भारत की समृद्धि में किसानों की भूमिका अहम: धनखड़
कोयंबटूर, भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि समावेशिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारत की समृद्ध विरासत हैं और इन्हें राष्ट्रीय संपत्ति की तरह संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने भारत को विविधता और शांति को सम्मान देने वाली विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता बताया और नागरिकों से इन मूल्यों की रक्षा करने का आह्वान किया।
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उपराष्ट्रपति कोयंबटूर में तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय में “विकसित भारत के लिए कृषि शिक्षा, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देना” विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
कृषि क्षेत्र की चर्चा करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत को अब केवल खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर किसानों की समृद्धि पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसानों को सिर्फ उपज पैदा करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें बाजार की समझ विकसित करनी चाहिए और अपने उत्पादों का मूल्यवर्धन करना चाहिए।
उन्होंने कहा, “किसान को अब उत्पादक से उद्यमी बनना होगा। उसे यह तय करना होगा कि कब और कैसे अपनी फसल बेचे ताकि उसे अधिक लाभ मिल सके। सरकार की मजबूत सहकारी प्रणाली किसानों को इस दिशा में मदद कर सकती है।”
उपराष्ट्रपति ने कहा कि पहली बार देश में सहकारिता मंत्रालय बनाया गया है, जिससे किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण की राह मजबूत हुई है। उन्होंने कृषि विश्वविद्यालयों और संस्थानों से किसानों को उद्यमशील बनाने के लिए जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने का आग्रह किया।
नवाचार और अनुसंधान का होना चाहिए किसान-केंद्रित
धनखड़ ने कृषि क्षेत्र में अनुसंधान और तकनीकी नवाचार को किसान-केंद्रित बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला और खेत के बीच की दूरी को समाप्त करना होगा। “प्रयोगशाला में विकसित तकनीक सीधी जमीन पर किसानों तक पहुँचे, यही आज की जरूरत है,” उन्होंने कहा।
उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि ये केंद्र किसानों के लिए जीवंत संवाद मंच बनें और उन्हें नई तकनीकों से परिचित कराएँ। उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 150 से अधिक संस्थानों को किसानों से सीधे जोड़ने का सुझाव भी दिया।
सरकार की योजनाओं से हो रहा है किसानों का सशक्तिकरण
उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ये केवल वित्तीय सहायता नहीं हैं, बल्कि किसानों को सम्मान और आत्मनिर्भरता प्रदान करने के प्रयास हैं। उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा उर्वरकों पर दी जा रही भारी सब्सिडी का लाभ भी किसानों को प्रत्यक्ष रूप से मिल रहा है। यदि यह राशि सीधे किसानों के खाते में ट्रांसफर की जाए, तो प्रत्येक किसान को सालाना लगभग 35,000 रुपये मिल सकते हैं।
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की सराहना
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की सराहना करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस संस्थान ने भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में ऐतिहासिक योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि आज भारत खाद्यान्न की कमी से खाद्यान्न की प्रचुरता की ओर बढ़ चुका है और इसमें कृषि विश्वविद्यालयों की बड़ी भूमिका रही है।
उन्होंने भारत के महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामीनाथन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि डॉ. स्वामीनाथन, जिन्होंने हरित क्रांति के जरिए देश को आत्मनिर्भर बनाया, इसी विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र थे। उन्होंने डॉ. स्वामीनाथन को भारत के सबसे महान सपूतों में से एक बताया, जिन्हें सभी चार प्रमुख नागरिक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था।
कृषि को दिल से जोड़ने की जरूरत
अपने समापन भाषण में उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत का हृदय गांवों में बसता है और कृषि इसकी जीवन रेखा है। उन्होंने तमिल संत कवि तिरुवल्लुवर का हवाला देते हुए कहा कि किसानों को समाज में सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए। “किसान हमारे अन्नदाता हैं, वे ही हमारे भाग्य विधाता हैं,” उपराष्ट्रपति ने कहा।
राष्ट्र प्रथम का आदर्श अपनाने का आह्वान
देश की प्रगति पर बोलते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत आज तेज़ी से विकास कर रहा है। बुनियादी ढांचा, तकनीक और वैश्विक पहचान के हर क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियाँ हासिल हो रही हैं। उन्होंने कहा, “राष्ट्र पहले” का मंत्र हर भारतीय का आदर्श होना चाहिए। “कोई भी व्यक्तिगत हित राष्ट्रहित से बड़ा नहीं हो सकता,” उन्होंने जोर देते हुए कहा।
विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति
इस कार्यक्रम में तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि, राज्य सरकार की मानव संसाधन प्रबंधन मंत्री श्रीमती एन. कयालविझी सेल्वराज, कृषि उत्पादन आयुक्त वी. दक्षिणमूर्ति, अनुसंधान निदेशक डॉ. एम. रवीन्द्रन, कार्यवाहक कुलपति आर. थमिज़ वेंडन सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे।