रस्ट से बिगड़ रही मटर की उपज? अपनाएं ये कारगर उपाय!

मटर की फसल को रतुआ रोग से बचाने हेतु विशेषज्ञ ने जारी की महत्वपूर्ण सलाह

उपज व गुणवत्ता बढ़ाने के लिए एकीकृत प्रबंधन आवश्यक: प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह

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प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह

समस्तीपुर, बिहार। मटर (Pisum sativum) उत्तर भारत की प्रमुख दलहनी फसलों में शामिल है, लेकिन रतुआ (रस्ट) रोग ने हाल के वर्षों में इसकी पैदावार और गुणवत्ता पर गंभीर असर डाला है। पत्तियों पर पीले-भूरे फफोलों के रूप में दिखाई देने वाला यह रोग Uromyces pisi कवक द्वारा होता है, जो अनुकूल मौसम में तेजी से फैलता है और भारी आर्थिक नुकसान का कारण बनता है। यह जानकारी डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पोस्ट ग्रेजुएट विभागाध्यक्ष (प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी) तथा पूर्व सह निदेशक अनुसंधान प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह ने दी।

रोग के प्रमुख लक्षण: शुरुआत में पीले धब्बे, आगे चलकर भूरे फफोले

डॉ. सिंह के अनुसार, रतुआ रोग की शुरुआत पत्तियों की ऊपरी सतह पर हल्के पीले धब्बों से होती है। बाद में ये धब्बे उभरकर नारंगी-लाल और अंततः गहरे भूरे या काले फफोलों में बदल जाते हैं। इनसे पाउडर के रूप में बीजाणु निकलते हैं, जो हवा के साथ पूरे खेत में रोग फैलाते हैं। गंभीर संक्रमण होने पर पत्तियाँ सूखने लगती हैं और फलियों का विकास रुक जाता है।

30–50% तक घट सकती है उपज

रोग के कारण पौधों की प्रकाश-संश्लेषण क्षमता कम होती है, फलियों की संख्या घटती है और दाने छोटे रह जाते हैं। कई क्षेत्रों में किसानों को उपज में 30–50% तक की कमी दर्ज की गई है। दानों की गुणवत्ता प्रभावित होने से बाजार मूल्य भी घट जाता है।

कवक का जीवनचक्र: फसल अवशेषों से शुरू होती है बीमारी

Uromyces pisi कवक संक्रमित अवशेषों में टेलियोस्पोर के रूप में जीवित रहता है। वसंत में इन्हीं से संक्रमण प्रारंभ होता है और 18–25°C तापमान व अधिक आर्द्रता की स्थिति में रोग तेजी से फैलता है।
डॉ. सिंह ने कहा कि “नमी, बादल और हल्की वर्षा की स्थिति रतुआ के लिए अत्यधिक अनुकूल होती है, इसलिए किसानों को मौसम पूर्वानुमान पर विशेष ध्यान देना चाहिए।”

प्रतिरोधी किस्में सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच

विशेषज्ञ के अनुसार, रतुआ प्रबंधन का सबसे टिकाऊ तरीका प्रतिरोधी किस्में अपनाना है। इससे रसायनों पर निर्भरता कम होती है, लागत घटती है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुँचता।

रसायनिक नियंत्रण: प्रॉपिकोनाज़ोल का दो बार छिड़काव लाभकारी

डॉ. सिंह ने बताया कि अनुकूल मौसम में और प्रारंभिक लक्षण दिखते ही फफूंदनाशक का उपयोग रोग नियंत्रण में कारगर है।
सुझाव: प्रॉपिकोनाज़ोल @ 1 मिली/लीटर पानी

  • 10 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव

  • अंतिम छिड़काव तुड़ाई से कम से कम 10 दिन पहले

उन्होंने चेतावनी दी कि अत्यधिक रासायनिक प्रयोग पर्यावरण व स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक है, इसलिए दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग जरूरी है।

कृषि (कल्चरल) उपाय: साधारण तकनीकें जो रोकती हैं बीमारी

डॉ. सिंह ने किसानों को निम्नलिखित उपाय अपनाने की सलाह दी है—

  • फसल चक्र अपनाएँ, लगातार मटर न लगाएँ

  • प्रमाणित व रोगमुक्त बीज का उपयोग करें

  • संक्रमित अवशेषों को नष्ट करें

  • पौधों में उचित दूरी रखें ताकि नमी न टिके
    ये तकनीकें रतुआ रोग के प्रसार को स्वाभाविक रूप से कम करती हैं।

एकीकृत रोग प्रबंधन (IDM): दीर्घकालिक समाधान

IDM मॉडल में प्रतिरोधी किस्में, कृषि तकनीकें, निगरानी और सीमित रसायनिक उपयोग—सभी उपायों का संतुलित उपयोग किया जाता है। यह पद्धति किसानों के लिए सुरक्षित, सस्ती और पर्यावरण हितैषी मानी जाती है।

निगरानी सबसे महत्वपूर्ण

विशेषज्ञ ने किसानों को सलाह दी है कि खेत का नियमित निरीक्षण कर रोग के शुरुआती लक्षणों की पहचान करें। शुरुआत में रोकथाम आसान, सस्ती और अधिक प्रभावी होती है।

भविष्य की चुनौतियां

जलवायु परिवर्तन और फफूंदनाशकों के प्रति बढ़ती प्रतिरोधकता नई चुनौतियाँ पैदा कर रही हैं। इसलिए भविष्य में जैविक नियंत्रण और उन्नत प्रजनन तकनीकों पर अधिक जोर दिया जाएगा।

सारांश

मटर की फसल को रतुआ रोग से बचाने के लिए किसानों को बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। प्रतिरोधी किस्में, कृषि प्रबंधन, नियमित निगरानी और नियंत्रित रसायनिक उपयोग से ही फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे न केवल उपज बढ़ेगी, बल्कि दानों की गुणवत्ता भी बेहतर होगी और किसानों की आमदनी में निरंतर वृद्धि संभव होगी।

प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह विभागाध्यक्ष, पादप रोग विज्ञान एवं नेमेटोलॉजी अधिकारी-प्रभारी, केला अनुसंधान केन्द्र, गोरौल डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा 📧 संपर्क: sksraupusa@gmail.com