आणंद से डेयरी सहकारिता को नई दिशा: किसानों के लिए चार नई पहलों का शुभारंभ, गुणवत्ता और संगठित दुग्ध कारोबार पर जोर!
आणंद, गुजरात। देश के डेयरी क्षेत्र को तकनीक, गुणवत्ता, डिजिटल व्यवस्था और सहकारिता के माध्यम से नई मजबूती देने की दिशा में गुजरात के आणंद से महत्वपूर्ण पहल की गई है। केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी तथा पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह ‘ललन सिंह’ ने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के आणंद परिसर में सहकारी डेयरी क्षेत्र से जुड़ी चार नई किसानोन्मुख पहलों का शुभारंभ किया।
कार्यक्रम में केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी तथा पंचायती राज राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल, पशुपालन एवं डेयरी विभाग के सचिव नरेश पाल गंगवार, अपर सचिव वर्षा जोशी तथा एनडीडीबी अध्यक्ष डॉ. मीनेश शाह समेत विभाग और डेयरी सहकारिता क्षेत्र से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
यह कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ है जब भारत दुनिया में दूध उत्पादन के मामले में अग्रणी स्थान पर है, लेकिन डेयरी क्षेत्र के सामने उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ दूध की गुणवत्ता, मिलावट पर नियंत्रण, बेहतर शीत-श्रृंखला, संगठित बाजार और पशुपालकों को उचित मूल्य दिलाने जैसी चुनौतियां भी हैं। कार्यक्रम में इन सभी मुद्दों को व्यापक डेयरी विकास से जोड़कर देखा गया।
त्रिभुवनदास पटेल को श्रद्धांजलि के साथ कार्यक्रम की शुरुआत
आणंद को भारत की श्वेत क्रांति और सहकारी डेयरी आंदोलन की ऐतिहासिक भूमि माना जाता है। कार्यक्रम की शुरुआत सहकारिता आंदोलन के प्रमुख प्रणेता त्रिभुवनदास पटेल को पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद दीप प्रज्वलन के साथ हुई।
इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि आणंद से शुरू हुआ सहकारी मॉडल आज देश के करोड़ों दुग्ध उत्पादकों को बाजार से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। किसानों के स्वामित्व वाली सहकारी संस्थाओं के जरिए दूध के संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन की व्यवस्था ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दिया है।
केवल उत्पादन नहीं, दूध की गुणवत्ता भी जरूरी
केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने एनडीडीबी के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बन चुका है। अब डेयरी क्षेत्र के विकास का अगला चरण दूध की गुणवत्ता, सुरक्षा और संगठित विपणन को मजबूत करने से जुड़ा होना चाहिए।
उन्होंने विशेष रूप से दो बड़ी चुनौतियों पर ध्यान आकर्षित किया—पहली, उपभोक्ताओं तक गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित दूध पहुंचाना तथा दूसरी, असंगठित क्षेत्र में हो रहे दुग्ध उत्पादन को संगठित सहकारी व्यवस्था से जोड़ना।
मंत्री के अनुसार, गुणवत्तापूर्ण दूध केवल उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध किसानों की आय से भी है। यदि दूध की गुणवत्ता बेहतर होगी और संग्रहण एवं परीक्षण व्यवस्था पारदर्शी होगी, तो किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी।
उन्होंने कहा कि देश में दुग्ध उत्पादन का बड़ा हिस्सा छोटे और सीमांत पशुपालकों से आता है। ऐसे पशुपालकों को संगठित सहकारी ढांचे से जोड़ने से उन्हें बाजार, तकनीक, पशु स्वास्थ्य सेवाओं और बेहतर मूल्य व्यवस्था तक पहुंच मिल सकती है।
चार नई पहलों से किसानों और डेयरी क्षेत्र को जोड़ने की कोशिश
कार्यक्रम के दौरान चार प्रमुख पहलों का शुभारंभ किया गया। इनका उद्देश्य डेयरी क्षेत्र में छोटे स्तर के किसानों और पशुपालकों से लेकर उपभोक्ताओं तक पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करना है।
10 ग्राम बटर चिपलेट का व्यावसायिक विस्तार
एनडीडीबी की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था मदर डेयरी द्वारा विकसित 10 ग्राम बटर चिपलेट को बड़े स्तर पर व्यावसायिक रूप से आगे बढ़ाने की पहल की गई।
छोटी पैकिंग का उद्देश्य अलग-अलग उपभोक्ता जरूरतों को पूरा करने के साथ वितरण व्यवस्था को सुविधाजनक बनाना है। कार्यक्रम में इस उत्पाद को व्यापक बाजार तक पहुंचाने और इसके व्यावसायीकरण को बढ़ाने पर जोर दिया गया।
