ICRISAT को मिला CRISPR-Cas9 लाइसेंस, किसानों के लिए नई उम्मीद!
हैदराबाद। जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और कृषि उत्पादन पर बढ़ते दबाव के बीच किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT) ने जीन एडिटिंग तकनीक CRISPR-Cas9 के उपयोग और तैनाती के लिए दीर्घकालिक मानवीय लाइसेंस (Humanitarian License) प्राप्त किया है। यह कदम एशिया और अफ्रीका के करोड़ों छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए जलवायु-सहिष्णु और अधिक उत्पादक फसल किस्मों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा।
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इस समझौते के तहत ICRISAT को वैश्विक कृषि विज्ञान कंपनी Corteva Agriscience और The Broad Institute से जीन एडिटिंग तकनीक तक दीर्घकालिक पहुंच प्राप्त हुई है। इससे दालों, मोटे अनाज (मिलेट्स) और तिलहनी फसलों में नई उन्नत किस्मों के विकास की प्रक्रिया तेज होगी।
क्या है जीन एडिटिंग तकनीक?
पारंपरिक पौध प्रजनन (Breeding) में वांछित गुणों को एक किस्म से दूसरी किस्म में लाने में कई वर्ष लग सकते हैं। वहीं, जीन एडिटिंग तकनीक फसल के अपने जीनोम में सटीक बदलाव कर सूखा, गर्मी, कीट एवं रोगों के प्रति सहनशीलता बढ़ाने, उत्पादन क्षमता सुधारने और पोषण गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद करती है। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में किसी असंबंधित प्रजाति का डीएनए नहीं जोड़ा जाता।
सूखा, बाढ़ और जलवायु संकट से निपटने में मदद
विशेषज्ञों का मानना है कि एशिया और अफ्रीका के कई हिस्सों में किसान लगातार सूखे, अनियमित वर्षा, बाढ़ और नई बीमारियों की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में जीन एडिटिंग आधारित नई किस्में किसानों की आय बढ़ाने, उत्पादन जोखिम कम करने और खाद्य सुरक्षा मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा कि यह समझौता संस्थान और वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर लाखों छोटे किसानों के लिए एक परिवर्तनकारी उपलब्धि है।
उन्होंने कहा कि कोर्टेवा की जीन एडिटिंग विशेषज्ञता, ICRISAT के उन्नत प्रजनन कार्यक्रमों और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणालियों के साथ साझेदारी से एशिया और अफ्रीका में खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और कृषि प्रणाली की मजबूती को बढ़ावा मिलेगा।
इन फसलों पर होगा विशेष फोकस
इस लाइसेंस के बाद ICRISAT अपनी प्रमुख फसलों में जीन एडिटिंग आधारित अनुसंधान और उत्पाद विकास को आगे बढ़ा सकेगा। इनमें शामिल हैं—
- ज्वार (Sorghum), बाजरा (Pearl Millet), अन्य मोटे अनाज (Millets), चना (Chickpea), अरहर (Pigeonpea), मूंगफली (Groundnut)
अनुसंधान से खेत तक पहुंचेगी तकनीक
यह समझौता ICRISAT की जीनोमिक्स, फसल प्रजनन, फेनोमिक्स और बीज प्रणाली संबंधी विशेषज्ञता को और मजबूत करेगा। साथ ही राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से वैज्ञानिक खोजों को तेजी से किसानों के खेतों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
कोर्टेवा एग्रीसाइंस की बायोटेक्नोलॉजी उपाध्यक्ष डॉ. वेंडी स्रनिक ने कहा कि संस्था को ICRISAT के साथ सहयोग करने पर गर्व है। यह साझेदारी छोटे किसानों को अत्याधुनिक जीन एडिटिंग तकनीक का लाभ दिलाने और ऐसी फसलें विकसित करने में मदद करेगी जो चरम मौसम, कीटों और रोगों का बेहतर सामना कर सकें।
कृषि विशेषज्ञों की नजर में क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम?
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्ष 2050 तक वैश्विक खाद्य मांग में उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है, जबकि कृषि योग्य भूमि सीमित है। ऐसे में कम संसाधनों में अधिक उत्पादन देने वाली जलवायु-सहिष्णु फसल किस्मों का विकास भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है। ICRISAT को मिला यह लाइसेंस विकासशील देशों के किसानों तक उन्नत कृषि जैव-प्रौद्योगिकी पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

