किसानों के लिए क्लाइमेट स्मार्ट खेती का नया मॉडल!

जलवायु संकट से निपटने के लिए खेती में बड़ा बदलाव, सूक्ष्म सिंचाई से लेकर जलवायु-प्रतिरोधी बीजों पर केंद्र सरकार का फोकस

109 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पहुंची माइक्रो इरिगेशन तकनीक, 25.79 करोड़ किसानों को मिले मृदा स्वास्थ्य कार्ड

नई दिल्ली। देश में तेजी से बदलते मौसम, अनियमित बारिश, बढ़ती गर्मी और घटते भूजल स्तर के बीच भारतीय कृषि एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है। कभी सूखा तो कभी बाढ़, कहीं ओलावृष्टि तो कहीं असामान्य तापमान—इन परिस्थितियों ने खेती की पारंपरिक व्यवस्था को चुनौती दी है। ऐसे माहौल में केंद्र सरकार ने खेती को जलवायु-अनुकूल और टिकाऊ बनाने की दिशा में बड़े स्तर पर काम शुरू किया है।

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केंद्र सरकार ने संसद में दी जानकारी में बताया कि “राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन” (NMSA) के तहत देशभर में सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा आधारित खेती, मृदा स्वास्थ्य सुधार और जलवायु-प्रतिरोधी फसल किस्मों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि खेती को भविष्य की जलवायु चुनौतियों के अनुरूप तैयार करना भी है।

बदलते मौसम ने बढ़ाई किसानों की चिंता

पिछले कुछ वर्षों में देश के कई हिस्सों में मौसम की मार ने किसानों की लागत और जोखिम दोनों बढ़ा दिए हैं। राजस्थान, महाराष्ट्र, बुंदेलखंड और दक्षिण भारत के कई इलाके लगातार जल संकट का सामना कर रहे हैं, जबकि बिहार, असम और पूर्वी राज्यों में बाढ़ की समस्या खेती को प्रभावित कर रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खेती को वैज्ञानिक तकनीकों और जल संरक्षण उपायों से नहीं जोड़ा गया तो आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है। इसी खतरे को देखते हुए सरकार ने “क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर” यानी जलवायु-अनुकूल खेती मॉडल को बढ़ावा देना शुरू किया है।

8.50 लाख हेक्टेयर में वर्षा आधारित खेती को बढ़ावा

सरकार के मुताबिक वर्ष 2014-15 से अब तक “रेनफेड एरिया डेवलपमेंट” कार्यक्रम के तहत 8.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया है। इस योजना का उद्देश्य उन इलाकों में खेती को मजबूत बनाना है जहां सिंचाई के सीमित साधन हैं और किसान बारिश पर निर्भर रहते हैं।

इसके तहत किसानों को एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। यानी केवल फसल उत्पादन पर निर्भर रहने के बजाय पशुपालन, बागवानी, मत्स्य पालन और जैविक गतिविधियों को खेती से जोड़ा जा रहा है। इससे किसानों की आय के कई स्रोत बनते हैं और किसी एक फसल के नुकसान की स्थिति में आर्थिक जोखिम कम होता है।

सरकार ने इस कार्यक्रम के लिए अब तक 2,119.84 करोड़ रुपये जारी किए हैं और लगभग 14.35 लाख किसानों को इसका लाभ मिला है।

“प्रति बूंद अधिक फसल” अभियान से बढ़ी उम्मीद

जल संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने माइक्रो इरिगेशन यानी ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई तकनीकों को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया है। “प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना” के तहत चल रहे “प्रति बूंद अधिक फसल” अभियान के माध्यम से वर्ष 2015-16 से अब तक करीब 109 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली से जोड़ा गया है।

इस योजना के लिए केंद्र सरकार ने 26,325 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता प्रदान की है। सरकार का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में अतिरिक्त 100 लाख हेक्टेयर भूमि को माइक्रो इरिगेशन के दायरे में लाना है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार ड्रिप सिंचाई तकनीक से पानी की 40 प्रतिशत तक बचत संभव है। इससे फसलों को नियंत्रित मात्रा में पानी और उर्वरक मिलते हैं, जिससे उत्पादन बढ़ता है और लागत घटती है। विशेष रूप से फल, सब्जी, गन्ना और बागवानी फसलों में इसके अच्छे परिणाम सामने आए हैं।

मिट्टी की सेहत सुधारने पर भी जोर

खेती की लागत बढ़ने का एक बड़ा कारण मिट्टी की उर्वरता में लगातार गिरावट भी है। कई क्षेत्रों में किसान जरूरत से अधिक यूरिया और रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

इसी समस्या से निपटने के लिए सरकार ने “मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना” को तेज किया है। वर्ष 2025-26 के दौरान 97.53 लाख मिट्टी के नमूने एकत्र किए गए, जिनमें से 92.87 लाख का परीक्षण किया गया। फरवरी 2026 तक देशभर में किसानों को 25.79 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जा चुके हैं।

इन कार्डों के जरिए किसानों को बताया जाता है कि उनकी जमीन में कौन-कौन से पोषक तत्वों की कमी है और किस प्रकार की खाद का उपयोग करना चाहिए। इससे उर्वरकों का संतुलित उपयोग बढ़ा है और खेती की लागत कम करने में मदद मिली है।

नीति आयोग के मूल्यांकन में यह भी सामने आया कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के बाद यूरिया के अत्यधिक उपयोग में कमी आई है और 68 प्रतिशत से अधिक किसानों ने मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार महसूस किया।

जलवायु-प्रतिरोधी बीजों पर बड़ा काम

जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा असर फसलों की उत्पादकता पर पड़ रहा है। कभी अधिक तापमान, कभी सूखा और कभी अचानक बारिश से फसलें प्रभावित हो रही हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने बड़े स्तर पर रिसर्च शुरू की है।

सरकार के अनुसार वर्ष 2014 से 2025 के बीच 2,996 जलवायु-प्रतिरोधी फसल किस्में विकसित की गई हैं। इनमें सूखा सहन करने वाली, कम पानी में उगने वाली, बाढ़ झेलने वाली और अधिक तापमान में भी टिकने वाली किस्में शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में पारंपरिक बीजों की तुलना में ऐसी वैज्ञानिक किस्मों की मांग तेजी से बढ़ेगी क्योंकि मौसम की अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है।

310 जिले पाए गए अत्यधिक संवेदनशील

सरकार ने देश के 651 कृषि जिलों का जलवायु संवेदनशीलता आकलन भी कराया है। इसमें 310 जिलों को अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इन जिलों के लिए विशेष कृषि आकस्मिक योजनाएं तैयार की गई हैं ताकि प्राकृतिक आपदा या मौसम बदलाव की स्थिति में किसानों को कम नुकसान हो।

इन योजनाओं में वैकल्पिक फसलें, कम अवधि वाली किस्में, जल संरक्षण तकनीक और आपदा प्रबंधन उपाय शामिल किए गए हैं।

खेती का भविष्य अब तकनीक और जल संरक्षण पर निर्भर

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में वही खेती टिकाऊ मानी जाएगी जो कम पानी, कम लागत और अधिक उत्पादन के सिद्धांत पर आधारित होगी। जल संरक्षण, माइक्रो इरिगेशन, जैविक पोषण, मौसम आधारित खेती और वैज्ञानिक बीज भविष्य की कृषि व्यवस्था की आधारशिला बनने जा रहे हैं।

सरकार की वर्तमान योजनाएं इसी बदलाव की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखी जा रही हैं। यदि इन योजनाओं का लाभ गांव स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुंचता है, तो यह न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगा बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत बनाएगा।

चित्र:प्रतीकात्मक