम ऊंचाई वाले पौधों से खेतों में अधिक घनत्व पर बुवाई और मशीनीकृत कटाई की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इससे खेती की लागत और श्रम संबंधी चुनौतियों को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इन गुणों का वास्तविक लाभ किस्म, क्षेत्र और खेती की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
इसके अलावा, शोध से बीज के आकार और प्रति पौधे फलियों की संख्या जैसे महत्वपूर्ण गुणों से जुड़े बेहतर आनुवंशिक विकल्पों की पहचान का आधार भी तैयार हुआ है।
छोटे किसानों के लिए जलवायु अनुकूल किस्में विकसित करने की उम्मीद
मूंगफली भारत सहित दुनिया के कई अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों की प्रमुख तिलहनी फसल है। सीमित वर्षा, बढ़ता तापमान, अनियमित मानसून और खेती की बढ़ती लागत इसके उत्पादन को प्रभावित करते हैं।
ऐसे में इस अध्ययन से प्राप्त आनुवंशिक जानकारी का इस्तेमाल ऐसी किस्मों के विकास में किया जा सकता है, जो बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
विशेष रूप से भारत के राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे प्रमुख मूंगफली उत्पादक राज्यों के लिए इस तरह का अनुसंधान भविष्य में उपयोगी साबित हो सकता है। हालांकि, नई किस्मों को किसानों तक पहुंचाने से पहले उनका स्थानीय परिस्थितियों में परीक्षण और मूल्यांकन आवश्यक होगा।
ICRISAT महानिदेशक ने बताया महत्वपूर्ण उपलब्धि
ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने इस उपलब्धि को वैश्विक कृषि अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि पैन-जीनोम अध्ययन कृषि अनुसंधान को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने बताया कि ICRISAT ने चना और अरहर जैसी महत्वपूर्ण दलहनी फसलों के पैन-जीनोम अनुसंधान में भी योगदान दिया है। मूंगफली पर Nature Genetics में प्रकाशित यह अध्ययन शुष्क क्षेत्रों के छोटे किसानों के लिए बेहतर फसल किस्में विकसित करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग से कृषि विज्ञान को मिलेगी गति
ICRISAT के उप महानिदेशक (अनुसंधान एवं नवाचार) डॉ. स्टैनफोर्ड ब्लेड ने इस शोध में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने चीन के अनुसंधान संस्थानों, मुरडॉक यूनिवर्सिटी और ICRISAT के सेंटर फॉर प्री-ब्रीडिंग रिसर्च की संयुक्त भागीदारी की सराहना की।
उनके अनुसार, पैन-जीनोम जैसे जटिल अनुसंधान के लिए विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों और संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग जरूरी है, ताकि प्रयोगशालाओं में होने वाली खोजों को किसानों के खेतों तक पहुंचाया जा सके।
जीन बैंक में संरक्षित विविधता बनी शोध की आधारशिला
ICRISAT के ग्लोबल रिसर्च प्रोग्राम-एक्सेलेरेटेड क्रॉप इम्प्रूवमेंट के निदेशक डॉ. रमन बाबू ने कहा कि इस उपलब्धि में ICRISAT के जीन बैंक की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
उन्होंने बताया कि फूल आने के समय और पौधे की ऊंचाई जैसे गुणों से जुड़े जीन की पहचान जलवायु अनुकूल मूंगफली की किस्मों के विकास के लिए नए अवसर उपलब्ध कराती है। यह अध्ययन इस बात का उदाहरण है कि जीन बैंक में वर्षों से संरक्षित फसल विविधता का उपयोग भविष्य की कृषि चुनौतियों से निपटने के लिए कैसे किया जा सकता है।
मूंगफली की उत्पादकता और गुणवत्ता सुधारने की नई संभावनाएं
अध्ययन के सह-नेता डॉ. मनीष के. पांडेय के अनुसार, मूंगफली की खेती में लंबे समय से सीमित आनुवंशिक आधार एक चुनौती बना हुआ है। नया ग्राफ-आधारित पैन-जीनोम इस फसल में मौजूद संरचनात्मक आनुवंशिक विविधताओं को सामने लाता है।
उन्होंने कहा कि यह सार्वजनिक वैज्ञानिक संसाधन दुनिया भर के प्रजनन कार्यक्रमों को अधिक उत्पादन देने वाली, बेहतर पोषण गुणवत्ता वाली और जलवायु अनुकूल मूंगफली की किस्में विकसित करने में तेजी लाने में मदद कर सकता है।
किसानों तक शोध का लाभ पहुंचाना होगी अगली चुनौती
इस अध्ययन की अहमियत केवल वैज्ञानिक खोज तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक लाभ तभी सामने आएगा, जब पहचाने गए उपयोगी जीन और आनुवंशिक विविधताओं को उन्नत किस्मों के विकास में शामिल करके किसानों तक पहुंचाया जाएगा।
इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों को स्थानीय जलवायु, मिट्टी, सिंचाई की उपलब्धता, उत्पादन लागत और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर नई किस्मों का विकास करना होगा।
कुल मिलाकर, 87 देशों के 2,320 आनुवंशिक नमूनों पर आधारित यह शोध मूंगफली अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे भविष्य में अधिक उत्पादक, पोषण की दृष्टि से बेहतर और जलवायु परिवर्तन का सामना करने में सक्षम किस्मों के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद है।
विशेष विश्लेषण:
मूंगफली की खेती में भविष्य की बड़ी चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि कम पानी, बदलते मौसम और बढ़ती लागत के बीच किसानों को अधिक लाभ देना है। ICRISAT का यह शोध उसी दिशा में आनुवंशिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल का रास्ता खोलता है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि प्रयोगशाला में मिली इन वैज्ञानिक सफलताओं को खेतों में उपयोगी किस्मों और किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी में कितनी तेजी से बदला जा सकता है।





