दूध में मिलावट की पहचान के लिए किट
दूध की गुणवत्ता से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में मिलावट एक प्रमुख मुद्दा है। इसे ध्यान में रखते हुए एनडीडीबी कैल्फ लिमिटेड द्वारा विकसित मिल्क एडल्टरेशन डिटेक्शन किट को भी लॉन्च किया गया।
इस तरह की तकनीक को व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराने से दूध संग्रहण के दौरान शुरुआती स्तर पर गुणवत्ता जांच को मजबूत किया जा सकता है। इससे सहकारी समितियों, दूध संग्रहण केंद्रों और अन्य संबंधित संस्थाओं को दूध की गुणवत्ता की निगरानी में मदद मिल सकती है।
लिथियम-आयन बैटरी आधारित मोबाइल दूध संग्रहण और शीतलन
डेयरी क्षेत्र में दूध की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए संग्रहण के तुरंत बाद उचित तापमान पर दूध को ठंडा करना महत्वपूर्ण है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए एनडीडीबी और उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था आईडीएमसी लिमिटेड ने लिथियम-आयन बैटरी आधारित मोबाइल दूध संकलन एवं शीतलन प्रणाली विकसित की है।
यह तकनीक विशेष रूप से उन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है जहां स्थायी दूध संग्रहण एवं शीतलन केंद्रों की उपलब्धता सीमित है। मोबाइल प्रणाली के जरिए दूध संग्रहण और शीतलन को अधिक लचीला बनाया जा सकता है।
मंत्री ने इस तकनीक पर आगे भी अनुसंधान एवं विकास कार्य बढ़ाने की जरूरत बताई, ताकि इसे बड़े स्तर पर उपयोग के लिए अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
‘दर्पण’ से डेयरी क्षेत्र में डिजिटल बदलाव
डेयरी सहकारिता को डिजिटल तकनीक से जोड़ने के लिए ‘दर्पण’ पहल का भी शुभारंभ किया गया। इसका उद्देश्य डेयरी क्षेत्र की प्रक्रियाओं में डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है।
डिजिटल व्यवस्था से डेटा प्रबंधन, निगरानी, संस्थागत पारदर्शिता और निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है। सहकारी समितियों के स्तर तक ऐसी तकनीक पहुंचने से किसानों और डेयरी संस्थाओं के बीच सूचनाओं का प्रवाह भी बेहतर हो सकता है।
वाराणसी डेयरी मॉडल से आय बढ़ाने का संदेश
राजीव रंजन सिंह ने एनडीडीबी द्वारा संचालित बायोगैस आधारित वाराणसी डेयरी संयंत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि पशुपालन से किसानों की आय बढ़ाने के लिए केवल दूध पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।
पशुओं से प्राप्त गोबर को बायोगैस और अन्य उपयोगी ऊर्जा स्रोतों में बदलकर अतिरिक्त आर्थिक गतिविधियां विकसित की जा सकती हैं। इससे एक ओर पशुपालकों के लिए आय का नया स्रोत तैयार हो सकता है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा और अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
उन्होंने ऐसे सफल मॉडलों को दूसरे क्षेत्रों में दोहराने की जरूरत पर जोर दिया, ताकि पशुपालन को दूध उत्पादन + जैविक संसाधन + ऊर्जा + अतिरिक्त आय के एकीकृत मॉडल के रूप में विकसित किया जा सके।
स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से गुणवत्ता सुधारने पर जोर
केंद्रीय मंत्री ने सहकारी डेयरी क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को भी जरूरी बताया। उनके अनुसार, प्रतिस्पर्धा के जरिए डेयरी संस्थाओं में गुणवत्ता, दक्षता, उत्पाद विकास और किसानों को बेहतर सेवाएं देने की क्षमता बढ़ सकती है।
उन्होंने एनडीडीबी की नई पहलों को केवल लॉन्च तक सीमित न रखते हुए उनके बड़े पैमाने पर क्रियान्वयन के लिए स्पष्ट रोडमैप और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करने पर जोर दिया।
भारत का दूध उत्पादन 247 मिलियन मीट्रिक टन
केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बताया कि भारत दूध उत्पादन में विश्व में पहले स्थान पर है और देश में दूध उत्पादन 247 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच चुका है।
उन्होंने हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और नीली क्रांति का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की श्वेत क्रांति की शुरुआत इसी आणंद की धरती से हुई थी। इसलिए आणंद का डेयरी क्षेत्र में विशेष ऐतिहासिक और संस्थागत महत्व है।
