दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन का एक साल: उत्पादन बढ़ाने, आयात घटाने और किसानों की आय मजबूत करने की दिशा में भारत
2030-31 तक 350 लाख टन दलहन उत्पादन का लक्ष्य, तूर-अरहर, उड़द और मसूर पर विशेष जोर; बीज, एमएसपी, सरकारी खरीद और प्रसंस्करण को जोड़कर तैयार हो रही आत्मनिर्भरता की रणनीति
कृषि विशेष | Krishi Times
भारत में दालें केवल भोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की पोषण सुरक्षा और किसानों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार हैं। शाकाहारी आबादी के लिए दालें प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं, जबकि कृषि व्यवस्था में इनका महत्व मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और किसानों की आमदनी के नए अवसर तैयार करने तक फैला हुआ है। इसके बावजूद घरेलू मांग के मुकाबले उत्पादन में कमी के कारण भारत को समय-समय पर बड़ी मात्रा में दालों का आयात करना पड़ता है। इस निर्भरता को कम करने और देश को दलहन उत्पादन में अधिक आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 11 अक्टूबर 2025 को ‘दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन’ की शुरुआत की थी। 11 अक्टूबर 2026 को इस मिशन का पहला वर्ष पूरा होने के अवसर पर इसके लक्ष्यों, शुरुआती प्रगति और किसानों के लिए संभावित लाभों पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है।
वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक के लिए 11,440 करोड़ रुपये के वित्तीय प्रावधान वाला यह मिशन केवल दलहन का उत्पादन बढ़ाने की योजना नहीं है। इसका उद्देश्य बेहतर बीज, उन्नत कृषि तकनीक, खेती का विस्तार, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), सुनिश्चित सरकारी खरीद, प्रसंस्करण सुविधाओं और डिजिटल निगरानी को एक साथ जोड़कर दलहन की पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है। सरकार की रणनीति स्पष्ट है कि घरेलू उत्पादन बढ़े, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले, उपभोक्ताओं के लिए दालों की उपलब्धता बेहतर हो और आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा की बचत की जा सके।
350 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य, खेती का रकबा बढ़ाने पर जोर
दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन के तहत वर्ष 2030-31 तक देश में दलहन उत्पादन लगभग 350 लाख टन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही औसत उत्पादकता को बढ़ाकर 1,130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करने और दलहन की खेती का कुल रकबा 310 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने की योजना है। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अगले छह वर्षों में खेती के क्षेत्र में लगभग 35 लाख हेक्टेयर की अतिरिक्त वृद्धि करने पर जोर दिया जा रहा है।
मिशन में विशेष रूप से तूर यानी अरहर, उड़द और मसूर के उत्पादन को बढ़ाने पर ध्यान दिया गया है। ये ऐसी प्रमुख दालें हैं जिनकी घरेलू खपत अधिक है और जिनकी आपूर्ति में कमी आने पर आयात की जरूरत बढ़ सकती है। इन फसलों की उत्पादकता बढ़ाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कई क्षेत्रों में खेती वर्षा पर निर्भर रहती है। अनियमित मानसून, लंबे सूखे, अधिक बारिश, तापमान में बदलाव और कीट-रोगों का प्रकोप उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।
सरकार का लक्ष्य केवल अधिक क्षेत्र में बुवाई कराना नहीं, बल्कि प्रति हेक्टेयर उत्पादन में स्थायी सुधार लाना भी है। यदि किसानों को बेहतर किस्मों के बीज, समय पर कृषि सलाह, संतुलित पोषण प्रबंधन और प्रभावी कीट नियंत्रण की सुविधा मिले, तो मौजूदा खेतों से भी अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इससे खेती की लागत और उत्पादन के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।
