कम उर्वरक में भी भरपूर पैदावार: ज्वार पर ICRISAT का शोध खेती की दिशा बदलने को तैयार!
नई दिल्ली/हैदराबाद: ग्लोबल पर बढ़ती उर्वरक लागत और पर्यावरणीय दबाव के बीच खेती को टिकाऊ बनाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे समय में International Crops Research Institute for the Semi-Arid Tropics (ICRISAT) के वैज्ञानिकों का नया शोध उम्मीद की बड़ी किरण बनकर सामने आया है। ज्वार (सोरघम) पर किए गए इस अध्ययन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि फसलें कम नाइट्रोजन उर्वरक में भी उच्च उत्पादन बनाए रख सकती हैं—बशर्ते उनके आनुवंशिक गुण बेहतर हों।
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शोध का आधार: जीन में छिपा समाधान
यह महत्वपूर्ण अध्ययन Food and Energy Security में प्रकाशित हुआ है, जिसमें वैज्ञानिकों ने ज्वार की 186 विविध किस्मों (accessions) का दो अलग-अलग फसल सीजन में परीक्षण किया। इन किस्मों को तीन नाइट्रोजन स्तरों—0%, 50% और 100%—पर उगाया गया।
परिणामों ने पारंपरिक सोच को चुनौती दी।
50% नाइट्रोजन पर उगाई गई फसलों की पैदावार, 100% नाइट्रोजन पर उगाई गई फसलों के लगभग बराबर रही।
यह निष्कर्ष बताता है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल उर्वरक बढ़ाना ही समाधान नहीं है।
नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) क्यों है अहम?
कृषि में नाइट्रोजन उर्वरक सबसे महंगे इनपुट्स में शामिल हैं। लेकिन मौजूदा स्थिति यह है कि पौधे केवल 30–40% नाइट्रोजन ही उपयोग कर पाते हैं।
बाकी नाइट्रोजन:
- मिट्टी में रिसकर उसकी गुणवत्ता खराब करता है
- जल स्रोतों को प्रदूषित करता है
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को बढ़ाता है
इसीलिए नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (Nitrogen Use Efficiency – NUE) को बढ़ाना आज की खेती की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है।
जीनोमिक शोध से मिली नई दिशा
ICRISAT के वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में उन्नत तकनीकों का उपयोग किया।
- Genome-Wide Association Study (GWAS) के जरिए जीनोमिक स्तर पर विश्लेषण
- RNA Sequencing के माध्यम से जीन की सक्रियता का अध्ययन
इन दोनों तकनीकों को जोड़कर वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि पौधे नाइट्रोजन को कैसे अवशोषित, परिवहन और उपयोग करते हैं।
शोध में: 1,369 जीनोमिक क्षेत्रों की पहचान की गई, 10 प्रमुख जीन सामने आए, जो NUE को नियंत्रित करते हैं
ये जीन भविष्य में ऐसी किस्मों के विकास का आधार बन सकते हैं जो कम उर्वरक में भी बेहतर प्रदर्शन करें।
वैज्ञानिकों की राय: ‘स्मार्ट फसलें ही भविष्य’
ICRISAT के महानिदेशक Himanshu Pathak ने कहा,
“अब समय आ गया है कि कृषि कम संसाधनों में अधिक उत्पादन करे। यह शोध दिखाता है कि समाधान केवल इनपुट बढ़ाने में नहीं, बल्कि फसलों को अधिक सक्षम बनाने में है।”
वहीं, शोध एवं नवाचार के उपमहानिदेशक Stanford Blade के अनुसार,
“इस अध्ययन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि हमने सीधे उन जीनों की पहचान की है जो अलग-अलग नाइट्रोजन परिस्थितियों में फसल के प्रदर्शन को नियंत्रित करते हैं।”
किसानों और पर्यावरण के लिए फायदे
यह शोध केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि खेत स्तर पर बड़ा बदलाव ला सकता है:
1. लागत में कमी:
कम उर्वरक उपयोग से किसानों का खर्च घटेगा
2. उपज बरकरार:
आधे नाइट्रोजन में भी समान पैदावार संभव
3. पर्यावरण संरक्षण:
कम नाइट्रोजन लीचिंग, कम जल प्रदूषण और कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन
4. टिकाऊ खेती को बढ़ावा:
कम इनपुट आधारित कृषि प्रणाली को मजबूती
अन्य फसलों में भी संभावनाएं
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज केवल ज्वार तक सीमित नहीं है।
इसी सिद्धांत को: धान, गेहूं, मक्का,
जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसलों में भी लागू किया जा सकता है, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा को मजबूती मिल सकती है।
ग्लोबल सहयोग से मिली ताकत
यह शोध Cambridge-India Network for Translational Research in Nitrogen (CINTRIN) के तहत किया गया, जिसमें कई अंतरराष्ट्रीय और भारतीय संस्थानों ने भागीदारी की।
इसमें University of Cambridge, Punjab Agricultural University और National Institute of Plant Genome Research जैसे प्रमुख संस्थान शामिल रहे।
खेती का नया मॉडल
बढ़ती लागत, घटते संसाधन और पर्यावरणीय संकट के दौर में यह शोध खेती के लिए नई दिशा तय करता है।
“कम उर्वरक, अधिक दक्षता और स्मार्ट किस्में”—यही भविष्य की टिकाऊ कृषि का रास्ता बन सकता है।
स्रोत और चित्र: ICRISAT
