मिट्टी परीक्षण और संतुलित उर्वरक प्रबंधन से ही सुरक्षित होगा कृषि का भविष्य: डॉ. सीमा सेपट
मोगा (पंजाब)। किसानों को टिकाऊ खेती अपनाने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और उत्पादन लागत कम करने के उद्देश्य से भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना द्वारा कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) मोगा तथा पंजाब कृषि विभाग के सहयोग से मोगा जिले के कोकरी कला और सिधवांन गांव में “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत जागरूकता एवं संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में 70 से अधिक किसानों ने भाग लेकर कृषि वैज्ञानिकों से सीधे संवाद किया और संतुलित उर्वरक प्रबंधन की वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त की।
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यह कार्यक्रम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा देशभर में चलाए जा रहे राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य किसानों को संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, मिट्टी स्वास्थ्य संरक्षण तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक बनाना है।
मिट्टी की जांच से बढ़ेगा उत्पादन, घटेगी लागत
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान की वैज्ञानिक डॉ. सीमा सेपट ने कहा कि मिट्टी की जांच और संतुलित उर्वरक प्रबंधन ही टिकाऊ एवं लाभकारी खेती का मूल आधार है। उन्होंने बताया कि मिट्टी परीक्षण के माध्यम से खेत में उपलब्ध पोषक तत्वों की वास्तविक स्थिति का पता चलता है, जिससे फसल की आवश्यकता के अनुरूप उर्वरकों का सही एवं संतुलित उपयोग किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि बिना जांच के उर्वरकों का उपयोग करने से न केवल लागत बढ़ती है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वहीं वैज्ञानिक तरीके से उर्वरक प्रबंधन अपनाने पर फसल उत्पादन में वृद्धि, लागत में कमी और मिट्टी की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।
हरी खाद और जैविक विकल्पों पर जोर
कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिक डॉ. श्याम वीर सिंह और कामेश कृष्णमूर्ति ने किसानों को हरी खाद के रूप में ढैंचा फसल के उपयोग के लाभों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ढैंचा जैसी हरी खाद मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाती है, नाइट्रोजन की उपलब्धता में सुधार करती है तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में सहायक होती है।
विशेषज्ञों ने किसानों को रासायनिक उर्वरकों, खासकर यूरिया के अत्यधिक एवं असंतुलित उपयोग से बचने की सलाह देते हुए समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management-INM) अपनाने पर बल दिया। इसके अंतर्गत जैविक खाद, हरी खाद, फसल अवशेष और रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग शामिल है।
धान की खेती में वैज्ञानिक उर्वरक प्रबंधन की जानकारी
केवीके मोगा के डॉ. गगनदीप सिंह ने मिट्टी जांच के महत्व पर प्रकाश डालते हुए किसानों को धान की नर्सरी तैयार करने से लेकर फसल कटाई तक उर्वरक प्रबंधन की वैज्ञानिक तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि समय पर और सही मात्रा में उर्वरक देने से फसल की वृद्धि बेहतर होती है तथा पोषक तत्वों की बर्बादी भी रुकती है।
डॉ. सिंह ने कहा कि मिट्टी परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन किसानों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी सिद्ध हो रहा है। इससे उत्पादन लागत कम होती है, फसल उत्पादकता बढ़ती है और मिट्टी का स्वास्थ्य भी लंबे समय तक सुरक्षित रहता है।
किसानों की समस्याओं का मौके पर समाधान
कार्यक्रम के दौरान किसानों ने उर्वरक उपयोग, धान एवं मक्का फसलों में पोषण प्रबंधन, मिट्टी स्वास्थ्य और उत्पादन बढ़ाने से जुड़े अनेक प्रश्न विशेषज्ञों के समक्ष रखे। वैज्ञानिकों ने उनकी जिज्ञासाओं का विस्तार से समाधान करते हुए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यवहारिक और वैज्ञानिक सुझाव दिए।
कृषि विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ते रासायनिक उर्वरकों के उपयोग और मिट्टी की घटती गुणवत्ता के बीच संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन ही कृषि को टिकाऊ बनाने का सबसे प्रभावी उपाय है। मिट्टी परीक्षण आधारित खेती न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगी, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए कृषि भूमि की उत्पादकता भी सुरक्षित रखेगी।
कृषि संदेश:
“मिट्टी को जानिए, तभी सही उर्वरक चुनिए”— यही मंत्र किसानों को अधिक उत्पादन, कम लागत और स्वस्थ मिट्टी की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।

