पोल्ट्री और इंटीग्रेटेड फार्मिंग से बदल रही किस्मत: आफताब आलम ने वकालत छोड़कर खड़ा किया सफल मॉडल
छोटे स्तर से शुरू कर बनाया बड़ा कारोबार, देसी मुर्गी, लेयर फार्मिंग और बकरी पालन से कमा रहे तिगुना मुनाफा
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
मुजफ्फरपुर -कृषि टाइम्स –आधुनिक दौर में खेती और उससे जुड़े व्यवसाय तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। इसी बदलाव की एक प्रेरणादायक मिसाल पेश कर रहे हैं आफताब आलम, जिन्होंने पारंपरिक पेशे वकालत को छोड़कर पोल्ट्री और इंटीग्रेटेड फार्मिंग के जरिए सफलता की नई कहानी लिखी है। कृषि टाइम्स से खास बातचीत में आफताब आलम ने अपने अनुभव, चुनौतियों और सफलता के मंत्र साझा किए।
वकालत से पोल्ट्री फार्मिंग तक का सफर
आफताब आलम बताते हैं कि वे पहले टैक्सेशन से जुड़ा काम करते थे। लेकिन समय के साथ छोटे व्यापारियों का काम कम होने लगा और बड़े व्यापारी डिजिटल सिस्टम पर शिफ्ट हो गए, जिससे उनके पेशे पर असर पड़ा। उन्होंने बताया,
“जब काम लगातार कम होने लगा तो लगा कि अब कुछ नया करना चाहिए। उसी समय पोल्ट्री फार्मिंग का विचार आया, क्योंकि मुझे पहले से ही पक्षियों का शौक था और एक्सोटिक बर्ड्स में रुचि थी।”
यही सोच उन्हें पोल्ट्री व्यवसाय की ओर ले आई, जहां उन्होंने शुरुआत छोटे स्तर से की और धीरे-धीरे इसे बड़े व्यवसाय में बदल दिया।
लेयर और देसी मुर्गी पालन का सफल मॉडल
वर्तमान में आफताब आलम के फार्म पर लेयर और देसी दोनों प्रकार की मुर्गियों का पालन किया जा रहा है। देसी मुर्गी पालन का काम वे पिछले डेढ़ साल से कर रहे हैं। उनके फार्म में ब्लैक ऑस्ट्रालॉर्प और सोनाली नस्ल की मुर्गियाँ प्रमुख रूप से पाली जा रही हैं।
वे बताते हैं,
“ब्लैक ऑस्ट्रालॉर्प नस्ल अंडा उत्पादन के लिए बहुत अच्छी है, जबकि सोनाली नस्ल अंडा और मांस दोनों के लिए उपयोगी साबित होती है।”
फार्म में रोजाना शाम के समय अंडों का कलेक्शन किया जाता है और उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। लगभग 120 दिनों के बाद मुर्गियाँ अंडा देना शुरू कर देती हैं और 160 दिनों तक पहुंचते-पहुंचते उत्पादन पूरी क्षमता पर आ जाता है।
तिगुना रिटर्न दे चुका है व्यवसाय
आफताब आलम के अनुसार, यह व्यवसाय अब तक उनके निवेश का लगभग तीन गुना रिटर्न दे चुका है। खासकर देसी पोल्ट्री में उन्हें अच्छा मुनाफा हुआ है। वे कहते हैं,
“अगर सही तरीके से मैनेजमेंट किया जाए और बायो-सिक्योरिटी का ध्यान रखा जाए, तो पोल्ट्री फार्मिंग में नुकसान की संभावना बहुत कम होती है।”
बाजार की नहीं होती समस्या
मार्केटिंग को लेकर वे बताते हैं कि एक बार बाजार से जुड़ने के बाद ज्यादा परेशानी नहीं होती। लेयर अंडों के लिए पहले से ही स्थापित बाजार मौजूद है।
“खरीदारों के साथ सीधा संपर्क बन जाता है और रेट के अनुसार भुगतान भी आसानी से मिल जाता है,” उन्होंने कहा।
हालांकि, नए लोगों को शुरुआत में बाजार ढूंढने में थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
छोटे स्तर से शुरुआत की सलाह
किसानों को सलाह देते हुए आफताब कहते हैं कि इस व्यवसाय में शुरुआत हमेशा छोटे स्तर से करनी चाहिए।
“अगर कोई किसान 200 देसी मुर्गियों से भी शुरुआत करता है, तो उसे रोजाना करीब 120 अंडे मिल सकते हैं। स्थानीय बाजार में देसी अंडों की अच्छी कीमत मिलती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि निवेश करते समय पूरी पूंजी न लगाएं, बल्कि 50% पूंजी सुरक्षित रखें ताकि भविष्य में विस्तार के लिए उपयोग किया जा सके।
आधुनिक लेयर फार्मिंग से बढ़ी उत्पादन क्षमता
आफताब आलम के फार्म में इस समय लगभग 6000 लेयर मुर्गियाँ हैं, जिनका उत्पादन 96 से 98 प्रतिशत तक है। यहां हाईलाइन नस्ल की मुर्गियाँ पाली जा रही हैं, जो जल्दी अंडा देना शुरू करती हैं और बीमारियों के प्रति अधिक सहनशील होती हैं।
उन्होंने बताया कि इन मुर्गियों को पहले 60 से 65 दिनों तक जमीन पर रखा जाता है, उसके बाद केज सिस्टम में शिफ्ट किया जाता है। सही टीकाकरण और देखभाल के चलते उत्पादन लगातार बेहतर बना रहता है।
अंडे के आकार से तय होती है कीमत
अंडों की कीमत उनके आकार और वजन पर निर्भर करती है। आफताब बताते हैं,
“16 प्लस साइज के अंडों को पूरा रेट मिलता है, जिसका मतलब है कि एक ट्रे का वजन 1.6 किलोग्राम से ज्यादा होना चाहिए। इससे छोटे अंडों की कीमत थोड़ी कम हो जाती है।”
इंटीग्रेटेड फार्मिंग की ओर बढ़ते कदम
पोल्ट्री के साथ-साथ आफताब आलम ने अपने फार्म में इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल भी विकसित किया है। इसके तहत बकरी पालन और बतख पालन को भी जोड़ा गया है।
फार्म में एक तालाब है, जहां बतख पालन किया जा रहा है, जिससे अतिरिक्त आय का स्रोत बन रहा है। वहीं, बकरी पालन के तहत वर्तमान में करीब 20 बकरियाँ हैं, जिनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।
वे बताते हैं,
“इंटीग्रेटेड फार्मिंग से जोखिम कम होता है और आय के कई स्रोत बनते हैं, जिससे कुल मिलाकर बेहतर लाभ मिलता है।”
भविष्य की योजनाएं
आफताब आलम अपने फार्म का लगातार विस्तार कर रहे हैं। वर्तमान में 7000 मुर्गियों की क्षमता वाला नया शेड तैयार किया जा रहा है। इसके पूरा होने के बाद उत्पादन और आय दोनों में वृद्धि होने की उम्मीद है।
सफलता का मूल मंत्र
अंत में आफताब आलम कहते हैं कि इस व्यवसाय में सफलता का सबसे बड़ा मंत्र है—धैर्य, सही योजना और लगातार सीखते रहना।
“पोल्ट्री फार्मिंग एक लाभदायक व्यवसाय है, लेकिन इसमें मेहनत और अनुशासन बहुत जरूरी है। अगर किसान सही तरीके से काम करें तो यह उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बना सकता है।”
सारांश
आफताब आलम की कहानी उन युवाओं और किसानों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद कुछ नया करने की सोच रखते हैं। पोल्ट्री और इंटीग्रेटेड फार्मिंग के जरिए उन्होंने न सिर्फ खुद को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि दूसरों के लिए भी एक सफल मॉडल पेश किया है।

आधुनिक लेयर फार्मिंग से बढ़ी उत्पादन क्षमता