October 23, 2026 2:56 AM

Krishi Times

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खेत बचाओ, इंसान बचाओ: करनाल से देशव्यापी अभियान शुरू!

“इंसान को भी बचाओ, खेत को भी बचाओ”: करनाल के तरावड़ी से राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की शुरुआत!

22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक देशभर में चलेगा जन-जागरूकता अभियान, किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, फसल चक्र और प्राकृतिक खेती अपनाने की सलाह..हरियाणा के 28,422 गरीब परिवारों को पक्के मकान की सौगात, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत 1,343.06 करोड़ रुपये की मंजूरी..कृषि वैज्ञानिक गांव-गांव जाकर किसानों को करेंगे जागरूक, मिट्टी की सेहत सुधारने और पराली जलाने से बचने पर जोर

करनाल, –हरियाणा के करनाल जिले के तरावड़ी से 22 अक्टूबर को केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ का शुभारंभ किया। अभियान का उद्देश्य मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देना तथा किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना है। यह अभियान 30 नवंबर तक देशभर में चलाया जाएगा। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके), कृषि संस्थानों और वैज्ञानिकों के माध्यम से किसानों तक मिट्टी के स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी पहुंचाने पर जोर दिया गया।

केंद्रीय मंत्री ने किसानों को आगाह किया कि उर्वरकों और कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी की सेहत, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। उन्होंने अभियान का संदेश देते हुए कहा कि खेती की जमीन को स्वस्थ रखना और इंसान को बीमारियों से बचाना एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। किसानों से अपील की गई कि वे मिट्टी की जांच के आधार पर खाद का इस्तेमाल करें, फसल चक्र में बदलाव लाएं और प्राकृतिक खेती को धीरे-धीरे अपनाएं।

मिट्टी की सेहत बचाना राष्ट्रीय जिम्मेदारी

तरावड़ी में आयोजित किसान सम्मेलन को संबोधित करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मिट्टी की उर्वरता में गिरावट कृषि के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी धरती और खेतों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं। खेती की लागत नियंत्रित रखने, मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और लंबे समय तक उत्पादन क्षमता बनाए रखने के लिए किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और संबंधित संस्थानों को मिलकर काम करना होगा।

उन्होंने हरियाणा के किसानों की मेहनत और नए कृषि प्रयोगों का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां के प्रगतिशील किसान दूसरे राज्यों में भी जाकर खेती की नई तकनीकों और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दे रहे हैं। उनके अनुसार, किसानों के अनुभवों को साझा करना और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल तकनीक अपनाना टिकाऊ खेती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

सस्ती खाद का मतलब जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल नहीं

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद सरकार किसानों को राहत देने के लिए सब्सिडी पर बड़ी राशि खर्च कर रही है। उनके संबोधन के अनुसार, उर्वरक सब्सिडी पर सरकार का खर्च डेढ़ लाख करोड़ रुपये से अधिक है। उन्होंने यूरिया और डीएपी का उपयोग जरूरत के अनुसार करने की सलाह दी।

उन्होंने कहा कि अधिक खाद डालने से हर स्थिति में उत्पादन नहीं बढ़ता। इसके विपरीत, जरूरत से ज्यादा उर्वरक डालने से खेती की लागत बढ़ सकती है और मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए किसानों को खाद की मात्रा का निर्धारण फसल की जरूरत और मिट्टी की जांच के आधार पर करना चाहिए।

कार्यक्रम में यूरिया की बोरी 266 रुपये और डीएपी की बोरी 1,350 रुपये में उपलब्ध होने का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि सरकारी सब्सिडी का लाभ तभी बेहतर तरीके से मिलेगा, जब उर्वरकों का इस्तेमाल वैज्ञानिक सलाह के अनुसार किया जाए।

सॉइल हेल्थ कार्ड के आधार पर डालें खाद

खेत बचाओ अभियान’ के तहत किसानों को सॉइल हेल्थ कार्ड के इस्तेमाल के प्रति जागरूक करने पर विशेष जोर दिया गया। मिट्टी की जांच से यह पता लगाया जा सकता है कि खेत में किन पोषक तत्वों की कमी है और किस उर्वरक की कितनी जरूरत है।

