संतुलित उर्वरक उपयोग से लागत घटाने और पैदावार बढ़ाने पर जोर
नई दिल्ली, 25 अप्रैल 2026 – देश में बढ़ती मिट्टी की गिरती उर्वरता और रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग की चुनौती से निपटने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्रमुख संस्थान भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली ने “एमजीएमजी अभियान” के तहत संतुलित उर्वरक उपयोग पर राष्ट्रीय स्तर की पहल शुरू की है। इस कड़ी में आयोजित ऑनलाइन कार्यशाला में देशभर से करीब 440 प्रतिभागियों ने भाग लेकर टिकाऊ खेती की दिशा में महत्वपूर्ण सुझाव और रणनीतियां साझा कीं।
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इस कार्यशाला में आईएआरआई असम, आईएआरआई झारखंड, आईसीएआर-अटारी, आईएएसआरआई के वैज्ञानिकों के साथ हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के विशेषज्ञ तथा पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के किसान बड़ी संख्या में जुड़े।
गांवों तक पहुंचेगी वैज्ञानिक सलाह, 120 टीमें होंगी तैनात
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आईएआरआई के निदेशक डॉ. च. श्रीनिवास राव ने बताया कि इस अभियान को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए 120 विशेष टीमें गठित की गई हैं, जो सीधे गांवों में जाकर किसानों से संवाद करेंगी।
उन्होंने कहा कि ये टीमें न केवल नई दिल्ली मुख्यालय से बल्कि असम और झारखंड के क्षेत्रीय केंद्रों से भी संचालित होंगी, जिससे पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत के किसानों तक भी तकनीक और जानकारी पहुंच सके।
डॉ. राव के अनुसार ,“संतुलित उर्वरक उपयोग केवल उत्पादन बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि मिट्टी की दीर्घकालिक सेहत और किसानों की आय बढ़ाने का आधार है।”
इन मुद्दों पर रहेगा अभियान का फोकस
अभियान के दौरान किसानों को निम्न विषयों पर विशेष प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दिया जाएगा—
- मृदा परीक्षण (Soil Health Card आधारित सलाह)
- संतुलित उर्वरक प्रबंधन (NPK का सही अनुपात)
- हरी खाद (Green Manuring) का उपयोग
- फसल विविधीकरण (Crop Diversification)
- सूक्ष्म सिंचाई तकनीक (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर)
- जल संरक्षण और जल उपयोग दक्षता
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरक का उपयोग करें, तो 15–25% तक लागत में कमी और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
वैज्ञानिक और किसान के बीच की दूरी कम करने पर जोर
डॉ. राव ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अभियान का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य किसानों की सोच, अनुभव और निर्णय प्रक्रिया को समझना है।
उन्होंने कहा कि अक्सर वैज्ञानिक सिफारिशें खेत तक पूरी तरह लागू नहीं हो पातीं, इसलिए
- किसानों के अनुभवों का दस्तावेजीकरण, स्थानीय समस्याओं की पहचान, क्षेत्र विशेष के समाधान
पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
मौसमी रणनीति: अप्रैल–मई में क्या करें किसान
आईएआरआई ने इस अभियान के तहत किसानों के लिए मौसमी सलाह भी जारी की—
- अप्रैल–मई में मिट्टी परीक्षण अनिवार्य रूप से कराएं
- धान/मक्का से पहले हरी खाद वाली फसलें (ढैंचा, सनहेम्प) उगाएं
- खेत में नाइट्रोजन की कमी को संतुलित तरीके से पूरा करें
- सिंचाई में ड्रिप तकनीक अपनाएं
प्रशिक्षण, डेमो और गांव-स्तर पर जागरूकता अभियान
आईएआरआई के संयुक्त निदेशक (विस्तार) डॉ. आर.एन. पडारिया ने बताया कि MGMG अभियान के तहत
- किसान प्रशिक्षण शिविर, खेतों पर लाइव डेमो, गांव-स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम
आयोजित किए जाएंगे, जिससे वैज्ञानिक तकनीक सीधे किसानों तक पहुंचे।
वहीं संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. सी. विश्वनाथन ने बताया कि अभियान के दौरान डिजिटल रिपोर्टिंग सिस्टम के जरिए सभी गतिविधियों का रिकॉर्ड रखा जाएगा, जिससे भविष्य में नीति निर्माण में मदद मिलेगी।
जैविक और प्राकृतिक विकल्पों पर भी जोर
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर
- जैव उर्वरक (Biofertilizers) कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट, प्राकृतिक खेती तकनीक
को अपनाने से मिट्टी की संरचना और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है, जिससे लंबे समय में उत्पादन स्थिर रहता है।
सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाएगा अभियान
इस पहल को केंद्र सरकार की प्रमुख योजनाओं से भी जोड़ा गया है, जैसे—
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) पर ड्रॉप मोर क्रॉप योजना (PDMC)
इन योजनाओं के तहत किसानों को सूक्ष्म सिंचाई पर सब्सिडी और तकनीकी सहायता प्रदान की जाएगी।
आभार ज्ञापन
कार्यक्रम के अंत में डॉ. देबाशीष मंडल ने सभी प्रतिभागियों, वैज्ञानिकों और किसानों का धन्यवाद करते हुए कहा कि साझा प्रयासों से ही टिकाऊ कृषि का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
सारांश
भारत में पिछले एक दशक में नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है, जिससे
मिट्टी की उर्वरता घट रही है, लागत बढ़ रही है, पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है
ऐसे में आईएआरआई का यह अभियान संतुलित पोषण प्रबंधन और टिकाऊ खेती की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह अभियान प्रभावी रूप से लागू होता है, तो आने वाले वर्षों में किसानों की आय में वृद्धि, उत्पादन लागत में कमी, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार जैसे सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
