September 20, 2026 11:40 AM

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कृषि का आनुवंशिक खजाना: किसानों के ज्ञान से विज्ञान तक!

पौध आनुवंशिक संसाधनों से बदलेगी कृषि की दिशा, संरक्षण से सतत विकास तक मंथन!

बेंगलुरु, 19 सितंबर 2026। प्रायद्वीपीय भारत की समृद्ध पौध जैव विविधता को भविष्य की कृषि, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका का आधार बनाने पर बेंगलुरु में राष्ट्रीय स्तर पर मंथन हुआ। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIHR), बेंगलुरु में 17 से 19 सितंबर 2026 तक “Harnessing Plant Genetic Resources of Peninsular India – From Biodiversity Hotspot to Sustainable Bio-resource Hub” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजन किया।

राज्यपाल ने किया संगोष्ठी का उद्घाटन

कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि पौध आनुवंशिक संसाधन (Plant Genetic Resources-PGR) भविष्य की कृषि व्यवस्था के लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं। इनका संबंध केवल फसलों की विविधता के संरक्षण से नहीं, बल्कि खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन, जलवायु परिवर्तन से निपटने और ग्रामीण समुदायों की आजीविका से भी है।

उन्होंने कहा कि कर्नाटक और पूरे प्रायद्वीपीय भारत में स्थानीय फसल किस्मों (Landraces), पारंपरिक फसलों, जंगली फसल संबंधियों (Crop Wild Relatives), औषधीय पौधों और पारंपरिक ज्ञान की महत्वपूर्ण विरासत मौजूद है। इस जैव विविधता को संरक्षित करने के साथ-साथ उसके वैज्ञानिक और आर्थिक उपयोग पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का मेल जरूरी

राज्यपाल ने पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक विज्ञान और डिजिटल तकनीकों को एक साथ जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पौध आनुवंशिक संसाधनों का लाभ तभी व्यापक रूप से किसानों और समाज तक पहुंच सकेगा, जब संरक्षण से लेकर अनुसंधान, नवाचार, मूल्यवर्धन, उद्यमिता और बाजार तक मजबूत वैल्यू चेन विकसित की जाए।

उन्होंने विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों से “Lab to Land” और “Land to Lab” दृष्टिकोण को मजबूत करने का आह्वान किया। इसका उद्देश्य किसानों के व्यावहारिक अनुभव और स्थानीय पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ना है, ताकि खेतों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप तकनीक और किस्मों का विकास हो सके।

आनुवंशिक संसाधन मानवता की विरासत: डॉ. परोदा

पद्म भूषण डॉ. आर. एस. परोदा, अध्यक्ष, ISPGR और चेयरमैन, TAAS ने पौध आनुवंशिक संसाधनों को मानवता की साझा विरासत बताया। उन्होंने इनके व्यापक अन्वेषण, वैज्ञानिक अध्ययन और आनुवंशिक क्षमता को समझने की दिशा में और अधिक प्रयासों की आवश्यकता बताई।

उन्होंने जैव विविधता के संरक्षण में किसानों और स्थानीय समुदायों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्हें जैव विविधता के संरक्षक (Custodians of Biodiversity) के रूप में पहचान देने पर जोर दिया। साथ ही, उन्होंने राज्यों के स्तर पर पौध आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और दस्तावेजीकरण के लिए विशेष मिशन विकसित करने की आवश्यकता बताई।

संरक्षित संसाधनों के उपयोग पर ICAR का जोर

ICAR के उप महानिदेशक (Crop Sciences) डॉ. डी. के. यादव ने कहा कि देश में संरक्षित आनुवंशिक संसाधनों का उपयोग फसल सुधार के लिए अधिक प्रभावी ढंग से किया जाना चाहिए। उन्होंने नई प्रजनन रणनीतियों (Novel Breeding Strategies) के माध्यम से इन संसाधनों की उपयोगिता बढ़ाने पर जोर दिया।

उन्होंने आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण में ICAR-NBPGR और National Gene Bank की भूमिका को रेखांकित किया। उनके अनुसार, जीन बैंक में संरक्षित विविधता का वैज्ञानिक उपयोग करके ऐसी फसल किस्मों के विकास को गति दी जा सकती है, जो बदलती जलवायु और भविष्य की कृषि चुनौतियों के अनुरूप बेहतर प्रदर्शन करें।

300 से अधिक विशेषज्ञ और हितधारक शामिल

तीन दिवसीय संगोष्ठी में 300 से अधिक वैज्ञानिक, शोधकर्ता, नीति-निर्माता, विद्यार्थी, किसान और अन्य हितधारकों ने हिस्सा लिया। चर्चा का व्यापक उद्देश्य प्रायद्वीपीय भारत के पौध आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ उनके सतत उपयोग और आर्थिक मूल्यवर्धन के रास्ते तलाशना है।

पौध आनुवंशिक संसाधनों की यह विविधता भविष्य में जलवायु-सहिष्णु फसलों, पोषण सुरक्षा, जैव-आधारित उद्यमों और किसानों की आय के नए अवसरों का आधार बन सकती है। ऐसे में संरक्षण को केवल जीन बैंक या शोध संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय इसे किसान, बाजार और ग्रामीण उद्यमिता से जोड़ना महत्वपूर्ण होगा।

संगोष्ठी से निकलने वाली चर्चाएं और सुझाव प्रायद्वीपीय भारत की जैव विविधता को संरक्षण से आगे बढ़ाकर सतत जैव-संसाधन आधारित विकास से जोड़ने की दिशा में उपयोगी आधार प्रदान कर सकते हैं।

चित्र: सौजन्य ICAR