October 31, 2026 1:37 PM

Krishi Times

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मछली उत्पादन से आगे बढ़ा भारत का मत्स्य क्षेत्र!

भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र उत्पादन से आगे बढ़कर मूल्य संवर्धन और तकनीक आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर!

कोल्ड चेन, आधुनिक प्रसंस्करण, डिजिटल मार्केटिंग और एआई तकनीक से बदल रही मत्स्य क्षेत्र की तस्वीर; 39,272 करोड़ रुपये के सार्वजनिक निवेश से बुनियादी ढांचे को मजबूती, 2,195 मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों को मिला प्रोत्साहन

नई दिल्ली। भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहा है। अब यह क्षेत्र केवल मछली उत्पादन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, कोल्ड चेन, डिजिटल मार्केटिंग और आधुनिक तकनीकों के माध्यम से एक व्यापक आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित हो रहा है। इस बदलाव से जहां मछुआरों और मत्स्य पालकों की आय बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, महिला उद्यमिता और समुद्री खाद्य उत्पादों के निर्यात को भी नए अवसर मिल रहे हैं।

सरकार की ओर से मत्स्य क्षेत्र में मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) को बढ़ावा देने के लिए बुनियादी ढांचे, आधुनिक प्रसंस्करण इकाइयों, परिवहन व्यवस्था और डिजिटल बाजारों के विकास पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), ब्लॉकचेन, ड्रोन और स्मार्ट कोल्ड चेन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। इन तकनीकों के माध्यम से मछली उत्पादन की निगरानी, गुणवत्ता नियंत्रण, आपूर्ति श्रृंखला का प्रबंधन और बाजार तक उत्पाद पहुंचाने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

उत्पादन के साथ प्रसंस्करण और ब्रांडिंग पर जोर

मत्स्य क्षेत्र में मूल्य संवर्धन का अर्थ केवल मछली पकड़ने या पालन करने तक सीमित नहीं है। इसमें मछली की सफाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और उसे बाजार की मांग के अनुसार तैयार करना शामिल है। रेडी-टू-कुक और रेडी-टू-ईट उत्पादों की बढ़ती मांग ने इस क्षेत्र में नए व्यावसायिक अवसर पैदा किए हैं।

मछली से अचार, पापड़, सूखे उत्पाद, स्मोक्ड फिश, मछली पाउडर और अन्य प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ तैयार किए जा रहे हैं। इससे कच्ची मछली की तुलना में अधिक मूल्य प्राप्त करने की संभावना बढ़ती है। साथ ही उत्पादों की भंडारण अवधि बढ़ाने और कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने में भी मदद मिलती है।

इस बदलाव का सीधा लाभ छोटे मछुआरों, मत्स्य पालकों, महिला स्वयं सहायता समूहों, युवाओं और ग्रामीण उद्यमियों को मिल सकता है। प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन, भंडारण और खुदरा कारोबार में रोजगार के नए अवसर विकसित हो रहे हैं।

मत्स्य क्षेत्र में 39,272 करोड़ रुपये का सार्वजनिक निवेश

मत्स्य पालन क्षेत्र को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए वर्ष 2015 से सार्वजनिक निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। सरकार ने विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से कुल 39,272 करोड़ रुपये की राशि प्रतिबद्ध की है।

इसमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • नीली क्रांति योजना

  • मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि (एफआईडीएफ)

  • प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई)

  • प्रधानमंत्री मत्स्य समृद्धि सह-योजना (पीएम-एमकेएसएसवाई)

  • किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी)

इन योजनाओं का उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ मछली की गुणवत्ता, प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन और बाजार तक पहुंच को मजबूत बनाना है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इन पहलों के माध्यम से देशभर के 74.66 लाख मछुआरों और मत्स्य पालकों की आजीविका एवं रोजगार को सहयोग देने का लक्ष्य रखा गया है।

46,500 सुविधाओं के विकास पर 3,393 करोड़ रुपये खर्च

मत्स्य क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में मछली का सुरक्षित परिवहन, उचित भंडारण और बाजार तक समय पर पहुंच शामिल हैं। विशेष रूप से छोटे मछुआरों के लिए पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक बाजारों की कमी के कारण उत्पादों का नुकसान और कम कीमत मिलने की समस्या सामने आती रही है।

इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने 3,393.85 करोड़ रुपये के निवेश से लगभग 46,500 सुविधाओं का विकास किया है। इनमें मछली परिवहन व्यवस्था, थोक एवं खुदरा बाजार, फिश कियोस्क, फीड मिल, आइस प्लांट, कोल्ड स्टोरेज और मूल्य संवर्धन से जुड़ी उद्यम इकाइयां शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त पांच आधुनिक और स्मार्ट मछली बाजार विकसित किए जा रहे हैं। इन बाजारों में सूचना प्रौद्योगिकी, हरित तकनीक और आधुनिक लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को एकीकृत किया जा रहा है। इनसे लगभग 15,900 रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

आधुनिक बाजार व्यवस्था विकसित होने से मछुआरों को अपने उत्पाद बेचने के लिए बेहतर प्लेटफॉर्म मिल सकता है। वहीं उपभोक्ताओं तक सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण मछली पहुंचाने में भी मदद मिलेगी।

बेहतर नस्ल और गुणवत्तापूर्ण बीज से बढ़ेगी उत्पादकता

मत्स्य क्षेत्र में मूल्य संवर्धन की सफलता के लिए गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की निरंतर उपलब्धता जरूरी है। इसके लिए मछली की ऐसी प्रजातियों के विकास पर जोर दिया जा रहा है, जिनकी वृद्धि दर बेहतर हो, रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता अधिक हो और जो विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में बेहतर उत्पादन दे सकें।

सरकार की ओर से आनुवंशिक सुधार (जेनेटिक इम्प्रूवमेंट) से जुड़ी पहलें शुरू की गई हैं। इनके माध्यम से ट्राउट, झींगा, कतला, रोहू, तिलापिया, पंगासियस, सीबास और स्कैम्पी जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने की योजना है।

इसका उद्देश्य घरेलू बाजार के साथ-साथ प्रसंस्करण उद्योग और निर्यात के लिए गुणवत्तापूर्ण मछली की उपलब्धता बढ़ाना है। बेहतर नस्ल और उन्नत उत्पादन तकनीकों से मत्स्य पालकों की उत्पादकता बढ़ने के साथ प्रसंस्करण इकाइयों को भी नियमित रूप से कच्चा माल उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

2,195 मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों से छोटे उत्पादकों को ताकत

मत्स्य क्षेत्र में छोटे मछुआरों और मत्स्य पालकों के सामने उत्पादन को बाजार तक पहुंचाने, पूंजी जुटाने और उचित कीमत प्राप्त करने की चुनौतियां रहती हैं। इन समस्याओं को दूर करने के लिए सामूहिक उद्यम मॉडल को बढ़ावा दिया जा रहा है।

सरकार ने देश में 2,195 मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों (एफएफपीओ) के गठन में सहयोग दिया है। इन संगठनों के माध्यम से छोटे उत्पादक अपने उत्पादों को एकत्रित कर सकते हैं, संसाधनों का साझा उपयोग कर सकते हैं और प्रसंस्करण, ब्रांडिंग तथा विपणन जैसी गतिविधियों में सामूहिक रूप से भाग ले सकते हैं।

इनमें से कई संगठनों को ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ओएनडीसी) से भी जोड़ा गया है। इससे डिजिटल माध्यमों के जरिए व्यापक बाजार तक पहुंच बनाने और सीधे खरीदारों से जुड़ने की संभावनाएं बढ़ी हैं।

प्रधानमंत्री मत्स्य समृद्धि सह-योजना के तहत एनसीडीसी, नेफेड, एसएफएसी और नेरामैक जैसी एजेंसियों के सहयोग से 5,500 मत्स्य सहकारी समितियों को मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों के रूप में काम करने के लिए मजबूत बनाया जा रहा है।

इस पहल से छोटे उत्पादकों की सामूहिक सौदेबाजी क्षमता बढ़ाने और उन्हें आधुनिक बाजार व्यवस्था से जोड़ने में मदद मिलने की उम्मीद है।

महिला उद्यमिता को मिल रहा बढ़ावा, 1.28 लाख से अधिक लाभार्थियों को सहायता

मत्स्य पालन क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका अब केवल मछली की बिक्री तक सीमित नहीं रह गई है। वे मछली सुखाने, प्रसंस्करण, अचार, पापड़, स्मोक्ड फिश, मछली पाउडर, पैकेजिंग और खुदरा कारोबार जैसे क्षेत्रों में उद्यमी के रूप में आगे आ रही हैं।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत महिला सशक्तीकरण को विशेष प्राथमिकता दी गई है। पिछले पांच वर्षों में 1.28 लाख से अधिक महिला लाभार्थियों के हित में 4,155 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 1,572 करोड़ रुपये है।

