मध्य प्रदेश विधानसभा की कृषि विकास समिति ने आईसीएआर-आईएआरआई का किया दौरा, टिकाऊ कृषि तकनीकों पर हुआ मंथन
नई दिल्ली, – मध्य प्रदेश विधानसभा की कृषि विकास समिति के एक प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली का दौरा किया। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने संस्थान द्वारा विकसित कृषि अनुसंधान, नवीन तकनीकों और टिकाऊ एवं जलवायु-सहिष्णु कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने की रणनीतियों की जानकारी प्राप्त की।
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प्रतिनिधिमंडल का स्वागत आईसीएआर-आईएआरआई के निदेशक डॉ. च. श्रीनिवास राव ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत संयुक्त निदेशक (प्रसार) डॉ. आर. एन. पडारिया के स्वागत संबोधन से हुई। इसके बाद डॉ. राव और मध्य प्रदेश विधानसभा की कृषि विकास समिति के अध्यक्ष ठाकुर दास नागवंशी ने अपने विचार साझा किए। इस अवसर पर प्रतिनिधियों और आईएआरआई वैज्ञानिकों के बीच कृषि क्षेत्र की वर्तमान चुनौतियों और प्राथमिकताओं पर विस्तृत चर्चा हुई।
डॉ. श्रीनिवास राव ने अपने संबोधन में संस्थान की उपलब्धियों और टिकाऊ कृषि-खाद्य प्रणालियों को बढ़ावा देने के लिए अपनाई जा रही रणनीतियों की जानकारी दी। उन्होंने मध्य प्रदेश की कृषि से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आईएआरआई द्वारा विकसित उच्च उत्पादकता वाली, जलवायु-अनुकूल और जैव-संवर्धित (बायोफोर्टिफाइड) फसल किस्में राज्य के किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती हैं।
उन्होंने कहा कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल खाद्य सुरक्षा ही नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। इसके लिए ऐसी तकनीकों और किस्मों का विकास जरूरी है जो कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पोषण स्तर में भी सुधार करें। उन्होंने मध्य प्रदेश में किसानों के हित में आईएआरआई द्वारा संचालित विभिन्न अभियानों और कार्यक्रमों की भी जानकारी दी।
कृषि विकास समिति के अध्यक्ष ठाकुर दास नागवंशी ने कृषि क्षेत्र में आईएआरआई के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश में फसल अवशेष प्रबंधन और कीटनाशकों के संतुलित उपयोग जैसी चुनौतियां प्रमुख हैं। उन्होंने इन समस्याओं के समाधान के लिए संस्थान द्वारा विकसित तकनीकों और शोध कार्यों में विशेष रुचि दिखाई।
पूसा डीकंपोजर और पराली प्रबंधन तकनीक पर विशेष प्रस्तुति
कार्यक्रम के दौरान आईएआरआई के वैज्ञानिकों ने प्रतिनिधिमंडल को विभिन्न कृषि तकनीकों पर प्रस्तुति दी। इनमें पूसा डीकंपोजर प्रमुख रहा, जो फसल अवशेषों को 20 से 25 दिनों के भीतर प्राकृतिक रूप से विघटित कर पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद में बदल देता है। यह तकनीक पराली जलाने की समस्या को कम करने में प्रभावी मानी जाती है।
वैज्ञानिकों ने विभिन्न राज्यों में पराली जलाने की घटनाओं की उपग्रह आधारित निगरानी प्रणाली की जानकारी भी दी, जिससे नीति निर्माण और फसल अवशेष प्रबंधन के लिए बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलती है।
इसके अलावा खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए उच्च उत्पादक किस्मों, बागवानी फसलों की उन्नत तकनीकों, पौध संरक्षण उपायों तथा जल उपयोग दक्षता बढ़ाने वाली तकनीकों पर भी विस्तृत जानकारी साझा की गई।
अनुसंधान इकाइयों का किया निरीक्षण
प्रतिनिधिमंडल ने संस्थान की विभिन्न अनुसंधान एवं प्रदर्शन इकाइयों का भी दौरा किया। इनमें संरक्षण कृषि (कंजर्वेशन एग्रीकल्चर), एकीकृत कृषि प्रणाली (इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम), बायोमास यूनिट तथा संरक्षित खेती प्रौद्योगिकी केंद्र शामिल रहे। वैज्ञानिकों ने इन इकाइयों में चल रहे अनुसंधान कार्यों और किसानों के लिए विकसित तकनीकी समाधानों की जानकारी दी।
कार्यक्रम का समापन संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. सी. विश्वनाथन के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
कृषि नीति और अनुसंधान के बीच मजबूत होगा समन्वय
आईएआरआई का यह दौरा कृषि अनुसंधान संस्थानों और नीति-निर्माताओं के बीच संवाद को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की सहभागिता से क्षेत्रीय कृषि चुनौतियों के समाधान में वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग बढ़ेगा और किसानों के लिए टिकाऊ, उत्पादक एवं पोषण-संवेदनशील कृषि प्रणाली विकसित करने में मदद मिलेगी।
