October 25, 2026 3:02 PM

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बदलते मौसम में खेती कैसे बचाएं? रबी किसानों के लिए जरूरी सलाह!

बदलते मौसम में खेती की नई चुनौती: उत्तर भारत में रबी फसलों और फल-बागानों को सुरक्षित रखने के लिए अपनाएं जलवायु-अनुकूल रणनीति

कम वर्षा, बढ़ते तापमान और मिट्टी में घटती नमी के बीच गेहूँ, सरसों, दलहन और फलदार फसलों के बेहतर उत्पादन के लिए वैज्ञानिक कृषि प्रबंधन जरूरी

प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह

लेखक: प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह
स्नातकोत्तर पौध रोग एवं नेमेटोलॉजी विभाग
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, बिहार

मौसम के बदलते मिजाज के बीच खेती की नई चुनौती

खेती की सफलता हमेशा से मौसम, मिट्टी की उर्वरता, जल की उपलब्धता और किसानों के अनुभव पर निर्भर रही है। लेकिन जलवायु परिवर्तन और मौसम की बढ़ती अनिश्चितता ने कृषि एवं बागवानी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कहीं लंबे समय तक बारिश नहीं होती, तो कहीं कम अवधि में अत्यधिक वर्षा हो जाती है। कभी तापमान सामान्य से अधिक रहता है, तो कभी अचानक ठंड, कोहरा और पाला फसलों की बढ़वार को प्रभावित करने लगते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में पारंपरिक कृषि कैलेंडर के आधार पर खेती करना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। किसानों के लिए अब केवल अच्छी किस्मों और उन्नत कृषि तकनीकों का इस्तेमाल करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौसम के पूर्वानुमान, मिट्टी की नमी, सिंचाई के उपलब्ध साधनों और फसलों की अवस्था के अनुसार समय पर निर्णय लेना भी जरूरी है।

उत्तर भारत में अक्टूबर से रबी फसलों की बुआई की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। गेहूँ, सरसों, चना, मसूर, मटर और अन्य दलहनी फसलों के साथ आम, लीची, केला और पपीता जैसे फलदार पौधों के लिए भी यह अवधि महत्वपूर्ण होती है। इस समय लिए गए कृषि प्रबंधन संबंधी निर्णय आने वाले महीनों में फसल की बढ़वार, रोगों के जोखिम और उत्पादन की संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

वर्ष 2026 की मौसमी परिस्थितियां क्यों हैं महत्वपूर्ण?

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के सितंबर 2026 के आकलन में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान देश में सामान्य से कम वर्षा दर्ज होने की जानकारी दी गई थी। अक्टूबर के लिए भी देशव्यापी वर्षा सामान्य से कम रहने और अधिकांश क्षेत्रों में अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना व्यक्त की गई थी।

ऐसी परिस्थितियां कृषि क्षेत्र में जल उपलब्धता, मिट्टी की नमी और तापमान से जुड़े जोखिमों पर ध्यान देने की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। हालांकि, मौसमी परिस्थितियां प्रत्येक राज्य, जिले और स्थानीय क्षेत्र में अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर के पूर्वानुमान को किसी विशेष खेत की वास्तविक स्थिति का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में मानसून के दौरान वर्षा का वितरण, खेतों में बची नमी, भूजल की उपलब्धता और स्थानीय तापमान रबी फसलों की बुआई तथा शुरुआती वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं। किसानों को अपने खेत की मिट्टी, उपलब्ध सिंचाई संसाधनों और स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के आधार पर खेती की योजना बनानी चाहिए।

रबी फसलों के सामने उभरती चुनौतियां

गेहूँ: समय पर बुआई और सिंचाई का संतुलन जरूरी

गेहूँ की अच्छी पैदावार के लिए समयानुकूल बुआई, पर्याप्त मिट्टी की नमी और फसल की विभिन्न अवस्थाओं में अनुकूल तापमान महत्वपूर्ण हैं। बुआई में अनावश्यक देरी होने से फसल का विकास चक्र प्रभावित हो सकता है। बाद के चरणों में तापमान बढ़ने पर दाना भरने की अवधि कम होने और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का जोखिम भी रहता है।