इस वित्तीय सहायता से महिलाओं को छोटे प्रसंस्करण उद्यम स्थापित करने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर विकसित करने में मदद मिल रही है।

मोबाइल फिश वेंडिंग यूनिट और सूक्ष्म प्रसंस्करण इकाइयां विशेष रूप से तटीय, अंतर्देशीय और पूर्वोत्तर राज्यों में महिलाओं की आजीविका को मजबूत करने का माध्यम बन रही हैं। इससे महिलाओं की आय बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय बाजारों में किफायती और प्रोटीनयुक्त खाद्य उत्पादों की उपलब्धता भी बेहतर हो सकती है।

तकनीक से बदलेगी मछली उत्पादन और विपणन की व्यवस्था

मत्स्य पालन क्षेत्र में डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल भविष्य की एक महत्वपूर्ण जरूरत बनता जा रहा है। एआई और आईओटी आधारित प्रणालियों के माध्यम से मछली पालन इकाइयों में पानी की गुणवत्ता, तापमान, ऑक्सीजन स्तर और अन्य महत्वपूर्ण मानकों की निगरानी की जा सकती है।

इसी तरह ब्लॉकचेन तकनीक से उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता और ट्रेसबिलिटी बढ़ाने में मदद मिल सकती है। ड्रोन तकनीक और स्मार्ट निगरानी प्रणालियां जलीय कृषि प्रबंधन को अधिक प्रभावी बना सकती हैं।

डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल आधारित विपणन से मछुआरों तथा मत्स्य पालकों को खरीदारों से सीधे जुड़ने के अवसर मिल रहे हैं। इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम करने, बाजार की मांग समझने और उत्पादों का बेहतर मूल्य प्राप्त करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

मत्स्य अर्थव्यवस्था में रोजगार और निर्यात की नई संभावनाएं

भारत में मत्स्य पालन क्षेत्र का विस्तार केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में प्रसंस्करण उद्योग, कोल्ड चेन, आधुनिक परिवहन, डिजिटल व्यापार और गुणवत्तापूर्ण उत्पादों की मांग इस क्षेत्र की आर्थिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

विशेष रूप से मूल्य संवर्धित समुद्री खाद्य उत्पादों की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए भारतीय उद्यमों के लिए नए अवसर मौजूद हैं। इसके लिए गुणवत्ता नियंत्रण, खाद्य सुरक्षा मानकों, आधुनिक पैकेजिंग और निर्यात संबंधी आवश्यकताओं पर ध्यान देना जरूरी होगा।

सरकार की विभिन्न योजनाओं के समन्वित क्रियान्वयन से मछुआरों की आय बढ़ाने, फसलोत्तर नुकसान कम करने, महिला नेतृत्व वाले उद्यमों को प्रोत्साहित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।

आगे की चुनौती: उत्पादन से बाजार तक मजबूत कड़ी बनाना

भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र अब एक ऐसे आर्थिक मॉडल की ओर बढ़ रहा है, जहां उत्पादन के साथ प्रसंस्करण, गुणवत्ता, ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स और बाजार तक पहुंच को समान महत्व दिया जा रहा है।

हालांकि, इस बदलाव का वास्तविक लाभ छोटे मछुआरों और मत्स्य पालकों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय स्तर पर कोल्ड स्टोरेज, सस्ती परिवहन सुविधा, गुणवत्तापूर्ण बीज, प्रशिक्षण, सुलभ ऋण और बाजार संबंधी जानकारी की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी होगा।

यदि उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों, महिला समूहों, निजी कंपनियों और सरकारी संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होता है, तो मत्स्य पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आय और रोजगार का बड़ा माध्यम बन सकता है।

स्पष्ट है कि भारतीय मत्स्य क्षेत्र का भविष्य केवल अधिक मछली उत्पादन में नहीं, बल्कि उत्पाद की गुणवत्ता सुधारने, उसे बेहतर तरीके से संरक्षित करने, मूल्य संवर्धन करने और किसानों एवं मछुआरों को सीधे बाजार से जोड़ने में निहित है।