हैदराबाद में चावल जीनोमिक्स अनुसंधान पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण सम्पन्न, युवा वैज्ञानिकों को मिली आधुनिक बायोइन्फॉर्मेटिक्स तकनीकों की जानकारी!
हैदराबाद। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत कार्यरत आईसीएआर-भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIRR), “राइस जीनोमिक्स रिसर्च हेतु प्राइमर डिज़ाइनिंग के कम्प्यूटेशनल दृष्टिकोण” विषय पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया। कार्यक्रम में देशभर के प्रमुख कृषि विश्वविद्यालयों, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों से आए 70 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें 80 प्रतिशत महिलाएं और 20 प्रतिशत पुरुष शामिल रहे। प्रतिभागियों में एम.एससी. छात्र, पीएचडी शोधार्थी और पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो प्रमुख रूप से शामिल थे।
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यह प्रशिक्षण कार्यक्रम कृषि जैव-प्रौद्योगिकी, जीनोमिक्स और बायोइन्फॉर्मेटिक्स के क्षेत्र में युवा शोधकर्ताओं की क्षमता निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। कार्यक्रम में विशेषज्ञ व्याख्यानों के साथ-साथ गहन प्रायोगिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए, जिससे प्रतिभागियों को सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक कम्प्यूटेशनल उपकरणों के व्यावहारिक उपयोग की भी जानकारी मिली।
आधुनिक फसल सुधार में कम्प्यूटेशनल कौशल की बढ़ती आवश्यकता
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए संस्थान के निदेशक डॉ. एम. एस. प्रसाद ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, नई बीमारियों और बढ़ती खाद्य मांग की चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि अनुसंधान में आधुनिक कम्प्यूटेशनल तकनीकों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम शोधकर्ताओं को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
संस्थान की प्रशिक्षण, परीक्षण एवं तकनीकी हस्तांतरण इकाई (TTT) की प्रमुख डॉ. अमतुल वारिस ने आईसीएआर-नई दिल्ली के दिशा-निर्देशों के अनुरूप संस्थान द्वारा संचालित मानव संसाधन विकास गतिविधियों की जानकारी दी। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम संस्थान की एचआरडी पहल का हिस्सा था, जिसकी अध्यक्षता डॉ. चित्रा शंकर कर रही हैं।
वहीं, आईसीएआर-राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी (NAARM) के निदेशक डॉ. आर. एम. सुंदरम ने कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम कृषि अनुसंधान में नवाचार को गति देने और वैज्ञानिक मानव संसाधन को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जीन एडिटिंग और नई धान किस्मों पर विशेषज्ञ व्याख्यान
उद्घाटन सत्र के दौरान एनएएएस हैदराबाद चैप्टर के अंतर्गत विशेष व्याख्यान आयोजित किए गए। जैव-प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ डॉ. सतेन्द्र कुमार मंगरौठिया ने जीन एडिटिंग तकनीकों में हो रही नवीनतम प्रगति पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जीन एडिटिंग भविष्य में जलवायु-सहिष्णु एवं उच्च उत्पादकता वाली फसलों के विकास का प्रमुख आधार बनेगी। उन्होंने धान सुधार कार्यक्रम में विकसित एवं व्यावसायिक रूप से सफल किस्म ‘कमला डीआरआर धान-100’ का उदाहरण भी प्रस्तुत किया।
इसके अलावा डॉ. एस.वी. साई प्रसाद ने आईसीएआर-आईआईआरआर द्वारा विकसित विभिन्न धान किस्मों की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ये किस्में उत्पादन, रोग प्रतिरोधकता, जलवायु अनुकूलता और दाने की गुणवत्ता में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने अखिल भारतीय समन्वित धान अनुसंधान परियोजना (AICRP-Rice) की भूमिका को भी रेखांकित किया, जिसके माध्यम से नई किस्मों का बहु-स्थलीय परीक्षण, पहचान, अधिसूचना और किसानों तक प्रसार सुनिश्चित किया जाता है।
देशभर के प्रतिष्ठित संस्थानों की सहभागिता
प्रशिक्षण कार्यक्रम में आईसीएआर-आईएआरआई (नई दिल्ली एवं हैदराबाद हब), आईसीएआर-आईआईओआर, प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना कृषि विश्वविद्यालय, यूएएस रायचूर, आचार्य एन.जी. रंगा कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय जगतियाल, एस.वी. कृषि महाविद्यालय तिरुपति तथा मल्ला रेड्डी विश्वविद्यालय सहित कई प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रतिभागियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम के दौरान धान जीनोमिक्स अनुसंधान में उपयोग होने वाले आधुनिक बायोइन्फॉर्मेटिक्स टूल्स, प्राइमर डिज़ाइनिंग तकनीक, जीन पहचान, रोग प्रतिरोधी जीनों के विश्लेषण, आणविक प्रजनन तथा डेटा विश्लेषण से संबंधित विषयों पर विशेषज्ञों ने प्रशिक्षण प्रदान किया।
वैज्ञानिक नेटवर्किंग और कौशल विकास का बना मंच
प्रशिक्षण कार्यक्रम का समन्वयन डॉ. सी. एन. नीरजा, डॉ. सतेन्द्र कुमार मंगरौठिया, डॉ. कल्याणी एम. बारबाडीकर, डॉ. वी. पापा राव और डॉ. अमतुल वारिस ने किया। प्रायोगिक सत्रों में डॉ. दिव्या कट्टुपल्ली, डॉ. साई कृष्णा एम. और कनिका के.एम. ने संसाधन व्यक्तियों के रूप में प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया।
समापन सत्र में मुख्य अतिथि डॉ. पी. के. मंडल, प्रधान वैज्ञानिक, जैव-प्रौद्योगिकी, आईसीएआर-राष्ट्रीय पादप जैव-प्रौद्योगिकी संस्थान (NIPB) ने शोधकर्ताओं को वैज्ञानिक समस्याओं की पहचान, प्रभावी शोध प्रश्नों के चयन और वैज्ञानिक परिकल्पना निर्माण की रणनीतियों पर मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि सफल अनुसंधान के लिए आलोचनात्मक सोच, नवाचार, बहु-विषयक दृष्टिकोण और चुनौतियों का समाधान खोजने की क्षमता अत्यंत आवश्यक है।
कृषि अनुसंधान को मिलेगी नई दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि जीनोमिक्स, बायोइन्फॉर्मेटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कृषि अनुसंधान भविष्य की फसल सुधार रणनीतियों का आधार बनेंगे। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम युवा वैज्ञानिकों को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर देश में कृषि अनुसंधान की गुणवत्ता और गति दोनों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। धान जैसी रणनीतिक फसल में उन्नत जीनोमिक्स अनुसंधान खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में नई संभावनाएं खोल सकता है।
Source: icar-iirr

