पर्वतीय किसानों के लिए खुशखबरी, आएंगी नई उन्नत फसलों की किस्में!

हिमालयी किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में बढ़ते कदम!

नई दिल्ली/शिमला, –हिमालयी राज्यों के किसानों और बागवानों की आय बढ़ाने तथा बदलती जलवायु चुनौतियों के अनुरूप कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) ने नई पहल तेज कर दी है। इसी क्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. सी.एच. श्रीनिवास राव ने 11-12 जून को आईएआरआई के क्षेत्रीय केंद्र, शिमला का दौरा कर वहां संचालित अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों की समीक्षा की।

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दौरे के दौरान डॉ. राव ने वैज्ञानिकों को पर्वतीय राज्यों की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए खाद्यान्न एवं फल फसलों की नई, अधिक उत्पादक और जलवायु-अनुकूल किस्मों के विकास पर विशेष ध्यान देने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान और मौसम के बदलते स्वरूप को देखते हुए कम शीत आवश्यकता (Low Chilling Requirement) वाली सेब एवं अन्य शीतोष्ण फल फसलों की किस्मों का विकास समय की आवश्यकता बन गया है।

जल संरक्षण और हरित ऊर्जा को बढ़ावा

केंद्र में कृषि अनुसंधान को अधिक सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से डॉ. राव ने 50 हजार लीटर क्षमता वाले सिंचाई जल भंडारण टैंक का उद्घाटन किया। इसके साथ ही उन्होंने सौर ऊर्जा उत्पादन प्रणाली का शुभारंभ भी किया। यह पहल न केवल जल संरक्षण को बढ़ावा देगी, बल्कि कृषि अनुसंधान केंद्र को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में भी सहायक होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में जल संसाधनों का कुशल प्रबंधन और नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग भविष्य की टिकाऊ कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

हिमाचल सरकार से तकनीक हस्तांतरण पर चर्चा

दौरे के दौरान डॉ. राव ने भारतीय केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. ब्रजेश सिंह के साथ हिमाचल प्रदेश सरकार के कृषि एवं बागवानी सचिव से मुलाकात की। इस बैठक में अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित आधुनिक तकनीकों, उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक नवाचारों को किसानों तक तेजी से पहुंचाने पर चर्चा हुई।

विशेषज्ञों के अनुसार अनुसंधान प्रयोगशालाओं से खेतों तक तकनीकों का प्रभावी हस्तांतरण कृषि उत्पादकता बढ़ाने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।

रोग प्रतिरोधी गेहूं और जौ की किस्मों में महत्वपूर्ण योगदान

वर्ष 1935 में स्थापित आईएआरआई क्षेत्रीय केंद्र, शिमला पिछले कई दशकों से हिमालयी राज्यों के लिए रोग प्रतिरोधी गेहूं एवं जौ की किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

केंद्र के अध्यक्ष डॉ. धर्म पाल ने बताया कि HS-507, HS-542, HS-562 तथा HD-3226 जैसी उन्नत गेहूं किस्मों का प्रजनक बीज किसानों को उपलब्ध कराया जा रहा है। इन किस्मों की विशेषता बेहतर उत्पादन क्षमता और रोगों के प्रति अधिक सहनशीलता है।

इसके अलावा, जनजातीय क्षेत्रों में पोषण सुरक्षा और आय वृद्धि को ध्यान में रखते हुए नग्न जौ (Hull-less Barley) की नई किस्म BSH-497 को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है। यह फसल पोषक तत्वों से भरपूर होने के साथ-साथ पहाड़ी क्षेत्रों की जलवायु के लिए भी उपयुक्त मानी जाती है।

सेब, कीवी और अखरोट उत्पादन को मिलेगा प्रोत्साहन

फल फसलों के क्षेत्र में भी शिमला केंद्र उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। केंद्र द्वारा विकसित ‘पूसा गोल्ड’ सेब की किस्म, विभिन्न कीवी किस्मों तथा ‘पूसाखोर’ अखरोट के पौधों को बागवानों तक पहुंचाया जा रहा है। इन उन्नत किस्मों से उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ फल की गुणवत्ता में भी सुधार की उम्मीद है।

केंद्र द्वारा विकसित वूली एफिड ट्रैप तथा शीतोष्ण फल फसलों में रोगों की त्वरित पहचान के लिए तैयार उन्नत परीक्षण प्रोटोकॉल भी किसानों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं। इससे कीट एवं रोग प्रबंधन अधिक प्रभावी बन सकेगा।

जनजातीय एवं अनुसूचित जाति किसानों तक पहुंच रहीं तकनीकें

SCSP और TSP कार्यक्रमों के तहत क्षेत्रीय केंद्र द्वारा आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों तथा छोटे कृषि उपकरणों का वितरण भी किया जा रहा है। इससे सीमांत, छोटे और जनजातीय किसानों को आधुनिक कृषि अपनाने में मदद मिल रही है।

किसान-केंद्रित नवाचारों को मिलेगी नई गति

डॉ. श्रीनिवास राव ने कहा कि शिमला केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किए जा रहे अनुसंधान कार्य पर्वतीय कृषि के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस दौरे से वैज्ञानिकों और कर्मचारियों का मनोबल बढ़ेगा तथा पर्वतीय क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप किसान-केंद्रित नवाचारों और उन्नत कृषि प्रौद्योगिकियों के विकास को नई गति मिलेगी।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच पर्वतीय कृषि के लिए विकसित की जा रही नई किस्में और आधुनिक तकनीकें आने वाले वर्षों में किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।