किसानों की आमदनी 50 हजार से बढ़कर 5 लाख!
भारत का बिहार राज्य अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक संपदा के लिए विख्यात है। इन्हीं अमूल्य उपहारों में से एक है मखाना, जिसे ई-लिली के बीज के रूप में भी जाना जाता है। परंपरा और स्वास्थ्य दोनों से जुड़े इस अनोखे उत्पाद को आज पूरी दुनिया “बिहार का सफेद सोना” कहकर पहचान रही है।
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वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार ने कृषि टाइम्स से बातचीत में मखाने के सफर को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि उत्तरी बिहार के मिथिला क्षेत्र की यह पारंपरिक फसल, जो कभी केवल धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित थी, अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुपरफूड के रूप में पहचान बना चुकी है।
परंपरा से व्यावसायिकता तक का सफर
मखाना सदियों से मैथिली संस्कृति और धार्मिक आयोजनों का हिस्सा रहा है। कोजागरण पूजा और शरद पूर्णिमा पर इसे प्रसाद के रूप में उपयोग किया जाता था। लेकिन बीते पांच वर्षों में मखाना अपनी पोषण क्षमता, स्वास्थ्यवर्धक और औषधीय गुणों की वजह से धार्मिकता से आगे बढ़कर व्यावसायिक फसल के रूप में उभरा है।
ग्लोबल मांग और सीमित आपूर्ति
डॉ. कुमार ने बताया कि जैसे-जैसे मखाने की वैश्विक मांग बढ़ी, वैसे-वैसे उत्तर बिहार के किसानों के लिए अवसर भी बढ़े। वर्तमान में पूरी दुनिया के 90% मखाने का उत्पादन भारत में होता है और इसमें से लगभग 85-90% उत्पादन उत्तर बिहार से आता है। दरभंगा और मधुबनी को “मखाना की वैश्विक राजधानी” कहा जाता है।
अनुसंधान और आधुनिक खेती का विस्तार
परंपरागत रूप से मखाने की खेती तालाबों में होती थी, जहां प्रति हेक्टेयर उत्पादन केवल 14–16 क्विंटल तक सीमित था। लेकिन राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र द्वारा विकसित “स्वर्ण वैदेही” वैरायटी ने खेती का स्वरूप बदल दिया।
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उत्पादन क्षमता: 30 क्विंटल/हेक्टेयर
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खेत पद्धति अपनाने से उत्पादकता: 22–25 क्विंटल/हेक्टेयर
इसी बदलाव ने खेती के क्षेत्र को 13–15 हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर आज 40 हजार हेक्टेयर तक पहुँचा दिया है।
मुनाफे में 10 गुना वृद्धि
डॉ. कुमार के अनुसार, पहले एक हेक्टेयर मखाना खेती से लगभग ₹50,000 का शुद्ध मुनाफा होता था। अब वही आमदनी बढ़कर ₹5 लाख तक पहुंच चुकी है।
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यदि किसी किसान को औसतन 20 क्विंटल उत्पादन मिलता है और बाजार भाव ₹35,000 प्रति क्विंटल है, तो लगभग ₹7 लाख की आय होती है। लागत घटाने के बाद भी किसान को ₹4–5 लाख का शुद्ध लाभ मिलता है।
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यह आमदनी पारंपरिक धान या अन्य फसलों की तुलना में कम से कम 10 गुना अधिक है।
सामाजिक बदलाव और विस्तार
पहले मखाने की खेती और प्रसंस्करण मुख्य रूप से सहनी समाज तक सीमित था। लेकिन मशीनों और प्रशिक्षण की मदद से अब यह खेती कोसी, सीमांचल और बिहार से बाहर असम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा तक फैल चुकी है।
शिक्षित बेरोजगार युवा भी अब मखाना खेती को सरकारी नौकरी के विकल्प के रूप में अपना रहे हैं।
डॉ. मनोज कुमार का मानना है कि मखाने की बढ़ती वैश्विक मांग, अनुसंधान आधारित उत्पादन और सरकारी सहयोग से यह फसल किसानों की आर्थिक रीढ़ बन चुकी है और आने वाले वर्षों में मिथिला क्षेत्र को विश्व मखाना हब बनाने की क्षमता रखती है।
डॉ. मनोज कुमार
(वरिष्ठ वैज्ञानिक)
आईसीएआर – राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र (NRC Makhana), दरभंगा, बिहार