मध्यप्रदेश की पहली कृषि कैबिनेट: ₹27,500 करोड़ की ऐतिहासिक मंजूरी!

नागलवाड़ी से कृषि क्रांति की शुरुआत!


भोपाल –मध्यप्रदेश के जनजातीय अंचल नागलवाड़ी (जिला बड़वानी) में आयोजित मंत्रि-परिषद की पहली कृषि कैबिनेट ने प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाले ऐतिहासिक फैसले लिए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कृषि, सिंचाई, पशुपालन, मत्स्य, उद्यानिकी और सहकारिता से जुड़ी ₹27,500 करोड़ की योजनाओं को स्वीकृति प्रदान की गई।

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यह बैठक केवल बजट स्वीकृति तक सीमित नहीं रही, बल्कि “किसान कल्याण वर्ष” के तहत ग्रामीण आय बढ़ाने, रोजगार सृजन और उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण तक संपूर्ण कृषि श्रृंखला को मजबूत करने की व्यापक रणनीति भी सामने आई।

जनजातीय अंचल से विकास का संदेश

नागलवाड़ी के भीलट बाबा देवस्थल पर आयोजित इस विशेष कैबिनेट में मंत्रियों ने जनजातीय परंपरागत वेशभूषा धारण कर सामाजिक समावेशन का संदेश दिया। सरकार ने संकेत दिया कि विकास की मुख्यधारा में जनजातीय क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि जनजातीय बहुल बड़वानी जैसे जिलों में निवेश से पलायन रुकेगा और स्थानीय स्तर पर कृषि आधारित रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।

सिंचाई क्षेत्र में बड़ा निवेश: जल प्रबंधन पर फोकस

नर्मदा नियंत्रण मंडल की बैठक में बड़वानी जिले की दो महत्वाकांक्षी माइक्रो सिंचाई उद्वहन परियोजनाओं को कुल ₹2,067.97 करोड़ की प्रशासकीय स्वीकृति दी गई।

▶️ वरला माइक्रो सिंचाई परियोजना
  • 33 गांवों की 15,500 हेक्टेयर भूमि सिंचित

  • नर्मदा नदी से 51.42 एमसीएम जल उद्वहन

  • लागत: ₹860.53 करोड़

▶️ पानसेमल माइक्रो सिंचाई परियोजना
  • 53 गांवों की 22,500 हेक्टेयर भूमि सिंचित,  74.65 एमसीएम जल उद्वहन, लागत: ₹1,207.44 करोड़

इन परियोजनाओं से वर्षा पर निर्भर खेती कम होगी, फसल चक्र विविध होगा और बागवानी व नकदी फसलों का रकबा बढ़ सकेगा। माइक्रो सिंचाई तकनीक से जल संरक्षण भी सुनिश्चित होगा।

मत्स्य क्षेत्र को औद्योगिक पहचान: नई नीति 2026

मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश एकीकृत मत्स्य उद्योग नीति-2026 को मंजूरी दी।

  • 3 वर्षों में ₹3,000 करोड़ निवेश लक्ष्य. 20,000 रोजगार सृजन, लगभग 1 लाख आधुनिक केज कल्चर इकाइयाँ

  • ईको-टूरिज्म व ग्रीन एनर्जी आधारित मॉडल

यह नीति मत्स्य उत्पादन को ग्रामीण स्टार्टअप मॉडल से जोड़ती है। जलाशयों के आसपास पर्यटन और ऊर्जा परियोजनाओं से अतिरिक्त आय के अवसर बनेंगे।

पशुपालन और डेयरी: आय का दूसरा मजबूत स्तंभ

🐄 पशु स्वास्थ्य अधोसंरचना
  • ₹610.51 करोड़ (2026–2031), ग्रामीण पशु चिकित्सालयों का उन्नयन

🐄 राष्ट्रीय गोकुल मिशन अंतर्गत परियोजना
  • ₹656 करोड़, सोर्टेड सेक्स्ड सीमन तकनीक से उच्च नस्लीय मादा पशुधन वृद्धि

पशुपालन एवं डेयरी योजनाएँ
  • ₹6,518 करोड़, टीकाकरण, रोग उन्मूलन, मुर्गी पालन, भेड़-बकरी विकास

पशुपालन को कृषि का पूरक मानते हुए सरकार ने दूध, मांस और अंडा उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है, जिससे किसानों को नियमित नकद आय मिल सके।

सहकारिता और सस्ती ऋण व्यवस्था से किसानों को राहत

💰 शून्य प्रतिशत ब्याज पर फसल ऋण
  • ₹3,909 करोड़, ₹3 लाख तक अल्पकालीन ऋण,

  • 🏦 सहकारी बैंकों को अंश पूंजी सहायता

  • ₹1,975 करोड़

📊 सहकारी संस्थाओं के संचालन हेतु
  • ₹1,073 करोड़, अन्य योजनाओं हेतु ₹1,229 करोड़

सहकारी ढांचे को मजबूत कर सरकार किसानों की वित्तीय निर्भरता साहूकारों से हटाकर संस्थागत बैंकिंग पर केंद्रित करना चाहती है।

उद्यानिकी और खाद्य प्रसंस्करण: मूल्य संवर्धन की दिशा में कदम

🌱 राष्ट्रीय उद्यानिकी मिशन
  • ₹1,150 करोड़

🍅 सूक्ष्म खाद्य उद्यम उन्नयन योजना
  • ₹1,375 करोड़, प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना

🌿 पौधशाला उद्यान
  • ₹1,739 करोड़, गुणवत्तापूर्ण पौध व बीज उपलब्धता

कृषि उत्पादन को सीधे बाजार में बेचने के बजाय प्रोसेसिंग से जोड़ने की रणनीति स्पष्ट है। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में एग्री-बेस्ड उद्योग विकसित होंगे।

20 कृषि विकास परियोजनाओं को निरंतरता

₹3,502 करोड़ की लागत से 20 परियोजनाओं को 31 मार्च 2031 तक जारी रखने का निर्णय लिया गया है। इससे चल रही योजनाओं की स्थिरता बनी रहेगी।

भविष्य की रणनीति: हर अंचल में कृषि कैबिनेट

मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि आगामी समय में प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में कृषि कैबिनेट आयोजित की जाएगी, ताकि स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप निर्णय लिए जा सकें।

सारांश

पहली कृषि कैबिनेट के फैसले यह दर्शाते हैं कि सरकार कृषि को केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे समग्र ग्रामीण उद्योग के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।

यदि सिंचाई परियोजनाएँ समय पर पूरी होती हैं, पशुपालन व मत्स्य योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन होता है और सहकारिता तंत्र मजबूत रहता है, तो आने वाले पाँच वर्षों में प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन संभव है।