उन्होंने कहा कि अब चुनौती केवल दूध की मात्रा बढ़ाने की नहीं है, बल्कि पशुओं की उत्पादकता, दूध की गुणवत्ता, प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन और किसानों की आय को साथ-साथ बढ़ाने की है।
नस्ल सुधार और आधुनिक प्रजनन तकनीकों पर फोकस
प्रो. बघेल ने एनडीडीबी द्वारा पशुधन सुधार के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की भी सराहना की। उन्होंने विशेष रूप से ईटी, आईवीएफ और सेक्स-सॉर्टेड सीमन जैसी तकनीकों का उल्लेख किया।
इन तकनीकों का उद्देश्य बेहतर आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं की संख्या बढ़ाना और पशुधन की उत्पादकता में सुधार करना है। आधुनिक प्रजनन तकनीकों के साथ पशु पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं और वैज्ञानिक पशुपालन पद्धतियों को जोड़ना डेयरी उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
75 हजार सहकारी डेयरी समितियों को मजबूत करने का लक्ष्य
प्रो. बघेल ने बताया कि देश में 75,000 सहकारी डेयरी समितियों के सुदृढ़ीकरण और नई समितियों के गठन का लक्ष्य रखा गया है।
इसका एक प्रमुख उद्देश्य असंगठित क्षेत्र के दुग्ध उत्पादकों को संगठित सहकारी व्यवस्था से जोड़ना है। अधिक किसानों के सहकारी नेटवर्क में आने से दूध संग्रहण, परीक्षण, शीतलन, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच की व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
इसका लाभ छोटे पशुपालकों को विशेष रूप से मिल सकता है, क्योंकि वे अक्सर स्थानीय और सीमित बाजारों पर निर्भर रहते हैं।
श्वेत क्रांति 2.0 के लिए तकनीक और सहकारिता का मेल
एनडीडीबी अध्यक्ष डॉ. मीनेश शाह ने स्वागत संबोधन में कहा कि आणंद से शुरू हुआ सहकारी दुग्ध आंदोलन आज भी किसानों के स्वामित्व वाले मॉडल के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दे रहा है।
उन्होंने बताया कि एनडीडीबी श्वेत क्रांति 2.0, राष्ट्रीय गोकुल मिशन, नस्ल सुधार और सहकारी संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे रही है।
उन्होंने कहा कि विभाग, राज्य सरकारों और दूध संघों के साथ मिलकर कृत्रिम गर्भाधान, सेक्स-सॉर्टेड सीमन, जीनोमिक चयन, आईवीएफ और एम्ब्रियो ट्रांसफर जैसी आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
संतुलित पशु आहार भी डेयरी उत्पादकता की अहम कड़ी
डेयरी उत्पादन में पशु की आनुवंशिक क्षमता के साथ उसका पोषण भी महत्वपूर्ण है। एनडीडीबी द्वारा संतुलित पशु आहार के उपयोग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है।
वैज्ञानिक पोषण व्यवस्था से पशुओं की उत्पादकता, स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता में सुधार की संभावनाएं बढ़ती हैं। इसका सीधा संबंध पशुपालक परिवार की आय से जुड़ता है।
गोबर से बायोगैस और बायो-सीएनजी की दिशा में पहल
डॉ. शाह ने बताया कि एनडीडीबी पशुधन से निकलने वाले गोबर के बेहतर उपयोग पर भी काम कर रही है। गोबर को बायोगैस और बायो-सीएनजी में परिवर्तित करने की दिशा में किए जा रहे प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त आय के अवसर देने के साथ स्वच्छ ऊर्जा को भी बढ़ावा दे सकते हैं।
यह मॉडल डेयरी फार्मिंग को एक ऐसी समग्र आर्थिक गतिविधि में बदलने की संभावना रखता है जिसमें दूध के साथ-साथ पशु अपशिष्ट से भी मूल्य पैदा किया जा सके।
किसानों से उपभोक्ताओं तक पूरी डेयरी चेन मजबूत करने की कोशिश
आणंद में शुरू की गई चार नई पहलों को व्यापक रूप से देखा जाए तो इनका फोकस डेयरी क्षेत्र की अलग-अलग जरूरतों को जोड़ने पर है। एक तरफ दूध में मिलावट की पहचान और गुणवत्ता नियंत्रण है, तो दूसरी तरफ मोबाइल शीतलन प्रणाली के जरिए दूध की गुणवत्ता बनाए रखने की कोशिश है। वहीं ‘दर्पण’ जैसी डिजिटल पहल संस्थागत व्यवस्था को तकनीक से जोड़ती है और बटर चिपलेट जैसी पहल उत्पाद स्तर पर बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखती है।
डेयरी क्षेत्र के लिए आगे की चुनौती इन तकनीकों को बड़े पैमाने पर किसानों और सहकारी समितियों तक पहुंचाने की होगी। यदि नई तकनीकों का प्रभावी क्रियान्वयन होता है और अधिक दुग्ध उत्पादक संगठित सहकारी व्यवस्था से जुड़ते हैं, तो इससे दूध की गुणवत्ता, बाजार पहुंच, मूल्यवर्धन और पशुपालक परिवारों की आय को एक साथ मजबूत करने का रास्ता तैयार हो सकता है।
चित्र: सौजन्य एनडीडीबी

























