पोषण से औषधि तक: मशरूम के स्वास्थ्य लाभ और वैज्ञानिक महत्व
समस्तीपुर – मशरूम आज केवल एक सब्जी भर नहीं रह गया है, बल्कि यह पोषण, औषधि, कृषि और पर्यावरण—चारों क्षेत्रों में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा के पोस्ट ग्रेजुएट विभाग, प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह ने मशरूम को “भविष्य का सुपरफूड और औषधीय खजाना” बताया है। उनके अनुसार, वैज्ञानिक दृष्टि से मशरूम प्रकृति का एक अनोखा और बहुआयामी उपहार है, जो मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ किसानों की आय और पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा सकता है।
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मशरूम क्या है?
प्रो. सिंह ने बताया कि जैविक रूप से मशरूम एक फफूंद (Fungus) है, जो किंगडम फंगी से संबंधित है। यह न तो पौधा है और न ही जानवर, बल्कि एक स्वतंत्र जैविक समूह का प्रतिनिधित्व करता है। मशरूम में न पत्तियाँ होती हैं, न जड़ें और न ही बीज, इसके बावजूद यह प्रकृति में पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण का महत्वपूर्ण कार्य करता है। यही कारण है कि आधुनिक विज्ञान में मशरूम को फंक्शनल फूड और सुपरफूड की श्रेणी में रखा गया है।
संरचना में छिपा है विज्ञान
मशरूम की संरचना सरल दिखाई देती है, लेकिन जैविक रूप से यह अत्यंत विकसित होती है। इसका ऊपरी भाग कैप कहलाता है, जो आकार और रंग में भिन्न-भिन्न हो सकता है। कैप के नीचे मौजूद गिल्स पर बीजाणु बनते हैं, जिनसे मशरूम का प्रजनन होता है। स्टेम मशरूम को सहारा देता है, जबकि माइसेलियम इसका वास्तविक जीवन-आधार होता है, जो मिट्टी या जैविक पदार्थों में फैलकर पोषण अवशोषित करता है। वैज्ञानिक माइसेलियम को “भूमिगत जैविक नेटवर्क” भी कहते हैं।
खाने योग्य, औषधीय और विषैले मशरूम
उपयोग के आधार पर मशरूम को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है।
पहले वर्ग में खाने योग्य मशरूम आते हैं, जैसे बटन, ऑयस्टर, शिटाके और मिल्की मशरूम। ये प्रोटीन, आवश्यक अमीनो एसिड, विटामिन-B समूह, विटामिन-D, पोटैशियम और फाइबर से भरपूर होते हैं।
दूसरे वर्ग में औषधीय मशरूम शामिल हैं, जैसे रीशी, कोर्डिसेप्स और टर्की टेल। इनका उपयोग इम्यूनिटी बढ़ाने, ऊर्जा सुधारने और कैंसर जैसे रोगों के सहायक उपचार में किया जाता है।
तीसरे वर्ग में विषैले मशरूम आते हैं, जैसे डेथ कैप और डिस्ट्रॉयिंग एंजेल, जिनका सेवन अत्यंत खतरनाक हो सकता है। विशेषज्ञ का स्पष्ट सुझाव है कि जंगली मशरूम बिना वैज्ञानिक पहचान के कभी नहीं खाने चाहिए।
पोषण और स्वास्थ्य के लिए वरदान
प्रो. सिंह के अनुसार, मशरूम उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, आहार फाइबर और एंटीऑक्सिडेंट्स का समृद्ध स्रोत है। यह विटामिन-D का एकमात्र प्राकृतिक शाकाहारी स्रोत भी माना जाता है। कम कैलोरी और कम वसा होने के कारण यह मोटापा, मधुमेह और हृदय रोगियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। हालिया शोधों में इसके कैंसर-रोधी, कोलेस्ट्रॉल कम करने वाले और इम्यून मॉड्यूलेटरी गुण भी सामने आए हैं।
कृषि और पर्यावरण में बढ़ता महत्व
मशरूम उत्पादन कृषि अपशिष्ट जैसे भूसा और फसल अवशेषों का उपयोग कर किया जाता है, जिससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। उत्पादन के बाद बचा हुआ सब्सट्रेट उत्तम जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। कम भूमि, कम पानी और कम समय में अधिक आय देने वाली यह गतिविधि किसानों के लिए एक सशक्त विकल्प बनती जा रही है।
भविष्य की संभावनाएं
भोजन उद्योग में मशरूम से बने सूप, सलाद, पाउडर और रेडी-टू-ईट उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। वहीं औषधि और न्यूट्रास्यूटिकल्स क्षेत्र में इसके कैप्सूल और एक्सट्रैक्ट्स का उपयोग तेजी से हो रहा है। कृषि और जैव प्रौद्योगिकी में भी मशरूम बायोफर्टिलाइज़र और बायोरिमेडिएशन के रूप में उपयोगी सिद्ध हो रहा है।
सारांश
सही वैज्ञानिक ज्ञान, तकनीकी प्रशिक्षण और जागरूकता के साथ मशरूम भविष्य की पोषण सुरक्षा, किसानों की आय वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण—तीनों के लिए एक मजबूत आधार बन सकता है। मशरूम वास्तव में ऐसा प्राकृतिक संसाधन है, जो पोषण से लेकर औषधि तक मानव जीवन को नई दिशा देने की क्षमता रखता है।
प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह विभागाध्यक्ष, पादप रोग विज्ञान एवं नेमेटोलॉजी अधिकारी-प्रभारी, केला अनुसंधान केन्द्र, गोरौल डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा संपर्क: sksraupusa@gmail.com