उत्पादन में सुधार, रकबा और उत्पादकता दोनों बढ़े
उपलब्ध कृषि आंकड़ों के अनुसार, भारत में दलहन उत्पादन में पिछले वर्षों के मुकाबले वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2024-25 में देश का कुल दलहन उत्पादन 256.83 लाख टन था, जो वर्ष 2025-26 के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार बढ़कर 274.09 लाख टन हो गया। इस प्रकार उत्पादन में लगभग 17.26 लाख टन की वृद्धि दर्ज की गई।
इसी अवधि में दलहन की खेती का क्षेत्र 277.20 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 286.46 लाख हेक्टेयर हो गया। यानी खेती के रकबे में लगभग 9.26 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई। राष्ट्रीय औसत उत्पादकता भी 926 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 957 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई।
ये आंकड़े संकेत देते हैं कि उत्पादन में बढ़ोतरी के पीछे खेती के विस्तार के साथ उत्पादकता में सुधार की भी भूमिका रही है। हालांकि, 2030-31 तक निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने के लिए मौजूदा गति को बनाए रखना और उत्पादन में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करना आवश्यक होगा।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल देश के प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। इन राज्यों में जलवायु, मिट्टी, सिंचाई की उपलब्धता और प्रचलित फसल प्रणालियों के अनुसार अलग-अलग रणनीतियों की जरूरत होगी। उदाहरण के लिए, धान की कटाई के बाद खेतों में उपलब्ध नमी का उपयोग करके मसूर या अन्य उपयुक्त दलहनी फसलें उगाने से अतिरिक्त उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसी तरह, फसल चक्र में दलहनों को शामिल करने से किसानों को एक ही फसल पर निर्भर रहने की मजबूरी कम करने में मदद मिल सकती है।
जलवायु-अनुकूल बीजों से बढ़ेगी उत्पादन क्षमता
दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए गुणवत्तापूर्ण बीज सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। किसान यदि कम अंकुरण क्षमता वाले या क्षेत्र के अनुकूल नहीं होने वाले बीजों का इस्तेमाल करते हैं, तो अच्छी कृषि तकनीक अपनाने के बावजूद अपेक्षित उत्पादन नहीं मिल पाता। इसे ध्यान में रखते हुए मिशन के तहत जलवायु-अनुकूल और बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया है।
छह वर्षों में 87.5 लाख मुफ्त बीज किट वितरित करने और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वर्ष 2025-26 के दौरान रबी फसलों के लिए 9.25 लाख बीज किट वितरित किए जाने की जानकारी दी गई है। बीज किट के माध्यम से किसानों को उन्नत किस्मों को अपनाने का अवसर मिलता है और नई तकनीकों को खेतों तक पहुंचाने में सहायता मिलती है।
हालांकि, बीज किट का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब उनका वितरण बुवाई से पहले हो, बीज संबंधित क्षेत्र की जलवायु के अनुकूल हों और किसानों को बुवाई से लेकर कटाई तक तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाए। कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों की भूमिका यहां महत्वपूर्ण हो जाती है।
दलहन की खेती में ऐसी किस्मों की जरूरत है जो कम अवधि में तैयार हों, उपलब्ध नमी का बेहतर उपयोग करें और प्रमुख कीटों तथा रोगों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहनशील हों। इससे धान और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों के बीच दलहनी फसलों को शामिल करने के अवसर बढ़ सकते हैं। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में यह रणनीति उपयोगी हो सकती है जहां किसान सिंचाई के सीमित साधनों के कारण अधिक पानी की मांग वाली फसलों पर निर्भर रहते हैं।
489 जिलों में क्लस्टर आधारित खेती की रणनीति
