कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह ने साझा किया कम लागत वाला असरदार उपाय, कहा- “स्थानीय तकनीकें किसानों की बड़ी ताकत”
समस्तीपुर/पूसा। देशभर में किसानों के सामने तेजी से उभर रही नीलगाय की समस्या अब खेती-किसानी के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में नीलगाय किसानों की मेहनत से तैयार फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रही है। उद्यानिकी फसलों में तो इसका असर और भी अधिक देखने को मिल रहा है। ऐसे समय में प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह ने किसानों के लिए एक बेहद सस्ता, सरल और व्यावहारिक समाधान साझा किया है, जो ग्रामीण स्तर पर तेजी से चर्चा का विषय बन रहा है।
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प्रोफेसर डॉ. एस. के. सिंह डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (समस्तीपुर) के पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी के विभागाध्यक्ष हैं। वे अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना के पूर्व प्रधान अन्वेषक तथा विश्वविद्यालय में पूर्व सह निदेशक अनुसंधान की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। लंबे समय से किसानों के बीच काम कर रहे डॉ. सिंह ने नीलगाय से फसल बचाने के लिए एक देसी तकनीक को वैज्ञानिक आधार के साथ सामने रखा है।
किसानों की बढ़ती परेशानी बनी नीलगाय
प्रोफेसर. सिंह ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में नीलगाय की संख्या तेजी से बढ़ी है। जंगलों और झाड़ियों के कम होने से ये जंगली जानवर अब खेतों की ओर रुख कर रहे हैं। रात के समय खेतों में घुसकर नीलगाय धान, गेहूं, मक्का, दलहन और सब्जियों के साथ-साथ केला, पपीता, अमरूद और आम जैसी उद्यानिकी फसलों को भी भारी नुकसान पहुंचाती हैं।
उन्होंने कहा कि नीलगाय के कारण किसानों को हर वर्ष लाखों रुपये तक की आर्थिक क्षति होती है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि धार्मिक मान्यताओं के कारण नीलगाय को गोवंश से जोड़ा जाता है, इसलिए इनके नियंत्रण को लेकर कानूनी और सामाजिक सीमाएं भी मौजूद हैं। ऐसे में किसानों के लिए गैर-घातक और प्राकृतिक उपायों की आवश्यकता बढ़ जाती है।
प्रगतिशील किसान की तकनीक को वैज्ञानिक समर्थन

डॉ. सिंह ने बताया कि समस्तीपुर जिले के पटोरी प्रखंड निवासी प्रगतिशील किसान सुधीर शाह ने एक बेहद अनोखी तकनीक विकसित की, जिसे बाद में वैज्ञानिक स्तर पर भी उपयोगी पाया गया। यह तकनीक सड़े हुए अंडों की दुर्गंध पर आधारित है।
उन्होंने बताया कि इस विधि में केवल दो सड़े हुए अंडे, 15 लीटर पानी और एक प्लास्टिक की बाल्टी की जरूरत होती है। सड़े अंडों को पानी में मिलाकर 5 से 10 दिनों तक ढककर रखा जाता है, जिससे उसमें तेज दुर्गंध उत्पन्न हो जाती है। बाद में इस घोल का छिड़काव खेत की मेड़ों और उन रास्तों पर किया जाता है जहां से नीलगाय खेतों में प्रवेश करती है।
वैज्ञानिक आधार पर असरदार साबित हुआ उपाय
प्रोफेसर डॉ. सिंह के अनुसार नीलगाय पूर्णतः शाकाहारी जीव है और उसे सड़ी हुई वस्तुओं की गंध अत्यंत अप्रिय लगती है। यही कारण है कि सड़े अंडों की दुर्गंध उन्हें खेतों के पास आने से रोकती है। उन्होंने बताया कि यह घोल एक प्राकृतिक रिपेलेंट की तरह काम करता है।
उन्होंने कहा कि इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें किसी रासायनिक पदार्थ का उपयोग नहीं होता, जिससे मिट्टी और फसल पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। साथ ही यह तकनीक पर्यावरण के अनुकूल भी है।
केला की फसल में सफल प्रयोग
प्रोफेसर डॉ. एस. के. सिंह ने बताया कि अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (फल) के तहत केला की फसल में इस तकनीक का प्रयोग किया गया। अध्ययन में पाया गया कि नीलगाय विशेष रूप से केले के बंच को नुकसान पहुंचाती है।
इस समस्या से बचाव के लिए वैज्ञानिकों ने दोहरी रणनीति अपनाई। पहली, खेत की मेड़ों पर सड़े अंडों के घोल का छिड़काव किया गया और दूसरी, केले के बंच को मोटे काले पॉलीथिन से ढक दिया गया ताकि नीलगाय उसे आसानी से देख न सके।
उन्होंने कहा कि इस संयुक्त तकनीक से फसल को काफी हद तक सुरक्षित रखने में सफलता मिली और किसानों को नुकसान से राहत मिली।
कम लागत में बड़ा समाधान
डॉ. सिंह ने बताया कि यह तकनीक छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि इसकी लागत बेहद कम है। लगभग 10 रुपये के खर्च में यह घोल तैयार किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध सामान्य संसाधनों से तैयार होने के कारण किसान इसे बिना किसी तकनीकी प्रशिक्षण के आसानी से अपना सकते हैं। यही वजह है कि यह उपाय तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
बंदरों से बचाव में भी मददगार
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार इस घोल की दुर्गंध बंदरों और अन्य जंगली जानवरों को भी खेतों से दूर रखने में सहायक साबित हो रही है। कई किसानों ने बताया कि इस उपाय के बाद खेतों में जानवरों की आवाजाही कम हुई है।
किसानों से तकनीक अपनाने की अपील
प्रोफेसर डॉ. एस. के. सिंह ने किसानों से अपील की कि वे प्राकृतिक और स्थानीय नवाचारों को अपनाकर खेती की लागत कम करें और फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि जब तक नीलगाय की समस्या पर कोई व्यापक सरकारी नीति नहीं बनती, तब तक ऐसे देसी और वैज्ञानिक रूप से उपयोगी उपाय किसानों के लिए राहत का माध्यम बन सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि किसानों के अनुभव और वैज्ञानिक अनुसंधान का मेल ही भविष्य की टिकाऊ खेती का आधार बनेगा। सुधीर शाह जैसे किसानों के नवाचार इस दिशा में प्रेरणादायक उदाहरण हैं।
