ICRISAT मॉडल: जल संरक्षण से बढ़ी खेती और किसानों की आय!

बुंदेलखंड में जल क्रांति की मिसाल: सूखे से जल समृद्धि तक पहुँचा पूरा बिरधा गांव, ICRISAT की स्टडी ने दिखाया बदलाव का मॉडल

छह वर्षों में बदली तस्वीर, भूजल स्तर 6 मीटर तक बढ़ा, खेती का रकबा 20 गुना से अधिक हुआ

ICRISAT की नई रिसर्च ने मध्य भारत के बुंदेलखंड क्षेत्र में जल संरक्षण और भूमि पुनर्स्थापन की एक प्रेरणादायक कहानी सामने रखी है। कभी देश के सबसे सूखा प्रभावित इलाकों में गिने जाने वाले बुंदेलखंड का पूरा बिरधा गांव अब जल समृद्धि और टिकाऊ कृषि मॉडल के रूप में उभर रहा है।

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Elsevier की जर्नल Cleaner Food Systems में प्रकाशित अध्ययन “Restoration Potential of Degraded Landscapes for Strengthening Rural Livelihoods” में बताया गया है कि वर्ष 2018 से शुरू हुए वाटरशेड हस्तक्षेपों ने क्षेत्र की तस्वीर बदल दी। वैज्ञानिकों के अनुसार भूजल स्तर में 4 से 6 मीटर तक की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि खेती योग्य भूमि 4 हेक्टेयर से बढ़कर 100 हेक्टेयर से अधिक हो गई।

2021 बना बदलाव का टर्निंग पॉइंट

अध्ययन के अनुसार शुरुआती वर्षों में कम वर्षा का अधिकांश पानी सूखी मिट्टी सोख लेती थी, जिससे जल संचयन का खास लाभ नहीं मिल रहा था। लेकिन वर्ष 2021 में तेज बारिश के दौरान बनाए गए जल संरचनाओं ने लगभग 210 मिमी रनऑफ पानी को रोक लिया।

इससे जमीन में पानी का रिसाव बढ़ा और भूजल स्तर तेजी से ऊपर आया। पहली बार किसानों को रबी सीजन में भरोसेमंद सिंचाई उपलब्ध हुई, जिसने खेती की दिशा ही बदल दी।

डबल क्रॉपिंग से बढ़ी किसानों की आय

ICRISAT के वैज्ञानिकों के अनुसार विश्वसनीय सिंचाई उपलब्ध होने से किसानों ने एक फसल की जगह दोहरी फसल प्रणाली अपनानी शुरू कर दी। गेहूं और चना जैसी फसलों की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

सिर्फ खेती ही नहीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका बड़ा असर पड़ा। गांव की कुल वार्षिक आय 2019 में लगभग 2,370 डॉलर से बढ़कर 2023 में 1,48,500 डॉलर तक पहुंच गई। औसत पारिवारिक आय करीब 3,300 डॉलर दर्ज की गई।

पलायन रुका, गांव लौटे 45 परिवार

जल संकट खत्म होने का असर सामाजिक जीवन पर भी दिखा। जो कुएं पहले भरने में कई दिन लेते थे, अब कुछ घंटों में भरने लगे। इससे पीने के पानी की उपलब्धता बढ़ी और महिलाओं का पानी लाने में लगने वाला समय कम हुआ।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा कि रोजगार और खेती की बेहतर संभावनाओं के कारण 45 परिवार वापस गांव लौट आए और फिर से खेती से जुड़ गए।

वैज्ञानिकों ने बताया- भूमि सुधार सिर्फ पर्यावरण नहीं, आजीविका का भी समाधान

Dr Himanshu Pathak ने कहा कि भूमि क्षरण केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि यह सूखा, मरुस्थलीकरण और ग्रामीण गरीबी से जुड़ा हुआ मुद्दा है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तरीके से भूमि पुनर्स्थापन करने पर जल संरक्षण, कृषि उत्पादन और सामाजिक-आर्थिक स्थिरता एक साथ मजबूत होती है।

वहीं Dr Stanford Blade ने कहा कि इस अध्ययन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें प्राकृतिक संसाधनों और ग्रामीण आजीविका पर पड़े प्रभाव को समय के साथ मापा गया है, जिससे भविष्य के लिए बड़े स्तर पर लागू किए जा सकने वाले मॉडल विकसित करने में मदद मिलेगी।

उत्तर प्रदेश सरकार और CGIAR कार्यक्रम का मिला सहयोग

यह परियोजना उत्तर प्रदेश सरकार की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के तहत संचालित की गई। इसका उद्देश्य भूमि क्षरण, जल संकट और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करना था।

यह कार्य One CGIAR Multifunctional Landscapes Science Program का हिस्सा भी रहा, जो कृषि परिदृश्य में भूमि, जल, जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका के एकीकृत प्रबंधन पर काम करता है।

विशेषज्ञों का मानना- देश के अन्य सूखा प्रभावित क्षेत्रों में भी लागू हो सकता है मॉडल

वैज्ञानिकों का मानना है कि बुंदेलखंड मॉडल देश के अन्य जल संकट वाले क्षेत्रों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। यदि स्थानीय जल बजट के अनुसार फसल प्रणाली और जल संरक्षण ढांचे विकसित किए जाएं, तो सूखा प्रभावित इलाकों में भी खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी जा सकती है।

Source: ICRISAT