हर साल 40% फसल बर्बाद, पौध स्वास्थ्य पर दुनिया की बढ़ी चिंता!

अंतरराष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य दिवस: जलवायु परिवर्तन के दौर में फसलों को बचाने की नई जंग, ICRISAT ने दिखाई राह

कीट और बीमारियों से हर साल 40% तक फसल नुकसान, छोटे किसानों के सामने बढ़ा संकट

दुनियाभर में बढ़ते तापमान, अनियमित बारिश और बदलते जलवायु पैटर्न ने खेती के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, पौधों में लगने वाले कीट और रोग हर साल वैश्विक खाद्य फसलों का लगभग 40 प्रतिशत तक नुकसान कर देते हैं, जिससे कृषि व्यापार को 220 अरब डॉलर से अधिक की क्षति होती है। ऐसे समय में फसलों की सेहत यानी ‘प्लांट हेल्थ’ कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय बचाने का सबसे बड़ा आधार बनकर उभरा है।

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अंतरराष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर International Crops Research Institute for the Semi-Arid Tropics (ICRISAT) ने एशिया और अफ्रीका के शुष्क क्षेत्रों में फसल सुरक्षा और जलवायु-लचीली खेती के लिए अपने वैज्ञानिक प्रयासों को सामने रखा। संस्थान का कहना है कि वर्ष 2050 तक बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए कृषि उत्पादन में लगभग 60 प्रतिशत वृद्धि करनी होगी, जिसके लिए पौधों की सुरक्षा सबसे अहम होगी।

रोग प्रतिरोधी किस्में बन रहीं किसानों की ढाल

ICRISAT के वैज्ञानिक फसलों को रोगों और कीटों के खिलाफ मजबूत बनाने के लिए लगातार अनुसंधान कर रहे हैं। संस्थान ने चना और अरहर जैसी दलहनी फसलों में फ्यूजेरियम विल्ट, एस्कोकाइटा ब्लाइट और स्टेरिलिटी मोजेक जैसी गंभीर बीमारियों के खिलाफ कई सहनशील किस्में विकसित की हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि रोग प्रतिरोधी किस्मों के उपयोग से रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम होती है और किसानों की उत्पादन लागत भी घटती है। साथ ही बदलते मौसम में भी फसल की उत्पादकता बनी रहती है।

40 देशों के जर्मप्लाज्म की जांच, चने में मिली मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता

ICRISAT ने चना फसल में रोग प्रतिरोधक क्षमता खोजने के लिए दुनिया के सबसे बड़े स्क्रीनिंग अभियानों में से एक चलाया। वैज्ञानिकों ने 40 देशों से प्राप्त 13,500 से अधिक चना जर्मप्लाज्म का परीक्षण किया, जिसमें 160 ऐसी लाइनों की पहचान हुई जो फ्यूजेरियम विल्ट रोग के प्रति प्रतिरोधी पाई गईं।

इसके बाद ICRISAT जीन बैंक और भारत के राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) की 5,084 अतिरिक्त लाइनों का परीक्षण किया गया। इसमें वैज्ञानिकों को फ्यूजेरियम विल्ट, एस्कोकाइटा ब्लाइट, बोट्राइटिस ग्रे मोल्ड और ड्राई रूट रॉट जैसी बीमारियों के खिलाफ कई मजबूत जर्मप्लाज्म मिले। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शोध भविष्य की जलवायु-सहनशील चना किस्मों के विकास में बड़ी भूमिका निभाएगा।

जैविक नियंत्रण और प्राकृतिक समाधान पर जोर

संस्थान केवल नई किस्में विकसित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण अनुकूल फसल सुरक्षा मॉडल पर भी काम कर रहा है। ICRISAT की एंटोमोलॉजी और पैथोलॉजी टीमें दलहनी फसलों में जड़ गलन, विल्ट, फली छेदक कीट, लीफ माइनर और फॉल आर्मीवर्म जैसे खतरनाक कीटों के जैविक नियंत्रण पर अनुसंधान कर रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरण दोनों प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में जैविक नियंत्रण तकनीकें भविष्य की टिकाऊ खेती का आधार बन सकती हैं।

AI और सैटेलाइट से किसानों तक पहुंच रही रियल टाइम सलाह

डिजिटल कृषि अब फसल सुरक्षा का नया हथियार बन रही है। ICRISAT ने SBI Foundation के सहयोग से SMART-CROP पहल शुरू की है, जिसके तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग, सैटेलाइट इमेजिंग और मौसम पूर्वानुमान तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

इस तकनीक से खेतों में फसल तनाव, रोग और कीट हमलों की पहचान पहले ही की जा रही है, ताकि किसान समय रहते एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन (IPDM) उपाय अपना सकें। एक वर्ष में तेलंगाना और कर्नाटक के 4,800 से अधिक चना और अरहर किसानों को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जा चुका है।

अत्याधुनिक रिसर्च सुविधाओं से बढ़ेगी तैयारी

ICRISAT ने हाल ही में हैदराबाद के पाटनचेरू मुख्यालय में अत्याधुनिक ‘ड्राई रूट रॉट फेनोटाइपिंग फैसिलिटी’ शुरू की है। वहीं केन्या के नैरोबी स्थित किबिको केंद्र में फ्यूजेरियम विल्ट स्क्रीनिंग फैसिलिटी स्थापित की गई है।

इन केंद्रों का उद्देश्य यह समझना है कि बदलते जलवायु हालात में कौन-कौन सी नई बीमारियां और कीट उभर सकते हैं और उनसे निपटने के लिए किस प्रकार की किस्में और तकनीक विकसित करनी होंगी।

भारत और अफ्रीका में किसानों को दी जा रही ट्रेनिंग

ICRISAT किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और निजी क्षेत्र के बीच साझेदारी मजबूत करने पर भी काम कर रहा है। इथियोपिया में Ethiopian Institute of Agricultural Research (EIAR) के साथ मिलकर दलहनी फसलों की मिट्टी और पौध स्वास्थ्य पर विशेष कार्यशाला आयोजित की गई।

वहीं भारत में ओडिशा के किसानों को स्वस्थ बीज उत्पादन, बीज उपचार, शुद्धता और बेहतर बुवाई तकनीकों पर प्रशिक्षण दिया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत स्थानीय बीज प्रणाली और किसानों की जागरूकता से रोगों का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।

जलवायु संकट के दौर में ‘प्लांट हेल्थ’ बनेगी खाद्य सुरक्षा की कुंजी

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में सीमापार फैलने वाले कीट और नई बीमारियां खेती के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती हैं। ऐसे में रोग प्रतिरोधी बीज, जैविक नियंत्रण, मौसम आधारित पूर्वानुमान और डिजिटल सलाहकारी सेवाएं खेती को सुरक्षित रखने में निर्णायक भूमिका निभाएंगी।

ICRISAT का मानना है कि विज्ञान, तकनीक और किसानों की भागीदारी को जोड़कर ही एशिया और अफ्रीका के करोड़ों छोटे किसानों की खाद्य और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

Source: ICRISAT