भारत में 13,703 तितली और पतंगा प्रजातियाँ, दुनिया को चौंकाने वाली जैव विविधता!
जब हम भारत की जैव विविधता की चर्चा करते हैं तो हमारी स्मृति प्रायः बाघ, हाथी, गैंडा, शेर या हिम तेंदुए जैसे करिश्माई जीवों तक ही सीमित रह जाती है। लेकिन प्रकृति का वास्तविक वैभव उन छोटे जीवों में छिपा है, जो न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को जीवित रखते हैं बल्कि पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता के मौन प्रहरी भी हैं। तितलियाँ और पतंगे (लेपिडोप्टेरा) उन्हीं में से हैं।
हाल ही में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) के वैज्ञानिक नवनीत सिंह और राहुल जोशी ने लगभग 12 वर्षों के अथक परिश्रम के बाद भारत की तितलियों और पतंगों की पहली व्यापक वैज्ञानिक सूची प्रकाशित की है। प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Zootaxa में प्रकाशित इस कैटलॉग के अनुसार भारत में 13,703 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह विश्व की ज्ञात लेपिडोप्टेरा प्रजातियों का लगभग 8.25 प्रतिशत है।
यह उपलब्धि केवल एक वैज्ञानिक सूची नहीं है; यह भारत की प्राकृतिक धरोहर का आधिकारिक अभिलेख है।
भारत का भौगोलिक विस्तार विश्व के कुल भूभाग का मात्र लगभग 2.4 प्रतिशत है, लेकिन यहाँ विश्व की 8 प्रतिशत से अधिक तितलियाँ और पतंगे मिलना इस बात का प्रमाण है कि हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट, सुंदरबन से लेकर थार और अंडमान-निकोबार तक फैले विविध पारिस्थितिक तंत्र पृथ्वी के सबसे समृद्ध जैविक क्षेत्रों में शामिल हैं।
तितलियाँ केवल सुंदर नहीं, अर्थव्यवस्था की भी साथी हैं:-
सामान्य धारणा है कि तितलियाँ केवल बगीचों की शोभा बढ़ाती हैं। वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है।
तितलियाँ और अनेक पतंगे महत्वपूर्ण परागणकर्ता (Pollinators) हैं। फल, सब्जियाँ, मसाले, औषधीय पौधे और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियाँ इनके माध्यम से प्रजनन करती हैं। इनके लार्वा अनेक पक्षियों का भोजन हैं, जबकि वयस्क अवस्था में ये चमगादड़ों, सरीसृपों और अन्य जीवों की खाद्य श्रृंखला का अनिवार्य हिस्सा बनते हैं।
यदि ये गायब होते हैं तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र डगमगा सकता है। इसी कारण विश्व भर में तितलियों को जलवायु परिवर्तन के सबसे संवेदनशील जैव-सूचक (Bio-indicators) माना जाता है। किसी क्षेत्र में तितलियों की संख्या और विविधता में परिवर्तन वैज्ञानिकों को यह संकेत देता है कि वहाँ पर्यावरण, तापमान, वर्षा या वनस्पति में क्या बदलाव आ रहे हैं।
भारत की असली चुनौती अब शुरू होती है:-
13,703 प्रजातियों का दस्तावेजीकरण एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, लेकिन यह अंत नहीं बल्कि शुरुआत है। भारत में तीव्र शहरीकरण, जंगलों का विखंडन, रासायनिक कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग, मोनोकल्चर खेती, प्रकाश प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन तेजी से तितलियों और पतंगों के आवासों को प्रभावित कर रहे हैं।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि देश में इन जीवों की दीर्घकालिक निगरानी की कोई सुदृढ़ राष्ट्रीय प्रणाली अभी भी विकसित नहीं हो सकी है। हमारे पास बाघों की गणना होती है, हाथियों की गणना होती है, लेकिन परागणकर्ताओं की व्यवस्थित राष्ट्रीय निगरानी लगभग नगण्य है।
कृषि और खाद्य सुरक्षा से सीधा संबंध:-
भारत की कृषि व्यवस्था परागणकर्ताओं पर निर्भर है। यदि तितलियों और पतंगों की आबादी घटती है तो इसका प्रभाव केवल जैव विविधता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि फल उत्पादन, बीज निर्माण और अंततः खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र पहले ही चेतावनी दे चुका है कि विश्व के लगभग 75 प्रतिशत खाद्य फसलों का उत्पादन किसी न किसी रूप में परागणकर्ताओं पर निर्भर है।
ऐसे में तितलियों का संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं बल्कि कृषि नीति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का भी प्रश्न है।
विज्ञान में धैर्य की दुर्लभ मिसाल:-
इस कैटलॉग को तैयार करने में वैज्ञानिकों ने लगभग 12 वर्षों तक देशभर में क्षेत्रीय सर्वेक्षण किए, संग्रहालयों में सुरक्षित नमूनों का पुनः परीक्षण किया, हजारों शोधपत्रों का सत्यापन किया और वर्गीकरण संबंधी त्रुटियों को सुधारा।
आज के समय में जब अधिकांश उपलब्धियाँ तात्कालिक परिणामों से मापी जाती हैं, यह शोध याद दिलाता है कि वास्तविक विज्ञान धैर्य, अनुशासन और दशकों की प्रतिबद्धता से बनता है।
अब सरकार को क्या करना चाहिए?
यह शोध केवल पुस्तकालयों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर Butterfly and Moth Atlas of India, नागरिक विज्ञान (Citizen Science) कार्यक्रम, विद्यालयों में जैव विविधता उद्यान, प्रत्येक राज्य में लेपिडोप्टेरा मॉनिटरिंग नेटवर्क तथा कीटनाशकों के विवेकपूर्ण उपयोग की नीति विकसित की जानी चाहिए।
यदि भारत वास्तव में “विकसित भारत 2047” का सपना देखता है तो विकास और जैव विविधता के बीच संतुलन स्थापित करना अनिवार्य होगा।
तितलियाँ केवल रंग नहीं हैं, वे प्रकृति की भाषा हैं। पतंगे केवल रात्रिचर कीट नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी के अदृश्य अभियंता हैं।
13,703 प्रजातियों की यह सूची हमें गर्व करने का अवसर अवश्य देती है, लेकिन साथ ही एक गंभीर चेतावनी भी देती है कि यदि हमने इनके आवास, भोजन और प्रजनन स्थलों को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इन रंगों को केवल पुस्तकों और संग्रहालयों में देखेंगी।
प्रकृति का इतिहास हमें सिखाता है कि सभ्यताएँ तब तक ही समृद्ध रहती हैं, जब तक उनके आसपास तितलियाँ उड़ती रहती हैं।
चित्र: प्रतीकात्मक


























