विकसित भारत की दिशा में मत्स्यपालन तकनीक का बड़ा कदम!

विज्ञान और समाज के समन्वय से मीठे पानी की मत्स्यपालन को मिलेगा नया विस्तार आईसीएआर–सीफा की राष्ट्रीय कार्यशाला में तकनीक प्रसार पर मंथन, किसानों की आय और ग्रामीण आजीविका पर फोकस !!

भुवनेश्वर।-देश में मीठे पानी की मत्स्यपालन को वैज्ञानिक आधार पर सशक्त बनाने और आधुनिक तकनीकों को किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने के उद्देश्य से आईसीएआर–केंद्रीय मीठा पानी मत्स्यपालन संस्थान (ICAR-CIFA), भुवनेश्वर द्वारा एक एकदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का विषय था — “भारत में मीठे पानी की मत्स्यपालन तकनीक का प्रसार: आगे की राह”। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य देशभर में प्रमाणित और सफल मत्स्यपालन तकनीकों के व्यापक अंगीकरण को बढ़ावा देना तथा विज्ञान और समाज के बीच मजबूत सेतु का निर्माण करना रहा।

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विज्ञान-सामाजिक जुड़ाव से ही होगा मत्स्य क्षेत्र का विकास !!

कार्यशाला को संबोधित करते हुए डॉ. एम.एल. जाट, सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) एवं महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने कहा कि विज्ञान को समाज से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि अनुसंधान प्रयोगशालाओं तक सीमित रह जाए तो उसका वास्तविक लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता। मीठे पानी की मत्स्यपालन में वैज्ञानिक नवाचारों को खेत और तालाब स्तर तक पहुंचाकर ही उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है, किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है और ग्रामीण आजीविका को मजबूती मिल सकती है। डॉ. जाट ने अटारी (ATARIs) और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि ये संस्थान अनुसंधान और किसानों के बीच सेतु का कार्य करते हैं। उन्होंने समन्वय और टीमवर्क आधारित पांच वर्षीय स्पष्ट कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिससे ‘विकसित भारत’ के विजन को धरातल पर उतारा जा सके।

केवीके विशेषज्ञों का क्षमता निर्माण जरूरी !!

डॉ. जे.के. जेना, उप महानिदेशक (मत्स्य विज्ञान) ने कहा कि मीठे पानी की मत्स्यपालन तकनीकों के बड़े पैमाने पर प्रसार के लिए केवीके के विषय-वस्तु विशेषज्ञों (SMS) का नियमित प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब तक जमीनी स्तर पर कार्यरत विशेषज्ञ नई तकनीकों से भली-भांति परिचित नहीं होंगे, तब तक किसानों में उनका व्यापक अंगीकरण संभव नहीं हो पाएगा।

किसान-केंद्रित तकनीकों में अपार संभावनाएं !!

डॉ. राजबीर सिंह, उप महानिदेशक (कृषि विस्तार) ने अपने संबोधन में कहा कि आईसीएआर–सीफा द्वारा विकसित तकनीकें पूरी तरह किसान-केंद्रित हैं और उनमें बड़े स्तर पर विस्तार की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि यदि इन तकनीकों को मजबूत विस्तार नेटवर्क के माध्यम से किसानों तक पहुंचाया जाए तो देश में मीठे पानी की मत्स्यपालन एक लाभकारी और टिकाऊ उद्यम के रूप में स्थापित हो सकता है।

देशभर में 34 मत्स्य क्लस्टरों की स्थापना !!

कार्यशाला में श्री सागर मेहरा, संयुक्त सचिव (अंतर्देशीय मत्स्य), भारत सरकार ने जानकारी दी कि केंद्र सरकार द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में 34 मत्स्य क्लस्टरों की स्थापना की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक और क्षेत्र-विशेष समन्वय रोडमैप तैयार करना आवश्यक है, ताकि योजनाओं और तकनीकों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।

संस्थागत समन्वय और अंतिम छोर तक पहुंच पर जोर !!

डॉ. बी.के. बेहेरा, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB) ने कहा कि मीठे पानी की मत्स्यपालन तकनीकों को तेजी से अपनाने के लिए संस्थागत समन्वय, बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कार्यक्रम और मजबूत ‘लास्ट-माइल’ विस्तार प्रणाली की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जब तक तकनीकें सीधे किसानों तक नहीं पहुंचेंगी, तब तक अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं किए जा सकते।

आय, पोषण सुरक्षा और सतत आजीविका का लक्ष्य !!

कार्यशाला के प्रारंभिक सत्र में डॉ. पी.के. साहू, निदेशक, आईसीएआर–सीफा ने कहा कि मीठे पानी की मत्स्यपालन तकनीकों का राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी प्रसार किसानों की आय बढ़ाने, पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने और सतत आजीविका को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगा। उन्होंने सभी संबंधित संस्थानों से समन्वित राष्ट्रीय प्रयास करने का आह्वान किया।

आगे की राह !!

कार्यशाला में विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि विज्ञान, नीति, विस्तार तंत्र और किसानों के बीच मजबूत साझेदारी के बिना मीठे पानी की मत्स्यपालन में अपेक्षित प्रगति संभव नहीं है। प्रतिभागियों ने यह भी माना कि आने वाले वर्षों में सुनियोजित कार्ययोजना और प्रभावी समन्वय से यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बन सकता है।