किसानों को सलाह दी गई कि वे बिना जांच और जरूरत के बार-बार खाद डालने से बचें। संतुलित पोषण प्रबंधन से उर्वरकों पर होने वाला अनावश्यक खर्च कम करने और मिट्टी की उत्पादकता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

कृषि विशेषज्ञों और संस्थानों की भूमिका इस अभियान में महत्वपूर्ण होगी। किसानों को स्थानीय मिट्टी, फसल और सिंचाई की परिस्थितियों के अनुसार सलाह उपलब्ध कराने से वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा मिल सकता है।

फसल चक्र में बदलाव से सुधरेगी जमीन की उर्वरता

मंत्री ने किसानों को लगातार धान और गेहूं की खेती करने के बजाय फसल चक्र में विविधता लाने की सलाह दी। उन्होंने चना, मसूर और अरहर जैसी दलहनी फसलों को खेती में शामिल करने पर जोर दिया।

दलहनी फसलों की जड़ों में मौजूद विशेष जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को पौधों के उपयोग योग्य रूप में बदलने में मदद करते हैं। इससे मिट्टी में नाइट्रोजन प्रबंधन को सहारा मिलता है और कुछ परिस्थितियों में रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों की जरूरत घट सकती है।

फसल विविधीकरण से किसानों को एक ही फसल पर निर्भरता कम करने का अवसर भी मिल सकता है। हालांकि, फसल चयन करते समय स्थानीय जलवायु, बाजार, सिंचाई की उपलब्धता और संभावित आमदनी को ध्यान में रखना जरूरी है।

आधे एकड़ से शुरू करें प्राकृतिक खेती

केंद्रीय मंत्री ने किसानों को सलाह दी कि वे शुरुआत में अपने पूरे खेत को प्राकृतिक खेती में बदलने के बजाय कम से कम आधे एकड़ में इसका प्रयोग कर सकते हैं। उन्होंने बीजामृत और घनजीवामृत जैसे पारंपरिक कृषि इनपुट का उल्लेख करते हुए प्राकृतिक खेती की लागत कम करने की संभावनाओं पर जोर दिया।

प्राकृतिक खेती में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैविक संसाधनों का इस्तेमाल, मिट्टी में जैविक गतिविधियों को बढ़ावा देना और बाहरी कृषि इनपुट पर निर्भरता कम करना प्रमुख उद्देश्य हैं। हालांकि, इसका परिणाम मिट्टी, फसल, मौसम और अपनाई गई तकनीक के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

किसानों को सलाह दी गई कि वे छोटे क्षेत्र में प्रयोग करते हुए फसल की पैदावार, लागत और मिट्टी की स्थिति का रिकॉर्ड रखें। इसके आधार पर वे तय कर सकते हैं कि किस पद्धति को कितने क्षेत्र में अपनाना उपयोगी होगा।

पराली जलाने से मिट्टी के जीवों को नुकसान

अभियान में पराली प्रबंधन को भी प्रमुख मुद्दा बनाया गया। शिवराज सिंह चौहान ने किसानों से फसल अवशेषों को खेत में आग लगाकर नष्ट करने से बचने की अपील की। पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी की सतह पर मौजूद जैविक पदार्थ तथा कई उपयोगी जीव प्रभावित हो सकते हैं।

केंचुए और मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्मजीव जैविक पदार्थों के विघटन तथा पोषक तत्वों के चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनकी गतिविधियां मिट्टी की संरचना और उसकी उत्पादकता को बनाए रखने में मदद करती हैं।

किसानों को फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए उपलब्ध कृषि मशीनरी, मल्चिंग, अवशेषों को मिट्टी में मिलाने और अन्य उपयुक्त विकल्पों के बारे में जानकारी देने की जरूरत है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान अपनाने से पराली जलाने की समस्या कम करने में मदद मिल सकती है।

ग्रीन अमोनिया से उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भरता पर जोर

