WTO मत्स्य सब्सिडी समझौते में शामिल हुआ भारत, छोटे मछुआरों और समुद्री संसाधनों के संरक्षण को मिलेगा बल
नई दिल्ली, 21 जुलाई। भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मत्स्य पालन सब्सिडी समझौते (Agreement on Fisheries Subsidies-AFS) को औपचारिक स्वीकृति देते हुए 20 जुलाई 2026 को अपना स्वीकृति पत्र जमा कर दिया है। इसके साथ ही भारत इस समझौते का पक्षकार बनने वाला 123वां सदस्य देश बन गया है। यह कदम समुद्री संसाधनों के संरक्षण, सतत मत्स्य प्रबंधन और तटीय समुदायों की आजीविका सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है।
डब्ल्यूटीओ महानिदेशक को यह स्वीकृति पत्र भारत सरकार की ओर से वाणिज्य सचिव द्वारा सौंपा गया। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे भारत की वैश्विक स्तर पर एक जिम्मेदार और टिकाऊ समुद्री खाद्य निर्यातक के रूप में पहचान और मजबूत होगी।
क्या है WTO का मत्स्य पालन सब्सिडी समझौता?
मत्स्य पालन सब्सिडी समझौता जून 2022 में जेनेवा में आयोजित 12वें WTO मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC12) में सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था। यह पर्यावरणीय स्थिरता को केंद्र में रखकर तैयार किया गया WTO का पहला बहुपक्षीय समझौता है।
इसका मुख्य उद्देश्य उन सरकारी सब्सिडियों पर रोक लगाना है जो:
- अवैध, अनधिकृत और अनियमित (IUU) मछली पकड़ने को बढ़ावा देती हैं।
- अत्यधिक दोहन वाले मछली भंडारों पर दबाव बढ़ाती हैं।
- समुद्री जैव विविधता और मत्स्य संसाधनों को नुकसान पहुंचाती हैं।
दो-तिहाई WTO सदस्यों द्वारा अनुमोदन के बाद यह समझौता 15 सितंबर 2025 से प्रभावी हो चुका है।
छोटे और पारंपरिक मछुआरों के हितों को मिलेगा संरक्षण
भारत जैसे देशों के लिए यह समझौता विशेष महत्व रखता है क्योंकि देश का अधिकांश मत्स्य क्षेत्र लघु और पारंपरिक मछुआरों पर आधारित है।
समझौते के तहत उन सब्सिडियों को सीमित किया जाएगा जो बड़े औद्योगिक मछली पकड़ने वाले बेड़ों को अनुचित लाभ पहुंचाती हैं। इससे वैश्विक मत्स्य क्षेत्र में अधिक संतुलित और न्यायसंगत प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित होगी तथा छोटे मछुआरों के हितों की रक्षा होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्री संसाधनों का संरक्षण होने से आने वाले वर्षों में मछली उत्पादन की स्थिरता बनी रहेगी, जिससे तटीय क्षेत्रों में रोजगार और आय के अवसर भी सुरक्षित रहेंगे।
जलीय कृषि और अंतर्देशीय मत्स्य पालन पर नहीं होगा असर
इस समझौते की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि:
- जलीय कृषि (Aquaculture) इसके दायरे से बाहर है।
- अंतर्देशीय मत्स्य पालन भी प्रभावित नहीं होगा।
भारत के समुद्री खाद्य निर्यात में झींगा (श्रिम्प) आधारित जलीय कृषि का बड़ा योगदान है। चूंकि यह क्षेत्र समझौते के दायरे में नहीं आता, इसलिए देश के समुद्री खाद्य निर्यात पर किसी नकारात्मक प्रभाव की आशंका नहीं है।
समुद्री खाद्य निर्यात को मिल सकता है नया अवसर
ग्लोबल बाजारों में अब टिकाऊ उत्पादन और ट्रेसबिलिटी (उत्पाद की पहचान और स्रोत की जानकारी) को अधिक महत्व दिया जा रहा है।
WTO समझौते का हिस्सा बनने से:
- भारत की विश्वसनीयता एक जिम्मेदार समुद्री खाद्य निर्यातक के रूप में बढ़ेगी।
- यूरोप, अमेरिका और अन्य प्रीमियम बाजारों तक बेहतर पहुंच मिल सकती है।
- निर्यातकों को टिकाऊ मत्स्य उत्पादन के आधार पर नए व्यापारिक अवसर प्राप्त हो सकते हैं।
भारत वर्तमान में विश्व के प्रमुख समुद्री खाद्य निर्यातकों में शामिल है और समुद्री उत्पादों का निर्यात विदेशी मुद्रा अर्जन का महत्वपूर्ण स्रोत है।
मजबूत घरेलू ढांचा देगा कार्यान्वयन को समर्थन
भारत ने हाल के वर्षों में मत्स्य संसाधनों के संरक्षण और निगरानी के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इनमें शामिल हैं:
- विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में मत्स्य पालन के सतत दोहन संबंधी नियम, 2025
- भारतीय ध्वज वाले जहाजों के लिए खुले समुद्र में मत्स्य संचालन संबंधी दिशानिर्देश, 2025
- प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY)
- निगरानी, संरक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम
ये सभी पहलें WTO समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मजबूत आधार तैयार करती हैं।
भारत की ब्लू इकोनॉमी रणनीति को मिलेगा बल
विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय भारत की ब्लू इकोनॉमी नीति के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग कर आर्थिक विकास, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है।
भारत के पास लगभग 8,118 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा, विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा मत्स्य क्षेत्र है। ऐसे में सतत मत्स्य प्रबंधन भविष्य की खाद्य सुरक्षा और समुद्री पारिस्थितिकी संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नियम-आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता
WTO मत्स्य पालन सब्सिडी समझौते को स्वीकार कर भारत ने एक बार फिर नियम-आधारित वैश्विक व्यापार प्रणाली और बहुपक्षीय सहयोग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत किया है। साथ ही यह कदम समुद्री संसाधनों के संरक्षण, छोटे मछुआरों के हितों की रक्षा और टिकाऊ मत्स्य अर्थव्यवस्था के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
चित्र: सौजन्य सोशल मीडिया






























