वैज्ञानिकों ने तय की धान की नई रणनीति!
कटक — देश में धान की पैदावार को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए 61वीं वार्षिक राइस ग्रुप मीटिंग (ARGM) का भव्य शुभारंभ हुआ। इस राष्ट्रीय स्तर की बैठक में कृषि वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं ने धान अनुसंधान की भावी रणनीतियों पर गहन मंथन किया।
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धान अनुसंधान में तेजी लाने पर जोर
मुख्य अतिथि डॉ. एम. एल. जाट (सचिव, DARE एवं महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) ने अपने संबोधन में कहा कि देश में बढ़ती खाद्य मांग को देखते हुए धान की पैदावार और गुणवत्ता दोनों में सुधार अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने वर्षा आधारित और सिंचित दोनों कृषि प्रणालियों में आनुवंशिक सुधार (Genetic Gains) को तेज करने पर विशेष बल दिया।
उन्होंने प्री-ब्रीडिंग कार्यक्रमों को मजबूत करने, विशेष गुणों वाली किस्मों के विकास, जीनोम एडिटिंग जैसी उन्नत तकनीकों के उपयोग और हाइब्रिड धान के विस्तार को समय की मांग बताया। साथ ही उन्होंने डेटा-आधारित उत्पाद प्रोफाइलिंग और पोषक तत्व तथा जल उपयोग दक्षता को दोगुना करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
अगली पीढ़ी की ब्रीडिंग तकनीकों पर फोकस
डॉ. डी. के. यादव (डीडीजी, फसल विज्ञान) ने कहा कि अब पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ आधुनिक ब्रीडिंग तकनीकों को अपनाना जरूरी हो गया है। उन्होंने AICRPR के अंतर्गत आने वाले केंद्रों के लिए प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में उन्हीं केंद्रों को प्राथमिकता दी जाएगी, जहां परीक्षण कार्य उच्च गुणवत्ता के साथ किए जाएंगे।
AICRPR ट्रायल्स और उपलब्धियों की प्रस्तुति
बैठक में डॉ. आर. एम. सुंदरम ने वर्ष 2025 के दौरान AICRPR (All India Coordinated Rice Improvement Programme) के अंतर्गत किए गए परीक्षणों की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में उन्नत किस्मों के प्रदर्शन और उनकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
वहीं डॉ. जी. ए. के. कुमार, निदेशक ICAR-राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान ने संस्थान द्वारा वर्ष 2025 में हासिल की गई प्रमुख उपलब्धियों को साझा किया। उन्होंने बताया कि अनुसंधान के क्षेत्र में नई किस्मों के विकास, जलवायु अनुकूल तकनीकों और उन्नत कृषि प्रबंधन पद्धतियों पर विशेष कार्य किया गया है।
समन्वित अनुसंधान और सहयोग पर बल
डॉ. एस. के. प्रधान ने कहा कि धान अनुसंधान को अधिक प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न संस्थानों के बीच समन्वय बेहद जरूरी है। उन्होंने वैज्ञानिकों से साझा प्रयासों के माध्यम से बेहतर परिणाम हासिल करने का आह्वान किया।
वहीं डॉ. ए. के. सिंह ने बहु-संस्थागत सहयोग और प्रयोगशाला से खेत तक (Lab to Land) तकनीकों के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर जोर दिया।
वैज्ञानिक सत्रों में अहम मुद्दों पर चर्चा
बैठक के दौरान आयोजित वैज्ञानिक सत्रों में कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। इनमें प्रमुख रूप से—
- उन्नत किस्मों का विकास और मूल्यांकन
- धान के दाने की गुणवत्ता में सुधार
- जैविक और अजैविक तनावों (कीट, रोग, सूखा, लवणता) के प्रति सहनशीलता
- संसाधन उपयोग दक्षता
- प्रिसिजन एग्रीकल्चर के लिए डिजिटल तकनीकों का उपयोग
विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए स्थिर उत्पादन, बायोफोर्टिफिकेशन, लवणता सहनशील किस्मों और एकीकृत फसल प्रबंधन पर भी गहन चर्चा की।
महत्वपूर्ण निर्णय और भविष्य की रणनीति
बैठक के अंत में कई अहम निर्णय लिए गए, जिनमें—
- बहु-स्थान (Multi-location) परीक्षण प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देना
- प्री-रिलीज ट्रायल्स के लिए संभावित जीनोटाइप की पहचान
- विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में नई किस्मों के प्रसार की रणनीति तैयार करना
इन निर्णयों का उद्देश्य किसानों तक बेहतर और उन्नत धान किस्मों को तेजी से पहुंचाना है।
किसानों के लिए क्या है मायने
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बैठक में लिए गए निर्णय आने वाले वर्षों में धान की फसल को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और जलवायु के अनुकूल बनाने में मदद करेंगे। इससे न केवल उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।
धान अनुसंधान के क्षेत्र में इस तरह के समन्वित प्रयास भारत को खाद्य सुरक्षा के लक्ष्य की ओर और अधिक मजबूती से आगे बढ़ाएंगे।
स्रोत: ICAR-CRRI