मिशन के अंतर्गत 489 जिलों को शामिल करते हुए क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण अपनाने की योजना है। इसका उद्देश्य चुनिंदा क्षेत्रों में दलहन उत्पादन को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाना और किसानों को एकीकृत सहायता उपलब्ध कराना है।
क्लस्टर मॉडल में किसानों को बेहतर बीज, कृषि संबंधी प्रशिक्षण, उन्नत उत्पादन तकनीक, फसल प्रबंधन और बाजार से जुड़ी जानकारी एक साथ उपलब्ध कराई जा सकती है। जब किसी क्षेत्र के अनेक किसान समान फसल और वैज्ञानिक पद्धति अपनाते हैं, तो बीज तथा अन्य कृषि सामग्री की आपूर्ति, तकनीकी प्रशिक्षण, मशीनों के साझा उपयोग और उपज के संग्रहण में भी सुविधा होती है।
इस व्यवस्था में किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों को भी जोड़ा जा सकता है। सामूहिक रूप से उपज बेचने से किसानों की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है। साथ ही, स्थानीय स्तर पर सफाई, ग्रेडिंग, भंडारण और प्रसंस्करण की व्यवस्था विकसित होने पर कच्ची उपज के बजाय मूल्यवर्धित उत्पादों से आय बढ़ाने के अवसर मिल सकते हैं।
लेकिन क्लस्टर आधारित खेती की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि चयनित जिलों में किसानों को वास्तविक जरूरतों के अनुसार सहायता मिले। केवल लक्ष्य निर्धारित करना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक क्षेत्र की फसल प्रणाली, सिंचाई, बाजार, भंडारण और परिवहन की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए कार्ययोजना तैयार करना जरूरी होगा।
एमएसपी में बढ़ोतरी से किसानों को मूल्य सुरक्षा
दलहन की खेती बढ़ाने के लिए किसानों को लाभकारी मूल्य मिलना जरूरी है। किसान अक्सर इस आशंका के कारण किसी फसल का रकबा बढ़ाने से बचते हैं कि अच्छी उपज मिलने के बावजूद बाजार में उचित कीमत नहीं मिलेगी। दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद व्यवस्था को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 के मुकाबले विपणन सत्र 2026-27 के लिए प्रमुख दलहनों के एमएसपी में बढ़ोतरी की गई है।
उड़द का एमएसपी 7,400 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 8,200 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है। इसमें 800 रुपये यानी लगभग 10.81 प्रतिशत की वृद्धि है। तूर या अरहर का समर्थन मूल्य 7,550 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 8,450 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है, जो 900 रुपये यानी लगभग 11.92 प्रतिशत अधिक है। मसूर का एमएसपी 6,700 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 7,000 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है, जिसमें 300 रुपये यानी लगभग 4.48 प्रतिशत की वृद्धि शामिल है।
एमएसपी में बढ़ोतरी किसानों को उत्पादन संबंधी निर्णय लेने में मदद कर सकती है। हालांकि, समर्थन मूल्य घोषित होना और किसानों को वास्तव में उस मूल्य पर अपनी उपज बेच पाने का अवसर मिलना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए खरीद केंद्रों की उपलब्धता, पंजीकरण की प्रक्रिया, उपज की गुणवत्ता संबंधी नियम, भुगतान की समयबद्धता और खरीद की वास्तविक मात्रा पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
एनसीसीएफ और नैफेड के माध्यम से सुनिश्चित खरीद
मिशन के तहत भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ लिमिटेड (एनसीसीएफ) और भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (नैफेड) को वर्ष 2025-26 से 2028-29 तक चार वर्षों की अवधि में तूर, उड़द और मसूर की 100 प्रतिशत खरीद के लिए अधिकृत किए जाने की जानकारी दी गई है। यह व्यवस्था निर्धारित शर्तों के तहत पंजीकृत और इच्छुक किसानों से खरीद सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाई गई है।