कम नमी वाले खेतों में बुआई से पहले मिट्टी की स्थिति का आकलन करना चाहिए। सिंचाई की उपलब्धता के अनुसार फसल की योजना बनाना, क्षेत्र के अनुकूल किस्मों का चयन करना और कृषि विश्वविद्यालयों तथा कृषि विज्ञान केंद्रों की अनुशंसाओं के मुताबिक बुआई का समय निर्धारित करना उपयोगी होगा।

सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी का विवेकपूर्ण उपयोग करना भी जरूरी है। खेत की वास्तविक जरूरत को ध्यान में रखकर सिंचाई करने से पानी की बचत के साथ फसल की बढ़वार को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

सरसों, चना और मसूर: मिट्टी की नमी पर रखें नजर

सरसों तथा चना, मसूर और मटर जैसी दलहनी फसलों की वृद्धि और उत्पादन में मिट्टी की नमी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शुरुआती अवस्था में नमी की कमी से पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है, जबकि फूल आने और फलियां बनने के समय जल की कमी उत्पादन क्षमता को नुकसान पहुंचा सकती है।

दूसरी ओर, जरूरत से अधिक सिंचाई या खेत में पानी जमा रहने से जड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और कुछ रोगों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए सिंचाई का निर्णय फसल की अवस्था, मिट्टी के प्रकार और उपलब्ध जल के आधार पर लिया जाना चाहिए।

इन फसलों में स्वस्थ बीज, अनुशंसित बीजोपचार, उचित पौध संख्या और संतुलित पोषण पर भी ध्यान देना आवश्यक है। दलहनी फसलों में उपयुक्त जैव उर्वरकों का वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल पौधों के पोषण और मिट्टी की उर्वरता में योगदान दे सकता है।

फल-बागानों की सुरक्षा भी है जरूरी

आम और लीची: आगामी पुष्पन के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन

उत्तर बिहार में आम और लीची की आगामी फसल के लिहाज से शरद ऋतु और सर्दियों का समय महत्वपूर्ण होता है। इस अवधि में तापमान, आर्द्रता, वर्षा, पेड़ों की बढ़वार और पिछले मौसम में अपनाई गई प्रबंधन गतिविधियां आगे होने वाले पुष्पन तथा फलन को प्रभावित कर सकती हैं।

हालांकि, मौसम का प्रभाव प्रत्येक बाग में एक जैसा नहीं होता। यह फल की प्रजाति, किस्म, पेड़ की उम्र, स्थानीय जलवायु और बाग की स्थिति पर निर्भर करता है।

इस दौरान बागों में अनावश्यक सिंचाई और नाइट्रोजन उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से बचना चाहिए। पौधों की वास्तविक जरूरत के अनुसार पोषण प्रबंधन करें और जल निकास की व्यवस्था बनाए रखें। सूखी तथा रोगग्रस्त टहनियों की पहचान कर उचित प्रबंधन करना भी आवश्यक है।

आम और लीची में पुष्पन बढ़ाने के उद्देश्य से बिना वैज्ञानिक आधार के रसायनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। किसी भी वृद्धि नियामक या अन्य कृषि रसायन के उपयोग से पहले संबंधित फसल के लिए निर्धारित अनुशंसाओं का पालन करना जरूरी है।

केला: ठंड और जलभराव से बचाव पर दें ध्यान

बिहार के केला उत्पादक क्षेत्रों में तापमान में गिरावट और मिट्टी की नमी में असंतुलन पौधों की वृद्धि को प्रभावित कर सकता है। कम तापमान में पौधों की बढ़वार धीमी हो सकती है, जबकि खेत में पानी जमा रहने से जड़ों की कार्यक्षमता घट सकती है और जड़ तथा प्रकंद से जुड़े रोगों का खतरा बढ़ सकता है।

केले के खेतों में जल निकास की पर्याप्त व्यवस्था, संतुलित पोषण और पौधों की नियमित निगरानी जरूरी है। तेज हवा की आशंका वाले क्षेत्रों में जरूरत के अनुसार पौधों को सहारा देना भी उपयोगी हो सकता है।

