खेत से कुलपति तक: किसान वैज्ञानिक की कहानी डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने बदल दी बिहार की खेती की तस्वीर!
मुजफ्फरपुर। –कुछ कहानियां केवल सफलता की नहीं होतीं, बल्कि मिट्टी, संघर्ष और समाज के प्रति समर्पण की मिसाल बन जाती हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मतलुपुर गांव से निकलकर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल पद्मश्री तक पहुंचने वाले 96 वर्षीय कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपालजी त्रिवेदी की कहानी भी ऐसी ही है।
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वर्ष 2026 के पद्म पुरस्कारों की घोषणा में जब उनका नाम सामने आया, तो केवल एक वैज्ञानिक सम्मानित नहीं हुआ, बल्कि बिहार के खेत, किसान और ग्रामीण शिक्षा का संघर्ष भी राष्ट्रीय पहचान पा गया।
यह कहानी उस व्यक्ति की है जिसने बचपन में आर्थिक तंगी के कारण किताबें छोड़ हल थामा, लेकिन बाद में वही किसान पुत्र कृषि विश्वविद्यालय का कुलपति बना और फिर गांव लौटकर किसानों के बीच रहने लगा।
जब पिता चले गए और खेत बन गया जीवन
15 फरवरी 1930 को बिहार के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे गोपालजी त्रिवेदी बचपन से ही पढ़ाई में तेज थे। गांव के स्कूल में पढ़ने वाले इस बालक को गणित और विज्ञान में विशेष रुचि थी।
लेकिन जिंदगी ने जल्दी परीक्षा ले ली। किशोरावस्था में ही पिता का निधन हो गया। परिवार पर आर्थिक संकट टूट पड़ा। पढ़ाई रोककर खेती संभालनी पड़ी। खेत ही उनका स्कूल बन गया और संघर्ष उनकी पाठशाला।
गांव के लोग बताते हैं कि उस समय परिवार की हालत ऐसी थी कि पढ़ाई जारी रखना लगभग असंभव माना जा रहा था। लेकिन उनकी मां को बेटे की प्रतिभा पर भरोसा था। उन्होंने बेटे को हार नहीं मानने दी।
पोस्टकार्ड से शुरू हुआ नया सफर
कहते हैं कि प्रतिभा रास्ता खुद बना लेती है। गोपालजी ने कृषि शिक्षा के लिए पोस्टकार्ड पर आवेदन लिखा। उनकी लगन और मेधा को देखते हुए पूसा कृषि संस्थान ने उन्हें दाखिला दिया और छात्रवृत्ति भी मिली।
इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पूसा से हाई स्कूल करने के बाद एल.एस. कॉलेज से इंटरमीडिएट और फिर सबौर कृषि महाविद्यालय से कृषि स्नातक तथा स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। आगे चलकर उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) से पीएचडी की उपाधि हासिल की।
उनका पूरा जीवन कृषि शिक्षा और किसान कल्याण को समर्पित रहा।
वर्ष 1961 में उन्होंने तिरहुत कृषि महाविद्यालय, ढोली में कृषि प्रसार शिक्षा विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्य शुरू किया। बाद में वे राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में निदेशक (प्रसार शिक्षा) बने और वर्ष 1988 से 1992 तक कुलपति पद पर रहे।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि “किसानों के वैज्ञानिक” के रूप में बनी।
लीची खेती में बड़ा बदलाव
मुजफ्फरपुर की लीची को नई पहचान दिलाने में भी डॉ. त्रिवेदी की अहम भूमिका मानी जाती है। उन्होंने पुराने लीची बागानों में वैज्ञानिक तरीके से “कैनोपी मैनेजमेंट” तकनीक को बढ़ावा दिया।
इस तकनीक से पुराने पेड़ों में दोबारा बेहतर उत्पादन शुरू हुआ। किसानों को पेड़ों की सही छंटाई, रखरखाव और पोषण के तरीके बताए गए। इसका असर यह हुआ कि लीची की पैदावार और गुणवत्ता दोनों बेहतर हुईं।
आज कई किसान मानते हैं कि उनकी आय बढ़ाने में इस पहल का बड़ा योगदान रहा।
मखाना और विंटर मक्का क्रांति के सूत्रधार
डॉ. त्रिवेदी ने केवल बागवानी तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने बिहार की भौगोलिक परिस्थितियों को समझते हुए किसानों को वैकल्पिक खेती की ओर प्रेरित किया।
उन्होंने जल-जमाव वाले इलाकों में मखाना और सिंघाड़े की व्यावसायिक खेती को बढ़ावा दिया। उस समय यह खेती सीमित मानी जाती थी, लेकिन वैज्ञानिक मार्गदर्शन के बाद यह हजारों किसानों की आय का जरिया बनी।
इसी तरह बिहार में विंटर मक्का खेती को लोकप्रिय बनाने में भी उनकी भूमिका अहम रही। आज बिहार देश के बड़े मक्का उत्पादक राज्यों में गिना जाता है।
सेवानिवृत्ति के बाद फिर गांव लौट आए
बहुत से लोग बड़े पदों से रिटायर होकर शहरों में बस जाते हैं, लेकिन डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने अलग रास्ता चुना।
1992 में कुलपति पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वे वापस अपने गांव मतलुपुर लौट आए। उनका मानना था कि असली जरूरत गांवों और किसानों के बीच रहकर काम करने की है।
उन्होंने खेतों में जाकर किसानों की समस्याएं सुनीं, आधुनिक खेती की जानकारी दी और खुद खेती करके उदाहरण प्रस्तुत किया। धीरे-धीरे लोग उन्हें “किसान मित्र” कहने लगे।
उनके करीबी बताते हैं कि वे हमेशा कहते थे — “विश्वास और फसल दोनों समय लेते हैं।”
पद्मश्री केवल सम्मान नहीं, एक संदेश
जब 25 जनवरी 2026 को पद्म पुरस्कारों की घोषणा हुई, तब डॉ. त्रिवेदी अपने घर पर पूजा कर रहे थे। फोन पर मिली सूचना सुनकर वे भावुक हो गए।
उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि उन किसानों का है जिनके बीच उन्होंने पूरा जीवन बिताया।
कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे समय में जब खेती नई चुनौतियों से जूझ रही है, डॉ. त्रिवेदी का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने साबित किया कि कृषि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका असली उद्देश्य किसानों का जीवन बदलना है।
