September 11, 2026 3:38 PM

Krishi Times

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केला किसानों को मिली रोग प्रबंधन की वैज्ञानिक सीख!

सुपौल के केला किसानों को रोग प्रबंधन की वैज्ञानिक जानकारी, गोरौल केला अनुसंधान केंद्र में प्रशिक्षण और प्रक्षेत्रीय फसलों का निरीक्षण

गोरौल/वैशाली, 11 सितंबर 2026। बिहार के प्रमुख केला उत्पादक क्षेत्रों में वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में केला अनुसंधान केंद्र, गोरौल में सुपौल जिले के केला उत्पादकों के लिए आयोजित तीन दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में किसानों को उन्नत उत्पादन तकनीक और रोग प्रबंधन की जानकारी दी गई। एटीएमए (ATMA) द्वारा प्रायोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 9 से 11 सितंबर 2026  तक आयोजित किया जा रहा है।

प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह

कार्यक्रम का उद्देश्य केला उत्पादकों को गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, फसल पोषण, कीट एवं रोग प्रबंधन, वैज्ञानिक बाग प्रबंधन और आधुनिक उत्पादन तकनीकों से जोड़ना है। प्रशिक्षण के दौरान किसानों को खेत स्तर पर आने वाली समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया।

केले के प्रमुख रोगों की पहचान और समेकित प्रबंधन पर व्याख्यान

प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह ने “केले के प्रमुख रोग एवं उनका समेकित प्रबंधन” विषय पर किसानों को विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने केले की फसल को प्रभावित करने वाले प्रमुख रोगों के लक्षण, संक्रमण के कारण, रोगों के फैलाव तथा समय रहते उनकी पहचान के महत्व को समझाया।

उन्होंने किसानों को बताया कि केला फसल में रोग प्रबंधन केवल रोग दिखाई देने के बाद रासायनिक दवाओं के इस्तेमाल तक सीमित नहीं होना चाहिए। स्वस्थ और रोगमुक्त रोपण सामग्री का चयन, खेत की स्वच्छता, जलनिकास की उचित व्यवस्था, संक्रमित पौधों की समय पर पहचान और संतुलित पोषण रोगों की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने जैविक उपायों, कृषि प्रबंधन और आवश्यकता आधारित रासायनिक नियंत्रण को एकीकृत करते हुए समेकित रोग प्रबंधन अपनाने की सलाह दी। इससे उत्पादन लागत को नियंत्रित करने के साथ फसल की गुणवत्ता और उत्पादकता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

किसानों की स्थानीय समस्याओं पर भी हुआ संवाद

प्रशिक्षण के दौरान सुपौल से आए केला उत्पादकों के साथ सीधे संवाद किया गया। किसानों ने अपने क्षेत्रों में फसल उत्पादन के दौरान आने वाली विभिन्न व्यावहारिक समस्याओं को साझा किया। इन समस्याओं के आधार पर रोग पहचान, रोकथाम और खेत प्रबंधन से जुड़े वैज्ञानिक सुझाव दिए गए।

सुपौल जैसे महत्वपूर्ण केला उत्पादक जिले से आए किसानों के लिए यह संवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इसमें अनुसंधान संस्थान में उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी को किसानों की वास्तविक खेत परिस्थितियों से जोड़ने का अवसर मिला।

रेड बनाना और इलक्की केला की फसल का तकनीकी निरीक्षण

व्याख्यान के बाद केला अनुसंधान केंद्र, गोरौल के अनुसंधान प्रक्षेत्रों का तकनीकी निरीक्षण किया गया। इस दौरान विभिन्न केला किस्मों की खड़ी फसलों में पौधों की वृद्धि, छद्मतने की मजबूती, पत्तियों की स्थिति, पुष्पन, घौद विकास और फसल के समग्र स्वास्थ्य का अवलोकन किया गया।

विशेष रूप से पिछले वर्ष लगाए गए रेड बनाना (Red Banana) और इलक्की/Elakki Banana के पौधों की प्रगति संतोषजनक पाई गई। दोनों किस्मों में पौधों की वृद्धि एवं विकास अच्छा रहा है और अब इनके घौदों की कटाई भी शुरू हो चुकी है।

इन किस्मों का संस्थान के प्रक्षेत्र में प्रदर्शन विविध और उच्च-मूल्य वाले केला जर्मप्लाज्म के मूल्यांकन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। आगे इनके घौद भार, फल गुणवत्ता, बाजार स्वीकार्यता तथा स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुकूलन से जुड़े आंकड़ों का व्यवस्थित अभिलेखीकरण किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।

किसान प्रशिक्षण और अनुसंधान के बीच मजबूत हो कड़ी

भ्रमण के दौरान यह भी महसूस किया गया कि केला अनुसंधान केंद्र, गोरौल में उपलब्ध प्रक्षेत्रीय संसाधनों का उपयोग किसान प्रशिक्षण और तकनीकी प्रदर्शन के लिए और अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। यहां विभिन्न किस्मों के प्रदर्शन के साथ गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, रोग प्रबंधन तकनीकों और नई उत्पादन प्रणालियों को किसानों तक पहुंचाने की पर्याप्त संभावनाएं हैं।

अनुसंधान संस्थानों और किसानों के बीच सीधा संवाद कृषि तकनीकों के प्रभावी प्रसार का महत्वपूर्ण माध्यम है। खेत में विकसित होने वाली समस्याओं की जानकारी वैज्ञानिकों तक पहुंचने से अनुसंधान को भी अधिक किसान-केंद्रित बनाया जा सकता है।

प्रशिक्षण से किसानों को मिला व्यावहारिक लाभ

सुपौल के केला उत्पादकों के लिए आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसानों को अनुसंधान प्रक्षेत्र में फसलों का प्रत्यक्ष अवलोकन और वैज्ञानिकों से संवाद का अवसर भी मिला।

समग्र रूप से यह कार्यक्रम कृषक प्रशिक्षण, वैज्ञानिक संवाद और अनुसंधान प्रक्षेत्र के तकनीकी मूल्यांकन की दृष्टि से उपयोगी रहा। इस तरह के कार्यक्रमों के माध्यम से अनुसंधान संस्थानों में विकसित तकनीकों को खेत तक पहुंचाने और किसानों के अनुभवों को वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ने की दिशा में प्रभावी कदम उठाया जा सकता है।

प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह
प्रोफेसर इन-चार्ज (अतिरिक्त प्रभार), केला अनुसंधान केंद्र, गोरौल
विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर पादप रोग विज्ञान एवं सूत्रकृमि विज्ञान विभाग
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार