धान से आगे बढ़ा ओडिशा, अब मूंगफली और सूरजमुखी पर बड़ा दांव!

ओडिशा में तिलहन क्रांति की नई शुरुआत: 2,000 टन गुणवत्तापूर्ण बीज पैदावार से किसानों को मिला आत्मनिर्भरता का रास्ता!

भुवनेश्वर। धान की पैदावार के लिए देशभर में पहचान बना चुका ओडिशा अब तिलहन पैदावार में भी नई मिसाल कायम करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य में विकेन्द्रीकृत बीज उत्पादन प्रणाली (Decentralized Seed Production System) के माध्यम से 2,000 मीट्रिक टन से अधिक गुणवत्तापूर्ण मूंगफली और सूरजमुखी बीज का उत्पादन किया गया है, जिससे तिलहन फसलों का रकबा बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

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यह पहल राज्य सरकार की ‘समृद्धि नीति-2020’ के तहत इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (ICRISAT) के सहयोग से संचालित की जा रही है। इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में विविधीकरण को बढ़ावा देना, खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम करना तथा किसानों को अधिक लाभकारी फसलों की ओर आकर्षित करना है।

धान की खेती में सफलता, लेकिन तिलहन में बनी हुई थी चुनौती

पिछले दो दशकों में ओडिशा ने धान की पैदावार में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। वर्ष 2000-01 में जहां राज्य का धान उत्पादन 46.14 लाख मीट्रिक टन था, वहीं 2022-23 में यह बढ़कर 115 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया। इसके बावजूद राज्य में तिलहन उत्पादन की लगभग 20 प्रतिशत कमी बनी हुई है, जिसके कारण खाद्य तेलों की आपूर्ति के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भरता बढ़ती जा रही थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ती आबादी और खाद्य तेलों की मांग को देखते हुए घरेलू उत्पादन बढ़ाना समय की आवश्यकता है। इसी चुनौती को अवसर में बदलने के लिए राज्य सरकार ने तिलहन क्षेत्र में व्यापक रणनीति तैयार की।

गुणवत्तापूर्ण बीज बना बदलाव की सबसे बड़ी ताकत

ICRISAT के ग्लोबल सीड सिस्टम विशेषज्ञ डॉ. मंजूर डार के अनुसार, किसी भी फसल के सफल विस्तार की नींव गुणवत्तापूर्ण बीज होते हैं। उन्होंने बताया कि ओडिशा में विकसित विकेन्द्रीकृत बीज उत्पादन प्रणाली स्थानीय स्तर पर बीज उपलब्धता सुनिश्चित कर रही है, जिससे किसान बेहतर किस्मों को अपनाकर अधिक उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं।

इस कार्यक्रम के तहत कृषि एवं किसान सशक्तिकरण विभाग, ओडिशा राज्य बीज निगम (OSSC) और ओडिशा स्टेट सीड एंड ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स सर्टिफिकेशन एजेंसी (OSSOPCA) के सहयोग से मूंगफली और सूरजमुखी की उन्नत किस्मों का चयन एवं परीक्षण किया गया।

चार जिलों को बनाया गया बीज उत्पादन हब

राज्य के बरगढ़, कालाहांडी, नुआपाड़ा और क्योंझर जिलों को बीज उत्पादन के प्रमुख केंद्रों के रूप में विकसित किया गया। यहां किसानों को आनुवंशिक रूप से शुद्ध प्रारंभिक बीज उपलब्ध कराए गए और सामुदायिक स्तर पर बीज उत्पादन को बढ़ावा दिया गया।

खरीफ मौसम में बीज उत्पादन की योजना बनाकर रबी सीजन के लिए गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता सुनिश्चित की गई। यह रणनीति विशेष रूप से मूंगफली के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई, क्योंकि अधिक नमी वाले वातावरण में इसके बीजों को लंबे समय तक सुरक्षित रखना चुनौतीपूर्ण होता है।

2,000 हेक्टेयर क्षेत्र में बीज उत्पादन, महिलाओं की भी अहम भागीदारी

जून 2026 तक लगभग 2,000 हेक्टेयर क्षेत्र में विकेन्द्रीकृत बीज उत्पादन कार्यक्रम लागू किया जा चुका है। इससे 2,000 मीट्रिक टन से अधिक प्रमाणित बीज तैयार हुआ है, जिसे रबी मौसम की बुवाई के लिए किसानों तक पहुंचाया जा रहा है।

कार्यक्रम में महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की सक्रिय भागीदारी भी देखने को मिली है। इससे ग्रामीण महिलाओं को अतिरिक्त आय और कृषि उद्यमिता के अवसर प्राप्त हुए हैं।

MSP और सरकारी खरीद से किसानों का बढ़ा भरोसा

तिलहन फसलों को अपनाने में किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता बाजार और मूल्य की होती है। इसे ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार की राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन (NMEO-OS) योजना के तहत किसानों को तकनीकी सहायता, प्रदर्शन प्लॉट, भंडारण सुविधाएं और बाजार संपर्क उपलब्ध कराया गया।

साल 2025 में सरकार ने सूरजमुखी और मूंगफली को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के तहत खरीदने की व्यवस्था भी शुरू की। सूरजमुखी के लिए ₹77.21 प्रति किलोग्राम और मूंगफली के लिए ₹72.63 प्रति किलोग्राम का समर्थन मूल्य घोषित किया गया।

NAFED और उसके ई-समृद्धि प्लेटफॉर्म के माध्यम से होने वाली खरीद ने किसानों का जोखिम कम किया है और उन्हें धान के अलावा अन्य फसलों की खेती अपनाने का विश्वास दिया है।

किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य तेल आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्तापूर्ण बीज, वैज्ञानिक तकनीक, सरकारी समर्थन और सुनिश्चित बाजार का यह मॉडल किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ भारत को खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा कि जब किसानों को बेहतर बीज, भरोसेमंद विज्ञान और स्थिर बाजार मिलता है, तब कृषि आर्थिक विकास का मजबूत आधार बन जाती है। ओडिशा ने इन सभी तत्वों को एक साथ जोड़कर देश के लिए एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया है।

अन्य राज्यों के लिए भी बन सकता है मॉडल

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ओडिशा का यह अनुभव देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणादायक साबित हो सकता है। मजबूत बीज प्रणाली, किसान-केंद्रित नीतियां और बाजार आधारित फसल विविधीकरण के माध्यम से घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, जिससे खाद्य तेलों के आयात पर होने वाला भारी विदेशी मुद्रा खर्च भी कम होगा।

इस प्रकार ओडिशा न केवल अपने किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहा है, बल्कि भारत की खाद्य तेल आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

स्रोत: ICRISAT