ग्रीन यूरिया मिशन: भारत में लगेंगे ग्रीन यूरिया प्लांट, खुलेंगे नए अवसर!

ग्रीन अमोनिया से ग्रीन यूरिया तक, बदलने जा रही है उर्वरक उद्योग की तस्वीर  नोएडा में हुई उच्चस्तरीय बैठक, कृषि और ऊर्जा क्षेत्र में खुल सकते हैं नए अवसर!

नई दिल्ली। भारत ने कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। उर्वरक विभाग ने देश में ग्रीन यूरिया उत्पादन की संभावनाओं को मूर्त रूप देने के लिए परियोजना विकास एवं प्रबंधन सलाहकार संस्था पीडीआईएल (PDIL) के माध्यम से एक उच्चस्तरीय ‘प्री-एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (Pre-EOI) बैठक का आयोजन किया। इस पहल का उद्देश्य ग्रीन हाइड्रोजन और कार्बन कैप्चर तकनीक के जरिए ऐसे यूरिया का उत्पादन करना है, जिससे उर्वरक क्षेत्र का कार्बन उत्सर्जन कम हो सके।

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बैठक की अध्यक्षता उर्वरक विभाग के संयुक्त सचिव डॉ. के.के. पाठक ने की। इसमें ऊर्जा, उर्वरक, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रोलाइज़र और ग्रीन अमोनिया क्षेत्र से जुड़ी सार्वजनिक एवं निजी कंपनियों ने भाग लिया। एनटीपीसी, भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI), प्रमुख उर्वरक निर्माता और वैश्विक तकनीकी आपूर्तिकर्ताओं की मौजूदगी ने इस परियोजना को लेकर उद्योग जगत की गंभीरता को स्पष्ट किया।

ग्रीन यूरिया क्यों है महत्वपूर्ण?

भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया उपभोक्ता देशों में शामिल है। इसके बावजूद देश को हर वर्ष लगभग एक करोड़ मीट्रिक टन यूरिया आयात करना पड़ता है। वर्तमान में अधिकांश यूरिया उत्पादन प्राकृतिक गैस आधारित ‘ग्रे अमोनिया’ पर निर्भर है, जिससे बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है। ग्रीन यूरिया इस चुनौती का समाधान प्रस्तुत करता है, क्योंकि इसमें ग्रीन हाइड्रोजन और कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग किया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीन यूरिया उत्पादन बढ़ने से न केवल आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि भारत के वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य को हासिल करने में भी मदद मिलेगी।

कई मंत्रालय मिलकर देंगे परियोजना को गति

बैठक में स्पष्ट किया गया कि ग्रीन यूरिया परियोजनाओं को सफल बनाने के लिए ‘होल ऑफ गवर्नमेंट’ दृष्टिकोण अपनाया जाएगा।

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने ग्रीन ऊर्जा अवसंरचना के विस्तार के लिए 19,744 करोड़ रुपये के निवेश का प्रावधान किया है। वहीं उर्वरक विभाग को ग्रीन अमोनिया को देश की उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल करने और आवश्यक नीतिगत ढांचा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

महंगी लागत से निपटने के लिए विशेष मूल्य व्यवस्था

ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी ऊंची उत्पादन लागत है। इस समस्या को दूर करने के लिए सरकार ने ‘डिफरेंशियल प्राइसिंग मैकेनिज्म’ पर चर्चा की।

इसके तहत भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) ग्रीन अमोनिया उत्पादकों से खरीद कर उसे घरेलू उर्वरक कंपनियों को बाजार आधारित कीमतों पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था विकसित कर रहा है। इसी प्रकार की व्यवस्था भविष्य में ग्रीन यूरिया के लिए भी लागू की जा सकती है, जिससे उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों को स्थिरता मिलेगी।

निवेशकों के लिए 10 वर्षों तक प्रोत्साहन का प्रस्ताव

निजी निवेश आकर्षित करने के लिए राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत ग्रीन अमोनिया उत्पादन पर विशेष वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाएंगे। सरकार का लक्ष्य प्रतिस्पर्धी ई-नीलामी के माध्यम से 7.24 लाख मीट्रिक टन प्रतिवर्ष ग्रीन अमोनिया की खरीद सुनिश्चित करना है।

परियोजनाओं को विकास चरण से लेकर वाणिज्यिक संचालन तक सहायता मिलेगी। साथ ही 10 वर्षों की अवधि वाले दीर्घकालिक खरीद समझौते निवेशकों को बाजार की अनिश्चितताओं से सुरक्षा प्रदान करेंगे।

पुदिमाडाका पायलट परियोजना बनी मॉडल

बैठक में आंध्र प्रदेश के पुदिमाडाका में विकसित 150 टन प्रतिदिन क्षमता वाले ग्रीन यूरिया पायलट प्लांट को मॉडल परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया गया। एनटीपीसी की अनुसंधान इकाई नेट्रा (NETRA) द्वारा विकसित यह संयंत्र जल इलेक्ट्रोलिसिस, कार्बन कैप्चर एवं उपयोग (CCUS) और ग्रीन अमोनिया तकनीक का सफल एकीकरण दर्शाता है।

यह परियोजना फ्लाई ऐश आधारित उत्पादों, सिंथेटिक ईंधन और औद्योगिक उपयोग के लिए कार्बन डाइऑक्साइड के पुनः उपयोग की संभावनाओं को भी मजबूत करती है।

भारत बन सकता है कैप्चर की गई CO₂ का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता

विशेषज्ञों के अनुसार 12.7 लाख मीट्रिक टन वार्षिक क्षमता वाले एक बड़े यूरिया संयंत्र को लगभग 10 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड की आवश्यकता होती है। यदि थर्मल पावर, सीमेंट और इस्पात संयंत्रों से निकलने वाली CO₂ को कैप्चर कर यूरिया निर्माण में इस्तेमाल किया जाए, तो उर्वरक उद्योग देश में कार्बन कैप्चर तकनीक का सबसे बड़ा उपभोक्ता बन सकता है।

इससे एक ओर औद्योगिक उत्सर्जन में कमी आएगी, वहीं दूसरी ओर उर्वरक उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की उपलब्धता भी सुनिश्चित होगी।

किसानों और देश को क्या होगा फायदा?

ग्रीन यूरिया परियोजनाओं के सफल होने पर भारत को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है—

  • यूरिया आयात पर निर्भरता में कमी, उर्वरक क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में गिरावट, किसानों को दीर्घकालिक रूप से स्थिर आपूर्ति, ग्रीन हाइड्रोजन उद्योग को नया बाजार, ऊर्जा एवं उर्वरक सुरक्षा को मजबूती, नेट-जीरो और जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता

आगे की राह

सरकार की यह पहल केवल एक नई उर्वरक परियोजना नहीं, बल्कि कृषि, ऊर्जा और पर्यावरण को जोड़ने वाला एक दीर्घकालिक रणनीतिक कार्यक्रम है। यदि ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर और उर्वरक उत्पादन का यह मॉडल सफल होता है, तो भारत वैश्विक स्तर पर हरित उर्वरक निर्माण का अग्रणी केंद्र बन सकता है। आने वाले वर्षों में यह पहल किसानों की खाद सुरक्षा के साथ-साथ देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और जलवायु प्रतिबद्धताओं को भी नई मजबूती दे सकती है।