September 23, 2026 12:13 AM

Krishi Times

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नारियल की भूसी से बदल रही गांवों की तकदीर!

नारियल की भूसी से करोड़ों संभावनाएं: कॉयर उद्योग बना ग्रामीण रोजगार, महिला सशक्तिकरण और जैविक खेती का मजबूत आधार

कॉयर क्षेत्र में बढ़ रही उद्यमिता, महिलाओं को मिल रहा रोजगार, किसानों के लिए बन रहे नए आय स्रोत

नई दिल्ली। नारियल की भूसी को कभी बेकार समझा जाता था, लेकिन आज यही भूसी ग्रामीण भारत में रोजगार, उद्यमिता और पर्यावरण-अनुकूल उद्योग की नई पहचान बन रही है। नारियल से प्राप्त होने वाला कॉयर (नारियल रेशा) अब केवल रस्सी और चटाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जैव उर्वरक, हस्तशिल्प, बागवानी उत्पाद, सजावटी वस्तुएं और टिकाऊ पैकेजिंग जैसे कई मूल्यवर्धित उत्पादों का आधार बन चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कॉयर उद्योग न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है, बल्कि कृषि, बागवानी और प्राकृतिक खेती को भी नई दिशा दे रहा है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) के अंतर्गत संचालित कॉयर बोर्ड और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के सहयोग से हजारों ग्रामीण उद्यमी अपने व्यवसाय स्थापित कर रहे हैं।

कॉयर से बदली महिलाओं की जिंदगी

आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कडियाम की रहने वाली अल्लम गौथमी इसकी एक प्रेरक मिसाल हैं। कॉयर बोर्ड के प्रशिक्षण के बाद उन्होंने वर्ष 2024-25 में लगभग 10 लाख रुपये की लागत से एडिगो कॉयर प्रोडक्ट्स की स्थापना की।

आज उनकी इकाई पर्यावरण-अनुकूल डोरमैट, रस्सियां, सजावटी उत्पाद और हस्तशिल्प तैयार कर रही है। इस उद्यम का वार्षिक कारोबार करीब 35 लाख रुपये तक पहुंच चुका है, जबकि लगभग 10 लाख रुपये का लाभ अर्जित हो रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गौथमी ने अपने व्यवसाय तक सफलता को सीमित नहीं रखा। उन्होंने करीब 120 महिलाओं को कॉयर उत्पाद निर्माण का प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराए हैं। उनकी प्रेरणा से आसपास के क्षेत्रों में कई नई कॉयर इकाइयां भी स्थापित हुई हैं।

कॉयर अपशिष्ट से जैव उर्वरक, खेती को मिल रहा फायदा

केरल के कोझिकोड के उद्यमी पी. सुरेंद्रन ने कॉयर पिथ (नारियल रेशे का अवशेष) को जैविक कृषि के लिए उपयोगी उत्पाद में बदल दिया। उन्होंने वर्ष 2024 में संपूर्ण प्लस एग्रो फर्टिलाइजर एंटरप्राइजेज (SAFE) की स्थापना कर कॉयर पिथ आधारित जैव उर्वरक का उत्पादन शुरू किया।

यह जैव उर्वरक मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ाने, जैविक कार्बन सुधारने और पौधों की वृद्धि को बेहतर बनाने में मदद करता है। एक वर्ष के भीतर उनकी इकाई ने 500 से अधिक ग्राहकों तक पहुंच बनाई और 20 टन से अधिक जैव उर्वरक की बिक्री की। इससे लगभग 13 लाख रुपये का कारोबार और 4 लाख रुपये का लाभ प्राप्त हुआ।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार कॉयर पिथ का उपयोग विशेष रूप से नर्सरी, फल-सब्जी उत्पादन, पॉलीहाउस खेती और जैविक कृषि में तेजी से बढ़ रहा है।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए क्यों महत्वपूर्ण है कॉयर?

भारत विश्व का सबसे बड़ा कॉयर उत्पादक देश है और ग्लोबल कॉयर रेशा उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है। यह उद्योग नारियल किसानों, ग्रामीण कारीगरों, महिला स्वयं सहायता समूहों, छोटे उद्यमियों और निर्यातकों को एक साथ जोड़ता है।

कॉयर उद्योग की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें महिलाओं की भागीदारी अत्यधिक है। रेशा निकालने और कताई जैसे कार्यों में करीब 80 प्रतिशत महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जिससे यह क्षेत्र ग्रामीण महिला सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है।

कॉयर से बनने वाले प्रमुख मूल्यवर्धित उत्पाद

आज कॉयर उद्योग पारंपरिक उत्पादों से आगे बढ़कर कई आधुनिक उत्पाद तैयार कर रहा है, जिनमें शामिल हैं—

  • डोरमैट और फर्श चटाइयां
  • रस्सियां और कॉयर सूत
  • ब्रश एवं घरेलू उपयोग की वस्तुएं
  • सजावटी और हस्तशिल्प उत्पाद
  • बागवानी एवं नर्सरी उत्पाद
  • ग्रो बैग और पौध उत्पादन सामग्री
  • जैव उर्वरक एवं मिट्टी सुधारक
  • पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग सामग्री

नवाचार से बढ़ रही कॉयर की मांग

कॉयर क्षेत्र में अनुसंधान एवं नवाचार भी तेजी से हो रहे हैं। केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान (CCRI) ने हाल ही में औद्योगिक उपयोग के लिए पर्यावरण-अनुकूल कॉयर पैकेजिंग कप विकसित किए हैं, जो प्लास्टिक आधारित विकल्पों की जगह ले सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक प्रतिबंध, टिकाऊ उत्पादों की बढ़ती मांग और जैविक खेती के विस्तार से आने वाले वर्षों में कॉयर आधारित उत्पादों की मांग और बढ़ेगी।

किसानों और युवाओं के लिए अवसर

कॉयर क्षेत्र कृषि आधारित ग्रामीण उद्योग का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरा है। नारियल उत्पादक राज्यों में किसान, महिला स्वयं सहायता समूह, एफपीओ, कृषि स्टार्टअप और ग्रामीण युवा कॉयर प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं।

सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, ऋण और विपणन सहयोग उपलब्ध होने से यह क्षेत्र आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

सारांश

नारियल की भूसी से शुरू होने वाली कॉयर की यात्रा अब ग्रामीण भारत में रोजगार, महिला सशक्तिकरण, जैविक खेती और हरित उद्यमिता की नई कहानी लिख रही है। सही प्रशिक्षण, तकनीक और वित्तीय सहयोग मिलने पर यह क्षेत्र किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए आय बढ़ाने का एक मजबूत माध्यम बन सकता है।