22 राज्यों के कृषि मंत्री पहली बार एक मंच पर

राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन 2026: कृषि परिवर्तन का राष्ट्रीय रोडमैप तैयार

नई दिल्ली। -देश की कृषि नीति और किसान हितों को नई दिशा देने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) परिसर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन 2026 कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ। 28 और 29 मई को आयोजित इस सम्मेलन में पहली बार देश के 22 राज्यों के कृषि मंत्री एक मंच पर एकत्र हुए और कृषि विकास, प्राकृतिक खेती, दलहन-तिलहन आत्मनिर्भरता, संतुलित उर्वरक उपयोग तथा ‘खेत बचाओ अभियान’ को लेकर साझा संकल्प व्यक्त किया।

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यह सम्मेलन केवल खरीफ सीजन की तैयारियों की समीक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कृषि क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक रणनीति, केंद्र-राज्य समन्वय और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की दिशा तय करने वाला राष्ट्रीय मंच बनकर उभरा।

खरीफ रणनीति से आगे बढ़कर कृषि के भविष्य पर मंथन

सम्मेलन के पहले दिन राज्यों के कृषि एवं बागवानी विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों ने बीज उपलब्धता, उर्वरक प्रबंधन, जल संसाधन, फसल नियोजन और क्षेत्रीय चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। दूसरे दिन कृषि मंत्रियों ने इस विचार-विमर्श को आगे बढ़ाते हुए नीतिगत निर्णयों और क्रियान्वयन के रोडमैप पर गहन मंथन किया।

विशेष बात यह रही कि सम्मेलन में चर्चाएं देर रात तक चलीं और कृषि क्षेत्र से जुड़े कई अहम मुद्दों पर व्यापक सहमति बनी। इसे कृषि प्रशासन में सहभागी शासन और सामूहिक उत्तरदायित्व की नई कार्यशैली के रूप में देखा जा रहा है।

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए मंत्रियों का अनूठा संकल्प

सम्मेलन की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक यह रही कि विभिन्न राज्यों के कृषि मंत्रियों ने प्राकृतिक खेती को केवल नीति स्तर पर समर्थन देने के बजाय अपने निजी खेतों में भी इसे अपनाने का संकल्प लिया। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जनप्रतिनिधि स्वयं प्राकृतिक खेती के मॉडल प्रस्तुत करेंगे तो किसानों में इसका प्रभाव और स्वीकार्यता दोनों बढ़ेंगे।

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर आयोजित विशेष सत्र में गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने भी अपने अनुभव साझा किए और इसे टिकाऊ कृषि का प्रभावी विकल्प बताया।

खेत बचाओ अभियान’ बना सम्मेलन का केंद्रीय संदेश

सम्मेलन से उभरकर सामने आया सबसे महत्वपूर्ण संदेश था—“खेत बचाओ, भविष्य बचाओ”। इस अभियान का उद्देश्य केवल कृषि भूमि का संरक्षण नहीं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, पर्यावरण संतुलन, जल संसाधनों और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की रक्षा करना है।

इस दौरान रासायनिक उर्वरकों के संतुलित एवं वैज्ञानिक उपयोग पर विशेष जोर दिया गया। सम्मेलन में स्पष्ट किया गया कि उर्वरकों के उपयोग को समाप्त करने की नहीं, बल्कि आवश्यकता के अनुरूप विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग सुनिश्चित करने की जरूरत है।

केंद्र, राज्य और वैज्ञानिक संस्थानों की साझा पहल

खेत बचाओ अभियान’ को सफल बनाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों, राज्य सरकारों और वैज्ञानिक समुदाय को एक साझा मंच पर लाने का प्रस्ताव रखा गया। इसके लिए समन्वित निगरानी तंत्र, नियंत्रण कक्ष और नियमित मॉनिटरिंग व्यवस्था विकसित करने पर भी सहमति बनी।

दलहन-तिलहन आत्मनिर्भरता और मिट्टी की सेहत पर विशेष फोकस

सम्मेलन में यह स्पष्ट किया गया कि खरीफ रणनीति अब केवल फसल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी। इसे दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता, मिट्टी की गुणवत्ता सुधार, जल संरक्षण, इनपुट लागत में कमी और किसानों की आय बढ़ाने जैसे व्यापक लक्ष्यों से जोड़ा जाएगा।

विशेषज्ञों ने माना कि कृषि विकास का नया मॉडल उत्पादन वृद्धि और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने पर आधारित होना चाहिए।

बड़ा पद नहीं, बड़ा संकल्प चाहिए’ बना सम्मेलन का संदेश

सम्मेलन के समापन सत्र में कहा गया कि कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का समाधान केवल योजनाओं और घोषणाओं से नहीं, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और प्रभावी क्रियान्वयन से संभव है। इसी संदर्भ में यह संदेश उभरकर सामने आया कि “बड़ा लक्ष्य हासिल करने के लिए बड़ा पद नहीं, बड़ा संकल्प चाहिए।”

दो दिनों तक चले इस व्यापक चिंतन-मंथन के बाद केंद्र और राज्यों ने यह भरोसा जताया कि सम्मेलन में लिए गए निर्णयों को जमीनी स्तर पर लागू कर किसानों तक उसका प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाया जाएगा।

कृषि भारत के लिए नई दिशा

राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन 2026 को कृषि क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। प्राकृतिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग, दलहन-तिलहन आत्मनिर्भरता और ‘खेत बचाओ अभियान’ जैसे विषयों पर बनी सहमति आने वाले वर्षों में कृषि नीति की दिशा तय कर सकती है।

सम्मेलन का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि कृषि को केवल उत्पादन का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरण, पोषण, किसान समृद्धि और राष्ट्र के भविष्य से जुड़े व्यापक मिशन के रूप में देखा जाए। विचार से संकल्प और संकल्प से क्रियान्वयन की ओर बढ़ता यह प्रयास कृषि भारत के नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।