विशेष रिपोर्ट | मानसून 2026: कम बारिश का संकेत, बढ़ती चिंताएं और किसानों के सामने नई चुनौती
अल नीनो के असर, बदलते मौसम और खरीफ सीजन की तैयारियों पर एक विस्तृत पड़ताल
नई दिल्ली। भारत की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर करता है। ऐसे में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर जारी ताजा पूर्वानुमान ने किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। विभाग ने मानसूनी वर्षा का अनुमान दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 90 प्रतिशत रहने का जताया है, जिसे “सामान्य से कम” श्रेणी में रखा गया है। यह अनुमान अप्रैल में जारी 92 प्रतिशत के पूर्वानुमान से भी कम है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो देश को वर्षा की मात्रा के साथ-साथ उसके वितरण की चुनौती का भी सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि खरीफ सीजन 2026 को लेकर कृषि क्षेत्र में सतर्कता बढ़ गई है।
क्यों महत्वपूर्ण है मानसून?
भारत में होने वाली कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होता है। देश की बड़ी कृषि भूमि अब भी वर्षा आधारित है और करोड़ों किसानों की आय सीधे मानसून की स्थिति से जुड़ी हुई है। कम वर्षा का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जलाशयों, भूजल, बिजली उत्पादन, ग्रामीण रोजगार और खाद्य कीमतों पर भी दिखाई देता है।
मानसून अनुमान में बदलाव क्यों?
आईएमडी ने मई 2026 में मानसून पूर्वानुमान को संशोधित करते हुए वर्षा का अनुमान 90 प्रतिशत एलपीए कर दिया। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पीछे प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल नीनो परिस्थितियां प्रमुख कारण हैं। अल नीनो की स्थिति अक्सर भारत में कमजोर मानसून से जुड़ी मानी जाती है, हालांकि इसका प्रभाव हर वर्ष समान नहीं होता।
विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल अल नीनो के आधार पर मानसून का अंतिम परिणाम तय नहीं होता। भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD), समुद्री सतह का तापमान, वायुमंडलीय परिसंचरण और क्षेत्रीय मौसम प्रणालियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
क्या पूरे देश में समान प्रभाव पड़ेगा?
मौसम विभाग के अनुसार वर्षा की स्थिति सभी राज्यों में एक जैसी नहीं होगी। कुछ क्षेत्रों में सामान्य वर्षा हो सकती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में कमी देखने को मिल सकती है। यही कारण है कि कृषि विशेषज्ञ किसानों को राष्ट्रीय पूर्वानुमान के साथ-साथ स्थानीय मौसम बुलेटिन और जिला स्तरीय सलाह पर भी ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं।
विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम भारत, मध्य भारत और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों के कई हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई गई है। वहीं कुछ क्षेत्रों में सामान्य वर्षा की संभावना बनी हुई है।
किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती: बारिश का वितरण
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि कुल वर्षा से अधिक महत्वपूर्ण उसका समय और वितरण होता है। यदि मानसून के दौरान कम दिनों में अत्यधिक बारिश हो और उसके बाद लंबे समय तक शुष्क परिस्थितियां बनी रहें, तो फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण इसी प्रकार की प्रवृत्ति देखने को मिली है। कई क्षेत्रों में कम समय में भारी वर्षा और फिर लंबे अंतराल तक सूखा रहने की स्थिति बनी है। इससे बुवाई, पौधों की वृद्धि और उत्पादन पर असर पड़ता है।
खरीफ फसलों पर क्या असर पड़ सकता है?
धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दालें और तिलहन खरीफ सीजन की प्रमुख फसलें हैं। इन फसलों की सफलता काफी हद तक मानसून की प्रगति पर निर्भर करती है।
धान की खेती विशेष रूप से अधिक पानी मांगती है। ऐसे क्षेत्रों में जहां सिंचाई के सीमित साधन उपलब्ध हैं, किसानों को फसल चयन में सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है। दूसरी ओर अरहर, मूंग, उड़द, तिल और बाजरा जैसी फसलें अपेक्षाकृत कम पानी में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि फसल विविधीकरण और कम अवधि वाली किस्मों का चयन जोखिम कम करने में मदद कर सकता है।
क्यों बढ़ रहा है श्री अन्न का महत्व?
जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मानसून के दौर में मोटे अनाज या श्री अन्न को टिकाऊ कृषि का महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है। ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो और कुटकी जैसी फसलें कम पानी में उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं। इनके पोषण मूल्य और बढ़ती बाजार मांग ने भी किसानों का ध्यान आकर्षित किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की कृषि रणनीति में श्री अन्न की भूमिका और अधिक बढ़ सकती है।
जल संरक्षण बनेगा सबसे बड़ा हथियार
कम वर्षा की आशंका के बीच जल संरक्षण उपायों का महत्व बढ़ गया है। कृषि वैज्ञानिक किसानों को निम्न उपाय अपनाने की सलाह दे रहे हैं:
- खेतों में मेड़बंदी को मजबूत करना।
- वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना।
- फसल अवशेषों के माध्यम से मल्चिंग करना।
- जैविक खादों का उपयोग बढ़ाना।
- सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाना।
इन उपायों से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है और फसलों को सूखे अंतराल के दौरान राहत मिल सकती है।
कृषि अर्थव्यवस्था पर भी रहेगा असर
कमजोर मानसून का प्रभाव केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। विशेषज्ञों के अनुसार यदि वर्षा में बड़ी कमी आती है तो दालों और तिलहनों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। ग्रामीण आय, उपभोक्ता मांग और समग्र आर्थिक गतिविधियों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
सरकार और वैज्ञानिक संस्थान सतर्क
संभावित जोखिम को देखते हुए कृषि विभाग, मौसम विभाग और कृषि वैज्ञानिक संस्थान लगातार स्थिति की निगरानी कर रहे हैं। कई राज्यों में आकस्मिक कृषि योजनाओं (Contingency Plans) पर काम किया जा रहा है ताकि वर्षा की कमी की स्थिति में किसानों को वैकल्पिक फसल और तकनीकी सलाह उपलब्ध कराई जा सके।
आगे क्या?
मानसून अभी अपने शुरुआती चरण में है और मौसम वैज्ञानिक लगातार इसके विकास पर नजर रखे हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को घबराने की बजाय वैज्ञानिक सलाह और स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के आधार पर निर्णय लेने चाहिए।
वर्ष 2026 का मानसून चुनौतियां जरूर लेकर आया है, लेकिन समय पर योजना, जल प्रबंधन, फसल विविधीकरण और आधुनिक कृषि तकनीकों के उपयोग से जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। बदलते जलवायु परिदृश्य में यही रणनीति भारतीय कृषि को अधिक लचीला और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

