बांस बना ग्रामीण समृद्धि का नया आधार, महिलाओं और किसानों के लिए खुल रहे रोजगार के हजारों अवसर!
नई दिल्ली/गुरुग्राम। कभी पारंपरिक शिल्प और ग्रामीण जीवन का हिस्सा माना जाने वाला बांस आज देश में रोजगार, उद्यमिता और सतत विकास का मजबूत माध्यम बनकर उभर रहा है। सरकारी नीतियों, तकनीकी नवाचार, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और बाजार तक बढ़ती पहुंच ने बांस को केवल एक वन उत्पाद नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई ताकत बना दिया है। इसका जीवंत उदाहरण हाल ही में गुरुग्राम में आयोजित सरस आजीविका मेले में देखने को मिला, जहां देशभर से आए ग्रामीण उद्यमियों ने अपनी सफलता की कहानियां साझा कीं।
असम की विशाखा दीदी की सफलता बनी प्रेरणा
मेले में प्रदर्शित एक साधारण दिखने वाला बांस का थैला लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहा। यह केवल एक उत्पाद नहीं बल्कि ग्रामीण महिला उद्यमिता की प्रेरक कहानी का प्रतीक था। असम की विशाखा दीदी ने वर्ष 2014 में स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपने ससुर के पारंपरिक बांस शिल्प व्यवसाय को आधुनिक डिजाइन और नए बाजारों से जोड़ा।
सरकारी सहायता, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और विभिन्न प्रदर्शनियों में भागीदारी ने उनके व्यवसाय को नई पहचान दिलाई। वर्ष 2025 में उन्होंने भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले (IITF) में अपने उत्पाद प्रदर्शित किए, जहां बांस उत्पादों की बिक्री से उन्हें लगभग 2 लाख रुपये की आय हुई। उनकी सफलता यह दर्शाती है कि सही अवसर और बाजार मिलने पर पारंपरिक हस्तशिल्प भी बड़े उद्यम का रूप ले सकता है।
2017 का फैसला बना बांस क्षेत्र के लिए गेम चेंजर
भारत में बांस सदियों से ग्रामीण और जनजातीय समुदायों की आजीविका का आधार रहा है। लेकिन लंबे समय तक एक बड़ा कानूनी अवरोध इसके विकास में बाधा बना रहा। ब्रिटिश कालीन कानून के तहत बांस को “पेड़” की श्रेणी में रखा गया था, जिससे इसकी कटाई और परिवहन पर कई प्रकार की अनुमति और प्रतिबंध लागू होते थे।
वर्ष 2017 में केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए बांस को पेड़ों की श्रेणी से बाहर कर दिया। इस बदलाव के बाद गैर-वन क्षेत्रों में उगाए गए बांस की कटाई और परिवहन आसान हो गया। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले ने बांस आधारित उद्योग, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और उद्यमिता के लिए नए रास्ते खोले हैं।
आज इसका प्रभाव विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों में दिखाई दे रहा है, जहां बांस रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनता जा रहा है।
सिक्किम से नागालैंड तक बांस आधारित उद्योगों का विस्तार
सिक्किम में गंगटोक के निकट फैशन डिजाइनर चिमी ओंगमु भूटिया का महिला संचालित उद्यम “लगस्टल डिजाइन स्टूडियो” बांस को आधुनिक जीवनशैली उत्पादों में बदल रहा है। यहां बांस से हस्तशिल्प, अगरबत्ती, फर्नीचर और गृह सज्जा की वस्तुएं तैयार की जाती हैं।
- त्रिपुरा में बिजय सूत्रधार ने तकनीक की मदद से बांस उत्पाद निर्माण को आधुनिक स्वरूप दिया।
- नगालैंड में स्वयं सहायता समूह बांस आधारित खाद्य उत्पाद तैयार कर रहे हैं।
- खोरोलो क्रिएटिव क्राफ्ट्स जैसे स्थानीय उद्यम फर्नीचर और सजावटी वस्तुओं का उत्पादन कर रहे हैं।
- मिजोरम के मामित जिले में बांस के ऊतक संवर्धन (टिश्यू कल्चर) और पॉलीहाउस तकनीकों के माध्यम से वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
ये पहलें बताती हैं कि बांस क्षेत्र अब केवल हस्तशिल्प तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह नवाचार और मूल्यवर्धन का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है।
राष्ट्रीय बांस मिशन से किसानों को मिल रहा सहारा