जहां फ्यूजेरियम विल्ट जैसे मृदाजनित रोगों का खतरा हो, वहां विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। स्वस्थ एवं विश्वसनीय रोपण सामग्री का इस्तेमाल, कृषि उपकरणों की स्वच्छता और संक्रमित मिट्टी को एक खेत से दूसरे खेत में जाने से रोकना रोग प्रबंधन के महत्वपूर्ण उपाय हैं।

पपीता: जड़ सड़न से बचाव के लिए जल निकास प्राथमिकता

पपीते की खेती में जलभराव एक गंभीर समस्या बन सकता है। जड़ों के आसपास लंबे समय तक अत्यधिक नमी रहने से जड़ सड़न पैदा करने वाले रोगजनकों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं। इसका असर पौधों की वृद्धि, पत्तियों की स्थिति और फल उत्पादन पर पड़ सकता है।

नई रोपाई के लिए अच्छी जल निकासी वाली भूमि का चयन करना चाहिए। स्वस्थ पौध सामग्री का इस्तेमाल करें और खेत में पानी जमा न होने दें। पौधों की नियमित निगरानी से शुरुआती लक्षणों की पहचान करने में मदद मिलती है।

यदि पौधों में मुरझाने, पत्तियों के पीले पड़ने या जड़ों के सड़ने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो केवल बाहरी लक्षणों के आधार पर रोग का अंतिम निदान नहीं करना चाहिए। जड़ों और तने के निचले हिस्से की जांच कराकर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से एकीकृत रोग प्रबंधन अपनाना चाहिए। जैव-नियंत्रक उत्पादों का उपयोग उनकी गुणवत्ता, लेबल निर्देशों और वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुसार ही करना चाहिए।

जलवायु-अनुकूल खेती के पांच व्यावहारिक उपाय

1. मौसम पूर्वानुमान को खेती के निर्णयों से जोड़ें

बुआई, सिंचाई, उर्वरक प्रयोग और पौध संरक्षण संबंधी गतिविधियों को स्थानीय मौसम सलाह के अनुसार निर्धारित करें। भारत मौसम विज्ञान विभाग की जिला-स्तरीय कृषि-मौसम सलाह पर नियमित नजर रखें। इससे बारिश, तापमान में बदलाव और अन्य मौसमी घटनाओं के अनुरूप तैयारी करने में मदद मिल सकती है।

2. जल संरक्षण को बनाएं कृषि प्रबंधन का आधार

मिट्टी में उपलब्ध नमी का आकलन करके सिंचाई करें और अनावश्यक पानी खर्च करने से बचें। खेत की मेड़बंदी, वर्षा जल संचयन और उपयुक्त परिस्थितियों में मल्चिंग जैसे उपायों को अपनाया जा सकता है। इन उपायों का चयन स्थानीय मिट्टी, फसल और जल उपलब्धता के अनुसार करना चाहिए।

3. फसल और किस्म का चयन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार करें

किसानों को ऐसी फसलों और किस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिए जो संबंधित क्षेत्र के लिए अनुशंसित हों और उपलब्ध जल संसाधनों के अनुकूल हों। जहां खेती की परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां कम अवधि वाली किस्मों पर भी विचार किया जा सकता है। केवल बाजार में लोकप्रिय होने के कारण किसी किस्म का चयन करना उचित नहीं है।

4. मिट्टी के स्वास्थ्य और रोग प्रबंधन पर दें जोर

मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरकों का इस्तेमाल करें। स्वस्थ बीज और पौध सामग्री अपनाएं तथा फसल चक्र को बढ़ावा दें। पौधों में रोग के लक्षण दिखाई देने पर समय रहते विशेषज्ञ की सलाह लें। एकीकृत रोग प्रबंधन के अंतर्गत सांस्कृतिक, जैविक और जरूरत के अनुसार अनुमोदित रासायनिक उपायों का समन्वित उपयोग किया जाना चाहिए।

