25 रुपये में पराली का समाधान: बायो-डीकंपोजर से प्रदूषण पर नियंत्रण!

पूसा किसान मेले में इफको बायो-डीकंपोजर बना आकर्षण: पराली प्रबंधन का सस्ता और टिकाऊ समाधान

नई दिल्ली। देश में पराली जलाने से बढ़ते वायु प्रदूषण और मिट्टी की गिरती सेहत के बीच पूसा किसान मेले में किसानों को एक प्रभावी और किफायती समाधान प्रस्तुत किया गया। Indian Farmers Fertiliser Cooperative Limited (इफको) द्वारा विकसित बायो-डीकंपोजर ने किसानों और कृषि विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया। इफको की प्रतिनिधि प्रिया यादव ने KRISHI TIMES को बताया कि  पराली जलाने के विकल्प के रूप में यह उत्पाद पर्यावरण और खेती—दोनों के लिए लाभकारी है।

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पराली जलाने की समस्या और बढ़ता प्रदूषण

धान और गेहूं की कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में फसल अवशेष (स्टबल) बच जाते हैं। समय की कमी और मशीनरी की लागत के कारण कई किसान इन्हें जला देते हैं, जिससे दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत में वायु गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। पराली जलाने से निकलने वाला धुआं न केवल सांस संबंधी बीमारियां बढ़ाता है, बल्कि मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को भी नष्ट कर देता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार पराली जलाने से मिट्टी की जैविक कार्बन मात्रा घटती है, जिससे उत्पादन क्षमता पर दीर्घकालिक असर पड़ता है।

क्या है इफको बायो-डीकंपोजर?

इफको का बायो-डीकंपोजर 25 रुपये की शीशी में उपलब्ध एक जैविक घोल है, जिसमें सात प्रकार के लाभकारी फंगस (सूक्ष्मजीव) होते हैं। यह खेत में मौजूद पराली और अन्य जैविक अवशेषों को तेजी से विघटित कर उन्हें प्राकृतिक खाद में बदल देता है।

इफको, जो देश की अग्रणी सहकारी उर्वरक संस्था है, किसानों के हित में कम लागत वाले और टिकाऊ कृषि समाधान विकसित करने के लिए जानी जाती है। बायो-डीकंपोजर उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

उपयोग की सरल विधि

किसान इसे निम्नलिखित तरीके से तैयार कर सकते हैं—

  • 25 लीटर पानी में एक शीशी बायो-डीकंपोजर मिलाएं।

  • इसमें 1 किलो गुड़ और 50–100 ग्राम बेसन मिलाएं।

  • मिश्रण को ढक्कन वाले ड्रम में 5–7 दिनों तक रखें।

  • प्रतिदिन घड़ी की दिशा में एक बार हिलाएं।

  • सातवें दिन तैयार घोल को प्रति एकड़ खेत में स्प्रे करें या सिंचाई के पानी के साथ दें।

कितने समय में गलती है पराली?

फसल अवशेष के प्रकार और मात्रा पर निर्भर करते हुए 20 से 30 दिनों के भीतर पराली सड़कर खाद में बदलने लगती है। धान और गेहूं के अवशेष अपेक्षाकृत जल्दी विघटित होते हैं, जबकि सरसों जैसे मोटे डंठल में थोड़ा अधिक समय लग सकता है।

किसानों को होने वाले लाभ!

✔️ प्रदूषण में कमी – पराली जलाने की आवश्यकता समाप्त
✔️ मिट्टी की उर्वरता में सुधार – जैविक कार्बन और सूक्ष्मजीवों की वृद्धि
✔️ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम
✔️ फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में बढ़ोतरी
✔️ कम लागत में टिकाऊ खेती

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार उपयोग से मिट्टी की संरचना बेहतर होती है, जिससे जल धारण क्षमता बढ़ती है और अगली फसल को बेहतर पोषण मिलता है।

सरकार की मुहिम को मिलेगा बल!

केंद्र और राज्य सरकारें पराली प्रबंधन के लिए सब्सिडी और जागरूकता अभियान चला रही हैं। ऐसे में इफको का बायो-डीकंपोजर इस प्रयास को मजबूत आधार दे सकता है। यदि बड़े स्तर पर किसान इसे अपनाते हैं तो दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में प्रदूषण की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

सारांश

मात्र 25 रुपये की लागत में उपलब्ध इफको बायो-डीकंपोजर पराली प्रबंधन के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। यह समाधान किसानों को आर्थिक रूप से राहत देने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा सकता है। स्वच्छ हवा, स्वस्थ मिट्टी और बेहतर उत्पादन की दिशा में यह एक सकारात्मक पहल है।

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