September 11, 2026 4:27 PM

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ड्रायलैंड कांग्रेस 2026 में भारत ने दिया नया कृषि विजन!

ड्रायलैंड कांग्रेस 2026: ‘ड्रायलैंड हमारी कमजोरी नहीं, भविष्य की सबसे बड़ी ताकत’ — शिवराज सिंह चौहान

नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन, घटते जल संसाधन और बढ़ती खाद्य मांग के बीच सूखा एवं वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों (ड्रायलैंड) को लेकर भारत ने दुनिया के सामने एक नया दृष्टिकोण रखा है। ड्रायलैंड कांग्रेस 2026 के मंत्रिस्तरीय सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि ड्रायलैंड क्षेत्रों को अब पिछड़े या सीमित संसाधनों वाले इलाकों के रूप में नहीं, बल्कि अधिक अवसर, अधिक आय और अधिक आत्मनिर्भरता के केंद्र के रूप में देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि दुनिया भर के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में कृषि की अपार संभावनाएं हैं। यदि जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य सुधार, जलवायु-अनुकूल किस्मों, प्राकृतिक खेती, फसल विविधीकरण और एकीकृत कृषि प्रणालियों को बढ़ावा दिया जाए तो ये क्षेत्र किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

मंथन नहीं, परिणाम चाहिए

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि केवल चर्चा और विचार-विमर्श से आगे बढ़कर ठोस और समयबद्ध परिणामों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, हमें केवल मंथन नहीं, मंथन से अमृत चाहिए। ड्रायलैंड को केवल कम पानी वाली खेती का क्षेत्र नहीं, बल्कि अधिक अवसर, अधिक आय और अधिक आत्मनिर्भरता का आधार बनाना होगा।

कृषि मंत्री ने मिट्टी की सेहत को कृषि की स्थिरता का आधार बताते हुए कहा कि मिट्टी में कार्बन बढ़ाना केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं है, बल्कि यह कृषि उत्पादकता और किसान समृद्धि की नींव है। उन्होंने जल संसाधनों के कुशल उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि हर बूंद पानी का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना होगा और कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली तकनीकों को तेजी से किसानों तक पहुंचाना होगा।

भारत अब तकनीक लेने वाला नहीं, देने वाला देश

ग्लोबल कृषि परिदृश्य में भारत की भूमिका पर चर्चा करते हुए चौहान ने कहा कि भारत को केवल तकनीक प्राप्त करने वाला देश नहीं रहना चाहिए, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के साथ समाधान, नवाचार और कृषि तकनीक साझा करने वाला अग्रणी राष्ट्र बनना चाहिए।

जलवायु चुनौतियों के बावजूद मजबूत हुई भारतीय कृषि

ड्रायलैंड कांग्रेस के विजनरी टॉक्स सत्र में डॉ. एम.एल. जाट, सचिव (DARE) एवं महानिदेशक, ICAR ने कहा कि कभी 10 प्रतिशत वर्षा की कमी से देश के खाद्यान्न उत्पादन में 13.38 प्रतिशत तक गिरावट आ जाती थी, जबकि आज यह प्रभाव घटकर मात्र 0.22 प्रतिशत रह गया है। यह बदलाव विज्ञान, अनुसंधान, तकनीक, संस्थागत सुधार और नीतिगत निवेशों का परिणाम है।

उन्होंने बताया कि पिछले दशक में असामान्य मौसम और बार-बार आने वाले जलवायु जोखिमों के बावजूद भारतीय कृषि लगातार विकास के पथ पर आगे बढ़ी है। देश में धान उत्पादन लगभग 86 मिलियन टन से बढ़कर 120 मिलियन टन से अधिक हो गया है, जबकि मक्का उत्पादन 24 मिलियन टन से बढ़कर 55 मिलियन टन से ऊपर पहुंच गया है। इसी तरह तिलहन उत्पादन 27 मिलियन टन से बढ़कर 43 मिलियन टन और मत्स्य उत्पादन लगभग 10 मिलियन टन से बढ़कर 20 मिलियन टन तक पहुंच गया है।

सूखा क्षेत्रों में दोगुनी हुई उत्पादकता

डॉ. जाट ने बताया कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में दलहनों की उत्पादकता 370 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 930 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है। वहीं ड्रायलैंड कृषि की उत्पादकता में लगभग 106 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह साबित करता है कि वैज्ञानिक नवाचार और उपयुक्त तकनीकों के माध्यम से जलवायु जोखिमों का प्रभाव कम किया जा सकता है।

उन्होंने ड्रायलैंड क्षेत्रों के विकास के लिए छह प्रमुख स्तंभों—भूमि संसाधन प्रबंधन, जल शासन, जलवायु-लचीली फसलें एवं पशुधन, विविध आजीविका, बाजार एकीकरण और डिजिटल तकनीकों—पर आधारित रणनीति का सुझाव दिया।

भारत की खाद्य और पोषण सुरक्षा का आधार हैं ड्रायलैंड

ड्रायलैंड कांग्रेस 2026 के संरक्षक एवं ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा कि ड्रायलैंड केवल पानी की कमी वाले क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि कई जगह मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों की कमी जैसी चुनौतियों का भी सामना कर रहे हैं। इसके बावजूद ये क्षेत्र भारत की खाद्य और पोषण सुरक्षा की रीढ़ बने हुए हैं।

उन्होंने बताया कि देश के लगभग 85-90 प्रतिशत मोटे अनाज (मिलेट्स), 85 प्रतिशत दलहन और 65-70 प्रतिशत तिलहन का उत्पादन ड्रायलैंड क्षेत्रों से आता है। ऐसे में इन क्षेत्रों का विकास केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने का विषय नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने से भी जुड़ा हुआ है।

‘दिल्ली घोषणा’ की दिशा में ग्लोबल पहल

25 से अधिक देशों के 800 से ज्यादा प्रतिनिधियों की भागीदारी वाले इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उत्पादकता, लाभप्रदता, जलवायु लचीलापन, दक्षिण-दक्षिण सहयोग, नवाचार और अनुसंधान साझेदारी को बढ़ावा देने पर चर्चा हो रही है। सम्मेलन के अंत में ‘दिल्ली डिक्लेरेशन ऑन ड्रायलैंड्स’ तैयार किए जाने की दिशा में भी काम चल रहा है, जो भविष्य की वैश्विक ड्रायलैंड कृषि रणनीति का आधार बन सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में ड्रायलैंड क्षेत्र अब चुनौती नहीं, बल्कि टिकाऊ कृषि, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि का सबसे बड़ा अवसर बनकर उभर रहे हैं।