5. मौसम की चरम घटनाओं के लिए पहले से रहें तैयार

अचानक वर्षा की संभावना होने पर खेतों और बागों में जल निकास की व्यवस्था जांचें। तेज हवा के दौरान जरूरत के अनुसार पौधों को सहारा दें। ठंड या पाले की चेतावनी मिलने पर फसल की अवस्था और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार सुरक्षात्मक उपाय अपनाएं।

यह समझना जरूरी है कि हर परिस्थिति में एक ही उपाय प्रभावी नहीं होता। फसल की किस्म, पौधों की अवस्था, मिट्टी की प्रकृति और स्थानीय मौसम के अनुसार प्रबंधन रणनीति तय करनी चाहिए।

कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका महत्वपूर्ण

बदलती जलवायु परिस्थितियों में किसानों तक समय पर वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाना कृषि अनुसंधान संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। किसानों को स्थानीय मौसम पूर्वानुमान, फसल की उपयुक्त किस्मों, जल प्रबंधन, संतुलित पोषण और रोगों की समय पर पहचान से संबंधित व्यावहारिक जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

किसान भी अपने खेतों में मिट्टी की नमी, फसल की वृद्धि, रोगों के लक्षण और सिंचाई की जरूरत का नियमित अवलोकन करके बेहतर निर्णय ले सकते हैं। स्थानीय अनुभव और वैज्ञानिक सलाह का समन्वय खेती के जोखिम कम करने में सहायक हो सकता है।

निष्कर्ष: मौसम नहीं, खेती की तैयारी बदलने की जरूरत

जलवायु परिवर्तन और मौसमी अनिश्चितता कृषि एवं बागवानी के लिए दीर्घकालिक चुनौतियां हैं। हालांकि, वैज्ञानिक जानकारी, स्थानीय मौसम पूर्वानुमान और समयानुकूल कृषि प्रबंधन के माध्यम से इन चुनौतियों से जुड़े कई जोखिमों को कम किया जा सकता है।

रबी फसलों के लिए समय पर बुआई, जल का कुशल उपयोग, संतुलित पोषण और स्वस्थ बीज महत्वपूर्ण हैं। वहीं, फल-बागानों में जल निकास, पौधों की नियमित निगरानी, उचित पोषण और रोग प्रबंधन आगामी उत्पादन को सुरक्षित रखने में योगदान दे सकते हैं।

बिहार सहित पूरे उत्तर भारत में कृषि का भविष्य केवल अधिक उत्पादन हासिल करने में नहीं, बल्कि बदलती परिस्थितियों के बीच कम जोखिम के साथ स्थिर और टिकाऊ उत्पादन सुनिश्चित करने में है। इसके लिए किसानों को अपने अनुभव के साथ वैज्ञानिक सलाह को अपनाना होगा और कृषि संस्थानों को स्थानीय स्तर पर मौसम एवं कृषि संबंधी जानकारी की उपलब्धता मजबूत करनी होगी।

मौसम का मिजाज बदल रहा है, इसलिए खेती की रणनीति को भी वैज्ञानिक, समयानुकूल और जलवायु-अनुकूल बनाना होगा।


लेखक का अस्वीकरण
यह लेख कृषि एवं बागवानी से संबंधित सामान्य वैज्ञानिक जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से लेखक द्वारा व्यक्तिगत हैसियत में प्रस्तुत किया गया है। इसका लेखक के वर्तमान कार्यरत संस्थान से कोई संबंध नहीं है। लेख में दिए गए सुझाव मौसम, मिट्टी, फसल की किस्म, पौधों की अवस्था और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। किसानों को किसी भी कृषि कार्य, उर्वरक, पौध संरक्षण रसायन या जैव-नियंत्रक उत्पाद के इस्तेमाल से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विश्वविद्यालय अथवा संबंधित विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए तथा उत्पाद के लेबल पर दिए गए निर्देशों का पालन करना चाहिए। मौसम संबंधी निर्णयों के लिए भारत मौसम विज्ञान विभाग की नवीनतम स्थानीय कृषि-मौसम सलाह को प्राथमिकता दें।