अफ्रीकी स्वाइन फीवर के खिलाफ भारत को बड़ी सफलता: ICAR ने विकसित किया पहला स्वदेशी ASF टीका
नई दिल्ली। अफ्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) जैसी घातक पशु बीमारी से निपटने के लिए भारत ने एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान (ICAR-NIHSAD) ने देश का पहला स्वदेशी MA-104 सेल लाइन आधारित जीवित क्षीणित (Live Attenuated) अफ्रीकी स्वाइन फीवर टीका विकसित किया है। यह उपलब्धि देश के पशु स्वास्थ्य क्षेत्र और सूअर पालन उद्योग के लिए एक बड़ी राहत मानी जा रही है।
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ICAR ने सोशल मीडिया मंच X पर इस उपलब्धि की जानकारी साझा करते हुए कहा कि यह टीका सूअरों को अफ्रीकी स्वाइन फीवर से सुरक्षा प्रदान करेगा और लाखों पशुपालकों की आजीविका को सुरक्षित बनाने में मदद करेगा।
क्या है अफ्रीकी स्वाइन फीवर?
अफ्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) एक अत्यंत संक्रामक वायरल रोग है, जो अफ्रीकी स्वाइन फीवर वायरस (ASFV) के कारण होता है। यह घरेलू और जंगली दोनों प्रकार के सूअरों को प्रभावित करता है। तेज बुखार, आंतरिक रक्तस्राव और लगभग 100 प्रतिशत तक मृत्यु दर इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं।
भारत में इस बीमारी का पहला मामला वर्ष 2020 में सामने आया था। इसके बाद यह कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैल गई, जिससे बड़े पैमाने पर सूअरों की मौत हुई, व्यापार और पशु परिवहन पर प्रतिबंध लगे तथा हजारों छोटे पशुपालकों की आजीविका प्रभावित हुई। उत्तर-पूर्वी राज्यों में इसका असर सबसे अधिक देखा गया।
करोड़ों रुपये का हुआ आर्थिक नुकसान
ASF के प्रकोप ने देश के सूअर पालन क्षेत्र को भारी आर्थिक क्षति पहुंचाई है। वर्ष 2020-21 में असम में हुए शुरुआती प्रकोपों के दौरान सूअरों की मौत और उन्हें मारने की कार्रवाई से करीब 276 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
वहीं, मिजोरम में वर्ष 2025 तक ASF के कारण 11,382 से अधिक परिवार प्रभावित हुए और लगभग 982 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान दर्ज किया गया। इन घटनाओं ने एक प्रभावी स्वदेशी टीके की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया था।
कैसे विकसित किया गया नया टीका?
ICAR-NIHSAD के वैज्ञानिकों ने ASF वायरस जीनोटाइप-II के एक नए क्षीणित स्वरूप का उपयोग करते हुए यह टीका विकसित किया है। इसमें विशेष जीन विलोपन (Gene Deletion) तकनीक अपनाई गई है, जिससे वायरस की रोग पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है, लेकिन प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया मजबूत बनी रहती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह टीका MA-104 सेल लाइन पर आधारित है, जो व्यापक रूप से उपलब्ध है और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इससे उत्पादन लागत कम होगी और देश में टीके की उपलब्धता बढ़ सकेगी।
सुरक्षा और प्रभावकारिता में सफल
वैज्ञानिकों ने इस टीके का व्यापक परीक्षण किया है। इसमें रोगाणुहीनता, शुद्धता, सुरक्षा, आनुवंशिक स्थिरता, प्रतिरक्षाजनकता तथा सुरक्षात्मक प्रभावकारिता जैसे सभी महत्वपूर्ण मानकों का मूल्यांकन किया गया।
इसके अलावा, मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) के सहयोग से क्षेत्रीय स्तर पर भी इसका सत्यापन किया गया, जिसमें टीका सुरक्षित और प्रभावी पाया गया।
टीकाकरण की क्या है प्रक्रिया?
यह टीका आठ सप्ताह से अधिक आयु के स्वस्थ सूअरों के लिए अनुशंसित किया गया है। इसे 1 मिलीलीटर इंट्रामस्कुलर इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है तथा प्राथमिक टीकाकरण के 14 दिन बाद बूस्टर डोज लगाई जाती है।
पशुपालकों को मिलेगा बड़ा लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्वदेशी टीके के उपयोग से ASF के कारण होने वाली मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आएगी। इससे सूअर पालन उद्योग को होने वाले आर्थिक नुकसान पर नियंत्रण मिलेगा और विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी राज्यों सहित देशभर के लाखों सूअर पालकों की आय और आजीविका को सुरक्षा मिलेगी।
डॉ. एम.एल. जाट ने बताया ऐतिहासिक उपलब्धि
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव तथा ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि यह उपलब्धि पशु चिकित्सा विज्ञान में एक नए युग की शुरुआत है। उन्होंने कहा कि यह सफलता विश्वस्तरीय पशु स्वास्थ्य समाधान विकसित करने की भारत की बढ़ती वैज्ञानिक क्षमता को दर्शाती है और भविष्य में स्वदेशी टीकों तथा नवाचार आधारित तकनीकों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी।
वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण उपलब्धि
वर्तमान में अफ्रीकी स्वाइन फीवर के व्यावसायिक रूप से लाइसेंस प्राप्त टीकों की सीमित संख्या ही उपलब्ध है और अधिकांश टीके वियतनाम में विकसित पेटेंट प्राप्त सेल लाइनों पर आधारित हैं। इसके विपरीत, ICAR-NIHSAD द्वारा विकसित यह स्वदेशी टीका सार्वजनिक रूप से उपलब्ध MA-104 सेल लाइन का उपयोग करता है। इससे किसी मालिकाना तकनीक पर निर्भरता समाप्त होगी, बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव होगा और टीके की लागत में भी उल्लेखनीय कमी आएगी।
पशु स्वास्थ्य सुरक्षा को मिलेगा नया आधार
विशेषज्ञों के अनुसार यह स्वदेशी ASF टीका न केवल भारत के सूअर पालन उद्योग को नई मजबूती देगा, बल्कि पशु रोग प्रबंधन, खाद्य सुरक्षा और जैव सुरक्षा को भी सशक्त बनाएगा। यह उपलब्धि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में पशु स्वास्थ्य क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सफलता के रूप में देखी जा रही है।
चित्र: प्रतीकात्मक