इसका संभावित लाभ यह है कि किसानों को बाजार में कीमतों में गिरावट आने पर वैकल्पिक खरीद व्यवस्था मिल सकती है। यदि खरीद समय पर होती है और भुगतान सीधे किसानों तक पहुंचता है, तो बिचौलियों पर निर्भरता कम करने तथा किसानों की नकदी संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है।
17 जून 2026 तक उपलब्ध एनसीसीएफ खरीद डैशबोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, नौ राज्यों में 10.55 लाख टन दलहन की खरीद किए जाने और किसानों को 7,047 करोड़ रुपये का एमएसपी भुगतान जारी करने की जानकारी दी गई। इस प्रक्रिया में 7.74 लाख पंजीकृत किसानों में से 4.69 लाख किसानों को लाभ पहुंचने का उल्लेख है।
खरीफ 2025-26 के लिए 7.89 लाख टन दलहन की खरीद और 3.66 लाख किसानों को लाभ पहुंचने की जानकारी भी उपलब्ध कराई गई है। इन आंकड़ों को अलग-अलग खरीद अवधियों और फसलों के संदर्भ में समझना जरूरी है, ताकि एक ही खरीद को दोबारा जोड़ने से कुल उपलब्धि का गलत आकलन न हो।
खरीद व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि छोटे और सीमांत किसानों को भी इसका लाभ मिले। इसके लिए गांवों के नजदीक खरीद केंद्र, सरल पंजीकरण, उपज की समय पर तौल और पारदर्शी भुगतान व्यवस्था आवश्यक है। यदि किसान को मंडी या खरीद केंद्र तक पहुंचने में अधिक परिवहन खर्च करना पड़ता है, तो घोषित एमएसपी का वास्तविक लाभ कम हो सकता है।
आयात में कमी और निर्यात में बढ़ोतरी के संकेत
भारत में दलहन उत्पादन बढ़ने का प्रभाव घरेलू बाजार के साथ विदेशी व्यापार पर भी दिखाई दे सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दलहन का आयात मूल्य वर्ष 2024-25 में 46,427.60 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2025-26 में घटकर 31,793.59 करोड़ रुपये रह गया। यह लगभग 31.52 प्रतिशत की कमी है।
दूसरी ओर, भारत से दलहन का निर्यात वर्ष 2024-25 में 855 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2025-26 में 969.53 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। इसमें लगभग 13.40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसी अवधि में दलहन निर्यात की मात्रा 10.01 लाख टन तक पहुंचने की जानकारी दी गई है।
चीन, संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश, अमेरिका और श्रीलंका प्रमुख निर्यात गंतव्यों में शामिल रहे। इससे भारतीय दलहन के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवसरों का संकेत मिलता है।
हालांकि, आयात के मूल्य में गिरावट को पूरी तरह घरेलू उत्पादन में वृद्धि का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय कीमतों, आयातित दलहन की किस्मों, व्यापार नीति, विनिमय दर और घरेलू मांग में बदलाव का भी प्रभाव पड़ता है। इसी तरह, निर्यात में वृद्धि को स्थायी बनाने के लिए गुणवत्ता मानकों, खाद्य सुरक्षा नियमों, प्रसंस्करण और समय पर आपूर्ति पर ध्यान देना होगा।
यदि घरेलू उत्पादन लगातार बढ़ता है और बाजार की जरूरतों के अनुरूप उपज उपलब्ध रहती है, तो आयात पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ भारतीय किसानों और प्रसंस्करण उद्योग को निर्यात के नए अवसर मिल सकते हैं।
दाल मिलों से बढ़ेगा मूल्यवर्धन और ग्रामीण रोजगार
दलहन की खेती से किसानों को बेहतर आय दिलाने के लिए केवल खेत में उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। फसल की सफाई, छंटाई, भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन के दौरान भी मूल्य जुड़ता है। यदि यह काम स्थानीय स्तर पर किया जाए, तो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और उद्यमिता के अवसर पैदा हो सकते हैं।
दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन के तहत 1,000 दाल प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। पहले चरण में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 528 इकाइयां आवंटित किए जाने की जानकारी दी गई है।
इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के अंतर्गत खाद्य प्रसंस्करण और संरक्षण क्षमताओं के सृजन एवं विस्तार की योजना के तहत 23 दाल प्रसंस्करण इकाइयों को मंजूरी दिए जाने और उनमें से 18 का काम पूरा होने की जानकारी दी गई है।
स्थानीय दाल मिलें किसानों से सीधे उपज खरीदने, गुणवत्ता के आधार पर उसका वर्गीकरण करने और बाजार की मांग के अनुसार उत्पाद तैयार करने में मदद कर सकती हैं। इससे परिवहन लागत कम करने और स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था में अधिक मूल्य बनाए रखने के अवसर मिलेंगे।
यदि इन इकाइयों का संचालन एफपीओ, सहकारी संस्थाओं, महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमियों की भागीदारी से होता है, तो महिलाओं तथा युवाओं के लिए भी रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। हालांकि, प्रसंस्करण इकाइयों की सफलता के लिए नियमित कच्चा माल, बिजली, कार्यशील पूंजी, बाजार संपर्क और तकनीकी दक्षता सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
डिजिटल निगरानी से बीज और खरीद व्यवस्था में पारदर्शिता
मिशन के कार्यान्वयन में डिजिटल तकनीक को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर त्रिस्तरीय संचालन समितियों के माध्यम से योजना की प्रगति की निगरानी की व्यवस्था की गई है।
‘कृषि मैपर’ एप्लिकेशन का उद्देश्य फसल क्षेत्रों की जियो-टैगिंग, निर्धारित समूहों की निगरानी और बीज किस्मों के प्रदर्शन से संबंधित जानकारी जुटाना है। इससे योजना के अंतर्गत खेती का विस्तार कहां हुआ, किस क्षेत्र में कौन-सी किस्म बेहतर प्रदर्शन कर रही है और किन इलाकों में अतिरिक्त सहायता की जरूरत है, इसका आकलन करने में मदद मिल सकती है।
‘साथी’ यानी सीड ऑथेंटिकेशन, ट्रेसेबिलिटी एंड होलिस्टिक इन्वेंट्री पोर्टल बीज उत्पादन से लेकर प्रमाणीकरण और बिक्री तक की आपूर्ति श्रृंखला को अधिक पारदर्शी बनाने पर केंद्रित है। प्रमाणित बीजों की उपलब्धता और उनके स्रोत की जानकारी किसानों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि नकली या घटिया बीजों से फसल को नुकसान पहुंच सकता है।
एग्रीस्टैक और डिजिटल फसल सर्वेक्षण जैसी व्यवस्थाओं को किसान पहचान, भूखंड संबंधी सत्यापित जानकारी तथा मृदा स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी के साथ जोड़ने का उद्देश्य योजनाओं के लक्षित क्रियान्वयन में सहायता करना है। वहीं, ई-समृद्धि और विस्तार जैसे प्लेटफॉर्म खरीद, किसान सत्यापन तथा बाजार संबंधी जानकारी की प्रक्रिया को बेहतर बनाने में भूमिका निभा सकते हैं।
इन डिजिटल व्यवस्थाओं की उपयोगिता तभी बढ़ेगी जब किसानों का पंजीकरण आसान हो, रिकॉर्ड में त्रुटियों को सुधारने की व्यवस्था हो और डिजिटल जानकारी के अभाव में कोई पात्र किसान योजना से वंचित न रह जाए। ग्रामीण स्तर पर सहायता केंद्र और कृषि विभाग के कर्मचारियों का मार्गदर्शन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
किसानों के सामने चुनौतियां अभी बरकरार
दलहन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन इसे हासिल करने के लिए कई चुनौतियों का समाधान करना होगा। पहली चुनौती मौसम की अनिश्चितता है। कई दलहनी फसलें वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में उगाई जाती हैं, जहां सूखा या अत्यधिक बारिश सीधे उपज को प्रभावित कर सकती है।
दूसरी चुनौती किसानों को लाभकारी बाजार उपलब्ध कराने की है। यदि फसल तैयार होने के समय बाजार भाव एमएसपी से नीचे चला जाता है और सरकारी खरीद केंद्र तक पहुंच सीमित रहती है, तो किसानों का उत्साह प्रभावित हो सकता है। तीसरी चुनौती बेहतर बीजों की समय पर उपलब्धता और वैज्ञानिक खेती के तरीकों को व्यापक स्तर पर अपनाने की है।
