मंजर से मटर अवस्था तक आम की फसल पर विशेष ध्यान जरूरी, वैज्ञानिक प्रबंधन से बढ़ेगा पैदावार!
पूसा (समस्तीपुर), बिहार। आम को भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान माना जाता है। देश में लगभग 22 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आम की खेती की जाती है और कुल पैदावार 180 लाख टन से अधिक है। औसत पैदावार 8–9 टन प्रति हेक्टेयर के आसपास है। बिहार जैसे राज्यों में यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से बेहतर है, जो दर्शाता है कि यदि वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाया जाए तो उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह के अनुसार, आम में मंजर निकलने से लेकर मटर अवस्था तक की अवधि उत्पादन निर्धारण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और निर्णायक होती है। इस चरण में की गई छोटी-सी चूक भी फल-सेट को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।
उत्तर बिहार की जलवायु: अनुकूलता के साथ चुनौती भी
फरवरी–मार्च के दौरान उत्तर बिहार में अधिकतम तापमान 29–33°C, न्यूनतम 14–17°C तथा दोपहर में 20–25% सापेक्ष आर्द्रता दर्ज की जाती है। ये परिस्थितियाँ मंजर निकलने के लिए अनुकूल तो हैं, लेकिन जब तापमान 32–33°C तक पहुंच जाता है और आर्द्रता 25% से नीचे चली जाती है, तब परागकणों की जीवंतता घटने लगती है। इससे निषेचन प्रक्रिया बाधित होती है और फल-सेट कम हो जाता है।
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, संभावित फलों में से 85–95 प्रतिशत फल प्रारंभिक अवस्था में ही झड़ जाते हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव, कम आर्द्रता, कीट-रोग प्रकोप और पोषण असंतुलन इसके प्रमुख कारण हैं।
मंजर अवस्था: फसल की आधारशिला
मंजर निकलते ही बाग की नियमित निगरानी अनिवार्य है। शुष्क और गर्म मौसम में आम हॉपर (मधुआ कीट) का प्रकोप तेजी से बढ़ता है, जो फूलों से रस चूसकर उन्हें सुखा देता है। इसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL @ 1 मि.ली./लीटर पानी में छिड़काव प्रभावी माना गया है।
चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू) के नियंत्रण हेतु घुलनशील गंधक 2 ग्राम/लीटर पानी का छिड़काव लाभकारी है।
प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह सुझाव है कि पूर्ण फूल खिलने की अवस्था में किसी भी प्रकार का कीटनाशक छिड़काव नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे परागण करने वाले कीट बाग से दूर हो सकते हैं। यदि छिड़काव आवश्यक हो तो शाम के समय करें। रोगग्रस्त मंजरों को तोड़कर नष्ट करें तथा मुख्य तने पर बोर्डो पेस्ट की पुताई तना रोगों से सुरक्षा देती है। 
इस चरण में अधिक सिंचाई से बचना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक नमी फूल झड़ने का कारण बन सकती है।
मटर अवस्था में पोषण और संरक्षण का महत्व
जब फल मटर के आकार के हो जाएं, तब पोषण प्रबंधन अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
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पोटैशियम नाइट्रेट (1%) का छिड़काव फलधारण बढ़ाने में सहायक है।
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बोरॉन 0.2% या बोरॉन + जिंक का संयुक्त छिड़काव परागण एवं निषेचन को मजबूत करता है।
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प्रारंभिक फल गिरावट कम करने के लिए NAA (प्लेनोफिक्स) @ 1 मि.ली./3 लीटर पानी का प्रयोग लाभकारी पाया गया है।
इस अवस्था में हल्की सिंचाई शुरू कर मिट्टी में संतुलित नमी बनाए रखना चाहिए, परंतु जलभराव से हर हाल में बचाव आवश्यक है। अत्यधिक नाइट्रोजन उर्वरक देने से शाकीय वृद्धि बढ़ती है और फलधारण प्रभावित हो सकता है।
परागण प्रबंधन: अधिक फल-सेट की कुंजी
अनुसंधान बताते हैं कि मधुमक्खियों की सक्रियता से 20–30% तक अधिक फल-सेट प्राप्त किया जा सकता है। प्रति हेक्टेयर 10–12 मधुमक्खी कॉलोनियां स्थापित करना लाभकारी है। दिन के समय कीटनाशक छिड़काव से बचना चाहिए और बाग में विविध पुष्पीय पौधे लगाकर परागणकर्ताओं को आकर्षित करना चाहिए।
बेहतर परागण सीधे तौर पर अधिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन से जुड़ा है।
जलवायु परिवर्तन की नई चुनौती
हाल के वर्षों में तापमान में अनियमित वृद्धि, असमय वर्षा और आर्द्रता में तीव्र परिवर्तन ने आम की फसल को प्रभावित किया है। इससे फूल आने का समय और फलधारण पर असर पड़ रहा है। विशेषज्ञ किसानों को सलाह देते हैं कि वे स्थानीय मौसम का नियमित रिकॉर्ड रखें।
तापीय तनाव की स्थिति में समुद्री शैवाल अर्क या अमीनो एसिड आधारित एंटी-स्ट्रेस पोषक तत्वों का हल्का छिड़काव लाभकारी हो सकता है। समय पर निर्णय और सतत निगरानी वर्तमान समय की जरूरत है।
बाग स्वच्छता और सतत निगरानी जरूरी
गिरे हुए फल-पत्तियों को हटाना, खरपतवार नियंत्रण और संतुलित छंटाई से वायु संचार बेहतर होता है, जिससे रोग प्रबंधन में सहायता मिलती है। किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत कृषि विज्ञान केंद्र या पौधा संरक्षण विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
वैज्ञानिक प्रबंधन से आय में स्थायी वृद्धि
मंजर से मटर अवस्था तक का समय आम फसल की दिशा तय करता है। बढ़ता तापमान, कम आर्द्रता और शुष्क हवाएं इस अवधि को और संवेदनशील बना देती हैं।
यदि किसान संतुलित सिंचाई, सूक्ष्म पोषण तत्वों का प्रयोग, समेकित कीट-रोग प्रबंधन, मधुमक्खी संरक्षण और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार वृद्धि नियंत्रकों का उपयोग करें, तो फल-सेट में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
समन्वित एवं वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाकर न केवल उत्पादन बल्कि गुणवत्ता में भी सुधार किया जा सकता है, जिससे किसानों की आय में स्थायी बढ़ोतरी सुनिश्चित होगी।
बागवानी करें – वैज्ञानिक ढंग से करें – और आम उत्पादन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएँ।
प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह विभागाध्यक्ष, पादप रोग विज्ञान एवं नेमेटोलॉजी अधिकारी-प्रभारी, केला अनुसंधान केन्द्र, गोरौल डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा संपर्क: sksraupusa@gmail.com
Note: आम के मंजर के चित्र प्रतीकात्मक है