आज भी प्रासंगिक है अंबेडकर का जल मॉडल

डॉ बी आर अंबेडकर और भारत की जल सुरक्षा: नीतियां, बांध और संविधान की भूमिका !!

पी. एस. ब्रह्मानंद

भारत आज कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति करते हुए एक सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित हो चुका है। यह उपलब्धि देश के अनेक महान व्यक्तित्वों के समर्पण, दूरदर्शिता और अथक प्रयासों का परिणाम है। इन विभूतियों में बाबासाहेब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है, जिन्होंने भारत को एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी व्यवस्था की दिशा में अग्रसर किया। संविधान निर्माण में उनकी केंद्रीय भूमिका ने देश को एक मजबूत आधार प्रदान किया, जो आज भी हमारे लोकतंत्र की नींव बना हुआ है। स्वतंत्रता से पहले और बाद, विभिन्न जिम्मेदारियों में रहते हुए उन्होंने समाज के कई क्षेत्रों में अहम और स्थायी योगदान दिया।

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बाबासाहेब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी को विकास का आधार मानते हुए प्राकृतिक संसाधनों, खासकर जल के सतत और संतुलित उपयोग के लिए दूरदर्शी नीतियों व कानूनों की कल्पना की। उन्होंने समय रहते जलवायु परिवर्तन और घटते जल संसाधनों के खतरों को समझा और इसी वजह से बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई विस्तार तथा जलविद्युत उत्पादन के लिए बड़े बांधों और जल संरचनाओं के विकास को प्राथमिकता दी।

डॉ. अंबेडकर का स्पष्ट मत था कि सिंचाई व्यवस्था मजबूत होने से न केवल फसलों की उत्पादकता बढ़ेगी, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। इसी सोच के चलते उन्होंने जल और सिंचाई क्षेत्र में संस्थागत ढांचे को विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आगे चलकर देश की जल सुरक्षा की नींव बना।

उनकी 136वीं जयंती के अवसर पर यह आवश्यक है कि हम जल सुरक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को न केवल याद करें, बल्कि उसे समझें भी। उनके कार्यों का बहुआयामी विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि उन्होंने—पहला, बड़े बांधों और जल संरचनाओं को मजबूत करने के लिए संस्थानों की स्थापना पर जोर दिया; दूसरा, हर नागरिक तक स्वच्छ और सुरक्षित जल की समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक प्रावधान किए; और तीसरा, जल प्रबंधन के क्षेत्र में ऐसे सिद्धांत दिए, जो आज भी प्रासंगिक हैं और वर्तमान चुनौतियों के समाधान प्रस्तुत करते हैं।

बाबासाहेब ने ब्रिटिश शासन के दौरान (1942–1946) वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य के रूप में कार्य किया और सिंचाई संरचना को सुदृढ़ करने में उल्लेखनीय योगदान दिया, जिससे भारत की जल सुरक्षा सुनिश्चित हुई। उन्होंने 1945 में स्थापित केंद्रीय जलमार्ग, सिंचाई एवं नौवहन आयोग (CWINC) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान में विकसित केंद्रीय जल आयोग (CWC) भारत सरकार को जल संसाधनों के सतत प्रबंधन में तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है।

डॉ. अंबेडकर ने बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के महत्व को भी समझा, जो घरेलू उपयोग, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन की आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। इसी दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप, 1948 में भारत की पहली बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना ‘दामोदर घाटी निगम’ (DVC) की स्थापना हुई। इसी प्रकार, हीराकुंड, सोन और कोसी जैसी महत्वपूर्ण नदी परियोजनाएं भी स्थापित की गईं, जिन्होंने बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, फसल उत्पादकता में वृद्धि और विद्युत आपूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

डॉ. अंबेडकर जल के महत्व और समाज के सभी वर्गों के लिए इसके समान वितरण के प्रति अत्यंत सजग थे। अर्थशास्त्र और विधि में दक्षता प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता का उपयोग प्रभावी नीतियों के निर्माण में किया, जिससे गरीब और वंचित वर्गों को लाभ मिला। भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करते समय उन्होंने कई महत्वपूर्ण अनुच्छेदों को शामिल किया, जो जल संसाधनों के संरक्षण, विकास और जल विवादों के समाधान में सहायक हैं। उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) में स्वच्छ पेयजल और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार शामिल है, जिसे न्यायपालिका द्वारा व्याख्यायित किया गया है। इसी प्रकार, अनुच्छेद 262 संसद को अंतरराज्यीय नदियों के जल उपयोग, वितरण और नियंत्रण से संबंधित विवादों के समाधान हेतु कानून बनाने का अधिकार देता है। इसी आधार पर 1956 का अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम लागू हुआ, जो जल विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इसके अतिरिक्त, डॉ. अंबेडकर के प्रयासों से पर्यावरण और जल प्रदूषण के नियंत्रण के माध्यम से सभी वर्गों को सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने में सहायता मिली। उदाहरणस्वरूप, अनुच्छेद 252 के आधार पर 1974 में ‘जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम’ लागू किया गया, जिसने जल प्रदूषण रोकने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाने में सहायता की। कुल मिलाकर, भारतीय संविधान के ये प्रावधान समाज के विभिन्न वर्गों, क्षेत्रों और राज्यों को जल के समान और सुरक्षित उपयोग का अधिकार प्रदान करते हैं।

डॉ. अंबेडकर की सबसे बड़ी शक्ति समाज के कमजोर वर्गों की सेवा के लिए उनकी सकारात्मक ऊर्जा और दृढ़ संकल्प था, जो उनके जीवन के प्रत्येक कार्य में परिलक्षित होता है। इसी विशेषता ने उन्हें जल संकट और जल संसाधनों के समान वितरण की आवश्यकता को समझने के लिए प्रेरित किया। उनके विचारों से हमें प्रेरणा मिलती है कि शिक्षा और संगठन के माध्यम से समस्याओं का प्रभावी समाधान संभव है। उनका दृढ़ विश्वास था कि “जल ही संपत्ति है” और जल संसाधनों का वैज्ञानिक एवं समुचित प्रबंधन ग्रामीण गरीबी को कम कर सकता है तथा कृषि को सुदृढ़ बना सकता है।

इस प्रकार, जल संसाधनों के समान और सतत विकास की उनकी विचारधारा आज भी अत्यंत प्रासंगिक है, विशेषकर अंतरराज्यीय जल विवादों के संदर्भ में। बाबासाहेब की 136वीं जयंती के पावन अवसर पर, आइए हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करें और जल संसाधनों के समुचित एवं न्यायपूर्ण वितरण के लिए सामूहिक प्रयास करें, जिससे समाज के सभी वर्गों को सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो सके।

लेखक:
पी. एस. ब्रह्मानंद

(गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड धारक)
प्रोजेक्ट डायरेक्टर, वाटर टेक्नोलॉजी सेंटर एवं प्रभारी, सीपीसीटी आईसीएआर–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली