सऊदी अरब में खाद्य और पशु आहार सुरक्षा को मजबूत करेंगी ज्वार और बाजरे की उन्नत किस्में, शोध में मिले पांच संभावित विकल्प
कृषि अनुसंधान | खाद्य सुरक्षा | जलवायु अनुकूल खेती
सऊदी अरब जैसे जल-संकट वाले देश में खाद्यान्न और पशुओं के चारे का घरेलू पैदावार बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शोध सामने आया है। अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के लिए अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT) ने संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और सऊदी अरब के कृषि विकास कार्यक्रम Saudi REEF के सहयोग से ज्वार और बाजरे के पांच संभावित विकल्पों की पहचान की है। इन फसलों से अनाज के साथ पशुओं के लिए हरा चारा भी प्राप्त किया जा सकता है।
यह शोध उन कृषि प्रणालियों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है, जहां पानी की सीमित उपलब्धता, जलवायु में उतार-चढ़ाव और पशु आहार की मांग किसानों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। हालांकि, इन फसलों को बड़े स्तर पर अपनाने से पहले किसानों के खेतों में इनके प्रदर्शन और पानी की उत्पादकता का आकलन करना जरूरी होगा।
ज्वार और बाजरे की 42 प्रविष्टियों का किया गया मूल्यांकन
शोध के तहत ज्वार की 27 और बाजरे की 15 प्रविष्टियों का परीक्षण किया गया। यह मूल्यांकन सऊदी अरब के जजान (Jazan) के निचले क्षेत्रों और आभा (Abha) के ऊंचाई वाले इलाकों में अलग-अलग मौसम और कृषि परिस्थितियों के तहत किया गया।
परीक्षण का प्रमुख उद्देश्य ऐसी फसल सामग्री की पहचान करना था, जो अनाज उत्पादन और हरे चारे की पैदावार के बीच बेहतर संतुलन बना सके। इसके लिए विभिन्न प्रविष्टियों की तुलना पहले से इस्तेमाल हो रही मानक किस्मों से की गई।
शोध में ज्वार की तीन और बाजरे की दो प्रविष्टियों ने अनाज तथा ताजा जैवभार उत्पादन के संयुक्त मानदंडों पर बेहतर संभावनाएं दिखाई हैं।
ज्वार की एक प्रविष्टि ने अनाज और चारे, दोनों में दिखाया बेहतर प्रदर्शन
शोध के अनुसार, ज्वार की सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली प्रविष्टि ने मानक किस्म की तुलना में अनाज उत्पादन में 9.3 प्रतिशत और ताजा जैवभार उत्पादन में 41.3 प्रतिशत अधिक परिणाम दर्ज किया।
यह प्रदर्शन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज्वार का उपयोग खाद्यान्न के साथ पशुओं के चारे के रूप में भी किया जा सकता है। यदि आगे के परीक्षणों में इसकी उत्पादकता और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होने की पुष्टि होती है, तो यह किसानों को सीमित कृषि भूमि से अधिक उपयोग प्राप्त करने का विकल्प दे सकती है।
बाजरे की दो प्रविष्टियों ने भी अनाज और जैवभार उत्पादन के संयुक्त मूल्यांकन में बेहतर संभावनाएं दिखाई। इनमें सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि का अनाज उत्पादन मानक किस्म से 33.9 प्रतिशत अधिक रहा। हालांकि, इसका ताजा जैवभार उत्पादन मानक किस्म की तुलना में 37.1 प्रतिशत कम दर्ज किया गया।
यह अंतर दर्शाता है कि किसी फसल का चयन केवल अनाज की अधिक पैदावार के आधार पर नहीं किया जा सकता। जिन क्षेत्रों में पशुओं के लिए चारा प्रमुख जरूरत है, वहां जैवभार उत्पादन और उसकी गुणवत्ता का भी विशेष महत्व होगा।
खाद्य सुरक्षा के साथ पशुपालन को भी मिल सकता है लाभ
सऊदी अरब में ज्वार और बाजरे जैसी फसलों की संभावनाओं का मूल्यांकन खाद्य सुरक्षा के साथ पशुधन क्षेत्र की जरूरतों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। पशुपालन में चारे की उपलब्धता उत्पादन लागत और पशुओं की उत्पादकता को प्रभावित करती है। स्थानीय स्तर पर उपयोगी चारा फसलों का विकास होने से बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम करने के अवसर पैदा हो सकते हैं।
ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने इस सहयोग को सऊदी अरब की खाद्य सुरक्षा संबंधी प्राथमिकताओं के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, FAO और सऊदी सरकार के साथ वैज्ञानिक साझेदारी के माध्यम से शुष्क क्षेत्रों की कृषि क्षमता का उपयोग करने, घरेलू खाद्यान्न और पशु आहार की उपलब्धता मजबूत करने तथा किसानों के लिए आर्थिक अवसर बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है।
FAO सऊदी अरब की सतत ग्रामीण कृषि विकास परियोजना की मुख्य तकनीकी सलाहकार डॉ. काकोली घोष ने कहा कि ज्वार और बाजरा अनाज तथा पशु आहार, दोनों उपलब्ध कराने की क्षमता के कारण सऊदी अरब के लिए उपयोगी फसलें हैं। स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुरूप किस्मों की पहचान घरेलू उत्पादन बढ़ाने और किसानों को व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
जलवायु अनुकूल कृषि के लिए बहुआयामी चयन पर जोर
ICRISAT के वैज्ञानिकों डॉ. एफ्रेम हब्यारिमाना और डॉ. एस.के. गुप्ता के नेतृत्व में किए गए मूल्यांकन ने सऊदी अरब की कृषि परिस्थितियों के लिए दोहरे उपयोग वाली फसल सामग्री की आगे जांच का आधार तैयार किया है।
ICRISAT में त्वरित फसल सुधार कार्यक्रम के वैश्विक अनुसंधान निदेशक डॉ. रमन बाबू के अनुसार, शुष्क क्षेत्रों में फसलों का चयन केवल एक विशेषता के आधार पर करने के बजाय कई मानकों को एक साथ देखना आवश्यक है। अनाज उत्पादन, जैवभार, जल की उपलब्धता और जलवायु परिवर्तनशीलता जैसे कारकों को ध्यान में रखकर ही किसानों के लिए उपयुक्त विकल्प विकसित किए जा सकते हैं।
यह दृष्टिकोण भारत सहित उन देशों के लिए भी प्रासंगिक है, जहां वर्षा की अनिश्चितता, सिंचाई संसाधनों की कमी और पशु आहार की बढ़ती जरूरतें कृषि व्यवस्था को प्रभावित करती हैं।
अब किसानों के खेतों में परीक्षण और बीज उत्पादन की जरूरत
यह शोध जजान कृषि अनुसंधान केंद्र और आभा स्थित बीज गुणन केंद्र में चार स्थान-मौसम परिस्थितियों के अंतर्गत किया गया। इससे सऊदी अरब की स्थानीय परिस्थितियों में परीक्षण की गई फसल सामग्री और आगे के कृषि अनुसंधान के लिए वैज्ञानिक आधार उपलब्ध हुआ है।
हालांकि, इन संभावित विकल्पों को व्यापक स्तर पर अपनाने से पहले कई महत्वपूर्ण चरण पूरे करने होंगे।
किसान-स्तरीय परीक्षण: वास्तविक खेतों में अलग-अलग कृषि परिस्थितियों के तहत प्रदर्शन की जांच।
चारा गुणवत्ता का आकलन: पशुओं के पोषण के लिहाज से चारे की गुणवत्ता और उपयोगिता का परीक्षण।
जल उत्पादकता का मूल्यांकन: प्रति इकाई पानी से प्राप्त अनाज और जैवभार का आकलन।
बीज गुणन: उपयुक्त प्रविष्टियों के बीजों की पर्याप्त मात्रा तैयार करना।
पंजीकरण और स्वीकृति: आवश्यक राष्ट्रीय प्रक्रियाओं के बाद किसानों तक किस्मों को पहुंचाने की तैयारी।
इन चरणों में किसानों और पशुपालकों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होगी, ताकि फसलों की वास्तविक उपयोगिता, चारे की गुणवत्ता और खेती की व्यावहारिक लागत का आकलन किया जा सके।
भारत के शुष्क कृषि क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी हो सकता है शोध
इस शोध का महत्व सऊदी अरब तक सीमित नहीं है। भारत के राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में भी ज्वार और बाजरे की खेती खाद्यान्न तथा पशु आहार की जरूरतें पूरी करने में योगदान देती है।
हालांकि, सऊदी अरब में पहचानी गई फसल सामग्री को भारतीय परिस्थितियों के लिए सीधे उपयुक्त नहीं माना जा सकता। इसके लिए भारत के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में स्वतंत्र परीक्षण, स्थानीय किस्मों से तुलना और संबंधित नियामक प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक होगा।
सारांश
ICRISAT, FAO और सऊदी अरब के सहयोग से हुआ यह शोध जल-संकट वाले क्षेत्रों में खाद्यान्न और पशु आहार उत्पादन को एक साथ मजबूत करने की संभावनाएं सामने लाता है। ज्वार और बाजरे की पांच संभावित प्रविष्टियां आगे के अनुसंधान के लिए उपयोगी आधार प्रदान करती हैं। अब इनकी वास्तविक सफलता किसान-स्तरीय परीक्षणों, जल उत्पादकता, चारा गुणवत्ता और स्थानीय परिस्थितियों में स्थिर प्रदर्शन पर निर्भर करेगी।





