बांस क्षेत्र के विकास में राष्ट्रीय बांस मिशन (NBM) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह मिशन किसानों, उद्यमियों और कारीगरों को पौध सामग्री, प्रसंस्करण सुविधाएं, प्रशिक्षण और बाजार संपर्क उपलब्ध कराने पर काम कर रहा है।
मध्य प्रदेश के किसान विजय पाटीदार इसकी सफलता का उदाहरण हैं। पारंपरिक खेती में लगातार नुकसान उठाने के बाद उन्होंने 2019 में बांस की खेती शुरू की। मिशन के सहयोग से उन्होंने लगभग 4,000 बांस पौधे लगाए।
दो वर्षों के भीतर उन्होंने बांस की बल्लियों की बिक्री से करीब 75 हजार रुपये कमाए। साथ ही बांस के बीच मिर्च, शिमला मिर्च, अदरक और लहसुन जैसी अंतरवर्ती फसलें भी उगाईं। इससे उनकी आय के स्रोत बढ़े और खेती अधिक लाभकारी बनी।
प्रौद्योगिकी से बढ़ा मूल्य संवर्धन
नॉर्थ ईस्ट सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन एंड रीच (NECTAR) बांस आधारित तकनीकों को बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। संस्था खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण सामग्री, मशीनरी, नवीकरणीय ऊर्जा और औद्योगिक उत्पादों के क्षेत्र में बांस के उपयोग को बढ़ावा दे रही है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन प्रयासों से प्रतिवर्ष लगभग 3 करोड़ मानव-दिवस रोजगार सृजित हो रहे हैं। वहीं बांस उत्पादों में मूल्य संवर्धन का स्तर 10 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 70 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
इंजीनियर्ड बांस बदल रहा निर्माण क्षेत्र की तस्वीर
निर्माण क्षेत्र में भी बांस की उपयोगिता तेजी से बढ़ रही है। इंजीनियर्ड बांस नामक आधुनिक निर्माण सामग्री कच्चे बांस के रेशों और पट्टियों को संपीड़ित कर तैयार की जाती है।
इस तकनीक के माध्यम से:
- देश में 42 लाख वर्ग फुट से अधिक इंजीनियर्ड बांस संरचनाओं का निर्माण किया जा चुका है।
- छत्तीसगढ़ में लगभग 20 हजार बच्चों के लिए 576 स्कूल कक्ष बांस आधारित तकनीक से बनाए गए हैं।
- आपदा राहत और पुनर्वास परियोजनाओं में भी इसका व्यापक उपयोग हो रहा है।
वास्तुकारों और इंटीरियर डिजाइनरों के बीच भी बांस आधारित फर्नीचर और संरचनाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है।
महिला सशक्तिकरण का माध्यम बना बांस उद्योग
महाराष्ट्र के गढ़चिरोली अगरबत्ती परियोजना (GAP) ने यह साबित किया है कि बांस आधारित उद्योग महिलाओं की आर्थिक स्थिति बदल सकते हैं।
वर्ष 2012 में शुरू हुई इस पहल के अंतर्गत 2020 तक:
- जिले में 32 उत्पादन केंद्र स्थापित किए गए।
- लगभग 1,100 लोगों को रोजगार मिला।
- इनमें करीब 90 प्रतिशत महिलाएं थीं।
- महिलाओं की औसत मासिक आय लगभग 5,000 रुपये तक पहुंची।
- रोजगार के अवसर 45-60 दिनों से बढ़कर 225 दिनों से अधिक हो गए।
इससे महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता, कौशल विकास और नेतृत्व के नए अवसर प्राप्त हुए।
प्रशिक्षण और कौशल विकास पर विशेष जोर
बांस क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए कौशल विकास कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। जून 2026 में सीएसआईआर-राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-नीरी), नागपुर ने महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया।
इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों को बांस की कटाई, उपचार, प्रसंस्करण, हस्तशिल्प निर्माण, उत्पाद डिजाइन, ब्रांडिंग, विपणन और उद्यमिता संबंधी प्रशिक्षण दिया गया। कार्यक्रम की खास बात यह रही कि फ्लाई ऐश डंप क्षेत्रों में उगाए गए बांस का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका को एक साथ जोड़ा गया।
पारंपरिक संसाधन से आधुनिक अर्थव्यवस्था तक
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में बांस अब केवल जंगलों या हस्तशिल्प तक सीमित नहीं रहा। यह किसानों की आय बढ़ाने, महिलाओं को रोजगार देने, ग्रामीण उद्योगों को मजबूत करने और हरित निर्माण सामग्री उपलब्ध कराने वाला बहुआयामी संसाधन बन चुका है।

























