गुड़ उद्योग में भारत बना ग्लोबल शक्ति, प्राकृतिक मिठास के बाजार में बढ़ी अंतरराष्ट्रीय मांग
70% वैश्विक उत्पादन के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा गुड़ उत्पादक, 25 लाख लोगों को मिल रहा रोजगार
भारत आज प्राकृतिक मिठास यानी गुड़ (गुड़/गुर) उत्पादन में विश्व का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। दुनिया के कुल गुड़ उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है। देश में उत्पादित कुल गन्ने का लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा गुड़ निर्माण में उपयोग किया जाता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिल रहा है। यह क्षेत्र करीब 25 लाख लोगों की आजीविका से जुड़ा हुआ है और ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे उद्योगों तथा कुटीर उद्यमों को मजबूती दे रहा है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
तेजी से बढ़ा गुड़ का निर्यात, विदेशों में बढ़ी भारतीय गुड़ की मांग
भारत का गुड़ उद्योग अब घरेलू बाजार तक सीमित नहीं रहा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी भारतीय गुड़ की मांग तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2015-16 में जहां गुड़ और उससे जुड़े उत्पादों का निर्यात 197 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 406.8 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया। यानी लगभग 106.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। निर्यात मात्रा भी 292.8 मीट्रिक टन से बढ़कर 471.9 मीट्रिक टन हो गई।
इंडोनेशिया, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, नाइजीरिया और नेपाल भारतीय गुड़ के प्रमुख आयातक देशों में शामिल हैं। चालू वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल-जनवरी अवधि में भी निर्यात में लगभग 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो इस क्षेत्र की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाता है।
प्राकृतिक मिठास की ओर बढ़ रहा उपभोक्ताओं का रुझान
स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण अब लोग रिफाइंड चीनी की बजाय प्राकृतिक और कम प्रोसेस्ड मिठास की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी वजह से गुड़ और शहद जैसे प्राकृतिक स्वीटनर बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। वर्ष 2021 से 2024 के बीच इस श्रेणी में 15 से 20 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि रसायन मुक्त उत्पादन, पारंपरिक प्रसंस्करण और पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण गुड़ आधुनिक स्वास्थ्य जीवनशैली का हिस्सा बनता जा रहा है।
पोषण का खजाना है गुड़
गुड़ को “औषधीय चीनी” भी कहा जाता है क्योंकि इसमें आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस, जिंक और कई सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं। रिफाइंड चीनी बनाने की प्रक्रिया में जहां अधिकांश पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, वहीं गुड़ में ये सुरक्षित रहते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार 100 ग्राम अच्छे गुणवत्ता वाले गुड़ में लगभग 10 से 13 मिलीग्राम आयरन पाया जाता है, जो हीमोग्लोबिन बढ़ाने में मदद करता है। इसके अलावा इसमें विटामिन A, B, C, D और E भी अल्प मात्रा में मौजूद होते हैं। यही कारण है कि गुड़ को एनीमिया, कमजोरी और पोषण की कमी से लड़ने में उपयोगी माना जाता है।
आयुर्वेद में भी गुड़ का विशेष महत्व
आयुर्वेद में गुड़ को शरीर की सफाई करने वाला प्राकृतिक पदार्थ माना गया है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसका उपयोग पाचन सुधारने, गले और फेफड़ों के संक्रमण में राहत देने तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है। सर्दी, खांसी और थकान में भी गुड़ का सेवन लाभकारी माना जाता है।
तमिलनाडु की पोषण योजनाओं में शामिल हुआ गुड़
तमिलनाडु सरकार ने बच्चों में कुपोषण कम करने और पोषण सुधारने के लिए अपने ‘सत्तुमावु’ पोषण कार्यक्रम में गुड़ को शामिल किया है। राज्य में महिलाओं द्वारा संचालित सहकारी समितियां पूरक पोषण आहार तैयार करती हैं, जिसमें लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा गुड़ का होता है। इससे न केवल बच्चों को पोषण मिल रहा है बल्कि महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं।
किसानों के लिए लाभकारी बन रहा वैल्यू एडिशन मॉडल
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल गन्ना बेचने की तुलना में गुड़ निर्माण किसानों के लिए अधिक लाभकारी साबित हो रहा है। तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के किसान एंथोनिसामी ने ऑर्गेनिक गुड़ पाउडर बनाकर इस क्षेत्र में नई मिसाल पेश की है। उनका जैविक गुड़ पाउडर लगभग 75 रुपये प्रति किलो बिक रहा है, जबकि सामान्य गुड़ की कीमत करीब 50 रुपये प्रति किलो है। उत्पादन लागत लगभग समान होने के कारण किसानों को अधिक मुनाफा मिल रहा है।
अब बाजार में गन्ना गुड़, पाम गुड़, नारियल फ्लेवर गुड़ और गुड़ चॉकलेट जैसे वैल्यू एडेड उत्पाद भी लोकप्रिय हो रहे हैं।
सरकारी योजनाओं से मिल रही मजबूती
केंद्र सरकार भी गुड़ उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (PMKSY), पीएम फॉर्मलाइजेशन ऑफ माइक्रो फूड प्रोसेसिंग एंटरप्राइजेज (PMFME), प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम और ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) जैसी योजनाओं से गुड़ आधारित इकाइयों को सहायता दी जा रही है।
PMFME योजना के तहत अब तक 3,528 गुड़ आधारित सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को लगभग 102 करोड़ रुपये की सहायता दी जा चुकी है। वहीं ODOP योजना के तहत 19 जिलों में गुड़ और उससे जुड़े उत्पादों को विशेष पहचान दी गई है।
GI टैग से बढ़ी क्षेत्रीय पहचान
भारत में कई पारंपरिक गुड़ उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) भी मिला है। महाराष्ट्र का कोल्हापुर गुड़, उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर गुर और केरल का मरायूर गुड़ अपनी विशेष गुणवत्ता और पारंपरिक निर्माण पद्धति के लिए प्रसिद्ध हैं। GI टैग मिलने से इन उत्पादों की ब्रांड वैल्यू और निर्यात संभावनाएं बढ़ी हैं।
ग्रामीण विकास और रोजगार का मजबूत आधार
गुड़ उद्योग ग्रामीण भारत में कृषि आधारित रोजगार का बड़ा स्रोत बनता जा रहा है। यह क्षेत्र छोटे किसानों, मजदूरों, महिला समूहों और कुटीर उद्योगों को स्थायी आय उपलब्ध करा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आधुनिक तकनीक, गुणवत्ता प्रमाणन और निर्यात सुविधाओं को और मजबूत किया जाए तो भारत का गुड़ उद्योग वैश्विक प्राकृतिक स्वीटनर बाजार में और बड़ी भूमिका निभा सकता है।
सारांश
भारत का गुड़ उद्योग केवल पारंपरिक मिठास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पोषण, स्वास्थ्य, ग्रामीण रोजगार और निर्यात वृद्धि का मजबूत आधार बन चुका है। बढ़ती वैश्विक मांग, सरकारी सहयोग और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के कारण आने वाले वर्षों में गुड़ उद्योग भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था का एक बड़ा विकास इंजन बन सकता है।
स्रोत: पीआईबी, चित्र: प्रतीकात्मक