कार्यक्रम में ग्रीन अमोनिया के माध्यम से उर्वरक उत्पादन को बढ़ावा देने की संभावनाओं का भी उल्लेख किया गया। ग्रीन अमोनिया का उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार हाइड्रोजन के इस्तेमाल के जरिए किया जा सकता है। इससे उर्वरक निर्माण क्षेत्र में उत्सर्जन कम करने और ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने की संभावनाएं बनती हैं।

इसके लिए तकनीकी विकास, स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता, लागत में कमी और औद्योगिक स्तर पर उत्पादन बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा। कृषि क्षेत्र में टिकाऊ बदलाव के लिए खेतों में उर्वरकों का संतुलित उपयोग और उर्वरक उत्पादन की स्वच्छ तकनीकों को साथ लेकर चलना जरूरी है।

हरियाणा के 28,422 परिवारों को पक्के मकान की मंजूरी

कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान ने हरियाणा के ग्रामीण गरीब परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत 28,422 पक्के मकानों की स्वीकृति से संबंधित पत्र सौंपा। इसके लिए 1,343.06 करोड़ रुपये की वित्तीय मंजूरी का उल्लेख किया गया।

उन्होंने यह पत्र हरियाणा के कृषि एवं पशुपालन मंत्री श्याम सिंह राणा को सौंपा। इस स्वीकृति से पात्र ग्रामीण परिवारों को पक्के आवास उपलब्ध कराने की दिशा में सहायता मिलने की उम्मीद है।

ग्रामीण आवास योजनाएं केवल मकान उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की बुनियादी आवासीय जरूरतों को पूरा करना भी है। स्वीकृत राशि का वास्तविक लाभ पात्र परिवारों तक पहुंचाने के लिए निर्माण कार्य, लाभार्थियों की पात्रता और योजना के दिशा-निर्देशों के अनुसार क्रियान्वयन महत्वपूर्ण रहेगा।

वैज्ञानिक गांवों में जाकर करेंगे जागरूक

शिवराज सिंह चौहान ने कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक, कृषि वैज्ञानिकों और अधिकारियों से अपील की कि वे 22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक प्रयोगशालाओं और कार्यालयों तक सीमित न रहें, बल्कि गांवों में जाकर किसानों से सीधा संवाद करें।

उन्होंने कृषि संस्थानों से किसान चौपाल, जागरूकता कार्यक्रम और प्रशिक्षण के माध्यम से मिट्टी के स्वास्थ्य, संतुलित उर्वरक उपयोग, फसल विविधीकरण तथा प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी देने का आह्वान किया।

इस अभियान की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों को उनके खेतों की वास्तविक जरूरतों के अनुसार कितनी व्यावहारिक सलाह मिलती है और वे उन उपायों को कितनी आसानी से अपना पाते हैं।

किसानों ने लिया खेत बचाने का संकल्प

कार्यक्रम के समापन पर केंद्रीय मंत्री के आह्वान पर उपस्थित किसानों ने मिट्टी का स्वास्थ्य बचाने, रासायनिक उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करने, फसल चक्र में विविधता लाने और पराली नहीं जलाने का संकल्प लिया। सम्मेलन में ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष के बीच किसानों ने टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने का संदेश दिया।

इस अवसर पर आईसीएआर के महानिदेशक एवं कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर) के सचिव डॉ. मांगीलाल जाट, हरियाणा के कृषि विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव विजेंद्र कुमार, कृषि वैज्ञानिकों, प्रशासनिक अधिकारियों और बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान ‘खेत बचाओ अभियान’ पुस्तिका का विमोचन भी किया गया।

खेत की सेहत सुरक्षित रखना केवल कृषि उत्पादन का सवाल नहीं, बल्कि किसानों की आय, खेती की लागत, पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा है। मिट्टी की जांच, संतुलित खाद, फसल विविधीकरण, प्रभावी पराली प्रबंधन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल प्राकृतिक खेती जैसे उपायों को व्यवहार में लाना इस अभियान की सफलता के लिए अहम होगा।