वर्षा सिंचित क्षेत्रों के विकास में डेटा की अहम भूमिका, एनआरएए ने राष्ट्रीय परामर्श में खोजे समाधान!
नई दिल्ली, 8 जुलाई। वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में योजनाओं के बेहतर नियोजन, प्रभावी क्रियान्वयन और सटीक निगरानी के लिए गुणवत्तापूर्ण एवं सुलभ आंकड़ों की आवश्यकता पर जोर देते हुए राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (NRAA) ने नई दिल्ली के पूसा स्थित एनएएससी कॉम्प्लेक्स में एक दिवसीय राष्ट्रीय परामर्श का आयोजन किया। कार्यक्रम का विषय था— “भारत के वर्षा सिंचित क्षेत्रों में प्रभावी परियोजना नियोजन एवं कार्यान्वयन के लिए गुणवत्तापूर्ण आंकड़ों का सृजन एवं प्रसार: बाधाओं को दूर करने हेतु चुनौतियों का समाधान।”
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वर्षा आधारित कृषि के लिए डेटा बनेगा विकास का आधार
परामर्श का उद्देश्य अनुसंधान संस्थानों, तकनीकी एजेंसियों और राज्य सरकारों के बीच संवाद स्थापित कर वर्षा सिंचित क्षेत्रों के लिए आवश्यक आंकड़ों की उपलब्धता, गुणवत्ता और पहुंच से जुड़ी चुनौतियों की पहचान करना था। विशेषज्ञों का मानना है कि सटीक आंकड़ों के बिना किसी भी विकास परियोजना की योजना, संसाधन आवंटन और परिणामों का मूल्यांकन प्रभावी ढंग से नहीं किया जा सकता।
भारत के लगभग आधे कृषि क्षेत्र की निर्भरता वर्षा पर है। ऐसे क्षेत्रों में वर्षा, मृदा, जल संसाधन, भूमि उपयोग, फसल उत्पादकता, जलवायु जोखिम और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से जुड़े आंकड़े कृषि योजनाओं की सफलता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
योजनाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने में मदद करेंगे गुणवत्तापूर्ण आंकड़े
राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्रशेखर कुमार ने कहा कि विभिन्न सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के सफल क्रियान्वयन के लिए आधारभूत आंकड़ों की उपलब्धता बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि पूर्व में संचालित योजनाओं के प्रदर्शन संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण कर वर्तमान कार्यक्रमों को अधिक परिणामोन्मुख बनाया जा सकता है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि मानकीकृत, विश्वसनीय और आसानी से उपलब्ध आंकड़े नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और राज्य स्तरीय अधिकारियों को बेहतर रणनीति बनाने में सहायता करेंगे। इससे योजनाओं के लाभार्थियों तक संसाधनों की पहुंच और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे।
दो तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने रखे विचार
राष्ट्रीय परामर्श के दौरान दो महत्वपूर्ण तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। पहले सत्र में आंकड़ों के संग्रहण, भंडारण और प्रसार से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा हुई। इसमें विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञों ने अपने अनुभव साझा किए।
इस सत्र में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग योजना ब्यूरो (NBSSLUP), बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया–आईएआरआई (BISA-IARI), अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (IWMI), महालनोबिस राष्ट्रीय फसल पूर्वानुमान केंद्र (MNCFC) तथा केंद्रीय शुष्कभूमि कृषि अनुसंधान संस्थान (CRIDA) के प्रतिनिधियों ने अपने संस्थानों द्वारा विकसित डेटा प्लेटफॉर्म और सूचना प्रणालियों की जानकारी दी।
राज्यों ने बताईं जमीनी चुनौतियां
दूसरे तकनीकी सत्र में परियोजना नियोजन के लिए आवश्यक आंकड़ों की उपलब्धता और उपयोगकर्ताओं को आने वाली कठिनाइयों पर चर्चा हुई। इसमें तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, असम, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों के अधिकारियों ने भाग लिया।
राज्यों के प्रतिनिधियों ने बताया कि कई बार आंकड़े अलग-अलग संस्थानों में बिखरे होने, समय पर अपडेट न होने या उपयोगकर्ता-अनुकूल स्वरूप में उपलब्ध न होने के कारण परियोजनाओं की योजना बनाने में कठिनाई आती है। उन्होंने एकीकृत डेटा प्लेटफॉर्म विकसित करने और राज्यों को सरल पहुंच उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया।
डिजिटल कृषि और जलवायु अनुकूलन को मिलेगा बल
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच डेटा-आधारित निर्णय प्रणाली वर्षा सिंचित कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती जा रही है। सटीक आंकड़ों के आधार पर तैयार योजनाएं जल संरक्षण, फसल विविधीकरण, सूखा प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद कर सकती हैं।
राष्ट्रीय परामर्श से प्राप्त सुझावों के आधार पर वर्षा सिंचित क्षेत्रों के लिए डेटा संग्रहण, प्रबंधन और साझा करने की प्रणाली को और मजबूत बनाने की दिशा में ठोस पहल किए जाने की संभावना है, जिससे देश के करोड़ों वर्षा आधारित किसानों को दीर्घकालिक लाभ मिल सकेगा।