इसके अलावा, दलहन में कीट एवं रोग प्रबंधन, भंडारण के दौरान नुकसान, दाल मिलों की क्षमता और उपभोक्ताओं के लिए उचित कीमत बनाए रखना भी जरूरी है। उत्पादन में वृद्धि का लाभ तभी टिकाऊ होगा जब किसान, उपभोक्ता, व्यापारी और प्रसंस्करण उद्योग सभी को मूल्य श्रृंखला में उचित अवसर मिलें।
कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और राज्य कृषि विभागों को किसानों के खेतों पर प्रदर्शन, प्रशिक्षण और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप सलाह देने की जरूरत होगी। दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए फसल विविधीकरण, संरक्षण कृषि, मिट्टी की जांच और उपलब्ध नमी के बेहतर उपयोग जैसे उपाय भी उपयोगी हो सकते हैं।
आत्मनिर्भरता से पोषण सुरक्षा तक
दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन का व्यापक महत्व देश की पोषण सुरक्षा से भी जुड़ा है। दालें प्रोटीन, फाइबर और कई आवश्यक पोषक तत्वों का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी के दैनिक भोजन में दालों की अहम भूमिका है, घरेलू उपलब्धता में सुधार का सीधा संबंध खाद्य सुरक्षा और पोषण से है।
दलहनी फसलें कृषि पर्यावरण के लिए भी उपयोगी हैं। इनके पौधे जड़ों में मौजूद राइजोबियम जैसे उपयुक्त जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध के माध्यम से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में उपलब्ध कराने में योगदान देते हैं। इससे फसल चक्र में दलहनों को शामिल करने पर मिट्टी की उर्वरता और अगली फसल की पोषण जरूरतों के प्रबंधन में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका प्रभाव फसल, मिट्टी, नमी और प्रबंधन पद्धति के अनुसार अलग-अलग होता है।
यदि किसान धान या अन्य फसलों के बाद उपयुक्त दलहनी फसलें अपनाते हैं, तो उपलब्ध कृषि भूमि का बेहतर उपयोग हो सकता है। साथ ही, खेती में विविधता आने से एक ही फसल पर निर्भरता का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
आगे की राह: लक्ष्य से परिणाम तक
दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन के पहले वर्ष में सामने आए उत्पादन, खरीद, बीज वितरण और प्रसंस्करण संबंधी आंकड़े इस दिशा में प्रयासों का संकेत देते हैं। फिर भी, मिशन की वास्तविक सफलता का आकलन केवल घोषित लक्ष्यों या आवंटित संसाधनों से नहीं, बल्कि किसानों की आय, उत्पादकता, घरेलू उपलब्धता और आयात में टिकाऊ कमी जैसे परिणामों से किया जाना चाहिए।
इसके लिए नियमित रूप से राज्यवार उत्पादन, प्रति हेक्टेयर उपज, बीज वितरण, सरकारी खरीद, भुगतान की समयबद्धता, प्रसंस्करण इकाइयों के संचालन और किसानों को मिले वास्तविक लाभ की जानकारी सार्वजनिक करना महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, दलहन की खेती करने वाले छोटे और सीमांत किसानों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
भारत ने दलहन उत्पादन में प्रगति दर्ज की है, लेकिन 2030-31 तक 350 लाख टन का लक्ष्य हासिल करने के लिए अनुसंधान, बीज, कृषि विस्तार, खरीद और बाजार को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। यदि किसानों को बेहतर उत्पादन तकनीक के साथ भरोसेमंद बाजार और समय पर भुगतान मिलता है, तो दलहन की खेती अधिक आकर्षक बन सकती है।
सारांश
दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन भारत की कृषि नीति में उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसकी सफलता का वास्तविक पैमाना यह होगा कि किसान अधिक उत्पादकता हासिल करें, उनकी उपज को लाभकारी बाजार मिले, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसंस्करण और रोजगार बढ़े तथा देश को घरेलू मांग पूरी करने के लिए विदेशी बाजारों पर कम निर्भर रहना पड़े। खेत में बोया गया बेहतर बीज, किसान को मिला उचित मूल्य और गांव में तैयार हुई प्रसंस्करण सुविधा—ये तीनों मिलकर भारत की दलहन आत्मनिर्भरता को मजबूत आधार दे सकते हैं।
Source:PIB






























